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आरएसएस-भाजपा की सोच संविधान के विरुद्ध

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भारत को असली स्वतंत्रता राममंदिर के उद्घाटन के दिन मिली, यह कहने से ऐसा लगता है कि मोहन भागवत चाहते हैं कि रामराज की तरह भारत में ब्राह्मणों और क्षत्रियों का राज हो। जाहिर तौर पर उनकी यह सोच संविधान के विरुद्ध है। आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने बीते 14 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर मध्य प्रदेश के इंदौर में अपने एक भाषण में कहा कि “15 अगस्त, 1947 को तो हमें केवल राजनीतिक आजादी मिली थी। असली स्वतंत्रता तो हमें उस दिन मिली जिस दिन अयोध्या के राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हुई।”

प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड

नरेंद्र मोदी और अमित शाह संविधान, आंबेडकर और लोकतंत्र के बारे में चाहे जो कहते रहें, असली बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने साफ कर दी है।

आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने बीते 14 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर मध्य प्रदेश के इंदौर में अपने एक भाषण में कहा कि “15 अगस्त, 1947 को तो हमें केवल राजनीतिक आजादी मिली थी। असली स्वतंत्रता तो हमें उस दिन मिली जिस दिन अयोध्या के राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हुई।”

उनके वक्तव्य से यह साफ है कि वे मानते हैं कि 22 जनवरी, 2024 को अयोध्या में राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा का दिन, भारत के स्वाधीनता दिवस से ज्यादा महत्वपूर्ण है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इस मंदिर का निर्माण उस ज़मीन पर किया गया है जिस पर बाबरी मस्जिद खड़ी थी और जिसे 1992 में गैर-कानूनी ढंग से ढाह दिया गया था।

उनके इस वक्तव्य के शूद्रों, दलितों और आदिवासियों के लिए भी गंभीर निहितार्थ हैं, क्योंकि अगस्त 1947 में इन वर्गों को अंग्रेजों से ही नहीं, बल्कि ब्राह्मण-क्षत्रियों के वर्चस्व और उनके सामाजिक-आध्यात्मिक शासन से भी मुक्ति मिली थी। जहां अंग्रेज भारत पर कुछ दो सौ सालों से शासन कर रहे थे, वहीं ब्राह्मण-क्षत्रियों का सामाजिक-आध्यात्मिक वर्चस्व हजारों सालों से जारी था।

आंबेडकर की विश्वदृष्टि

डॉ. बी.आर. आंबेडकर भारतीय संविधान के साथ-साथ आधुनिक भारत के सभी दमित लोगों के लिए एक मुक्तिकामी विचारधारा और दर्शन के निर्माता भी थे। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि जाति और वर्ण-धर्म के ढांचे लंबे समय तक बने न रह सकें।

आंबेडकर बुद्ध-राज और रामराज के बीच स्पष्ट अंतर करते थे। राम एक क्षत्रिय राजा थे जिन्हें हम रामायण की कथा से जानते हैं। रामायण के अनुसार वनवास से लौटने के बाद राम ने अपने राजतिलक के साथ ही अयोध्या में वर्ण-धर्म पर आधारित राज्य की स्थापना कर दी थी।

रामायण के अनुसार वशिष्ठ, जो जीवनपर्यंत राम के गुरु थे, ने कई बार कहा कि क्षत्रियों को ब्राह्मण गुरु के आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शन व पर्यवेक्षण में राज करना चाहिए। रामराज की व्यवस्था में शूद्रों और चांडालों की कोई भूमिका नहीं थी। उन्हें केवल तीनों उच्च वर्णों की सेवा करनी थी।

रामायण में वैश्यों की भूमिका पर भी कुछ खास नहीं कहा गया है, हालांकि वे भी उच्च वर्णों में शामिल थे।

मोहन भागवत, आरएसएस प्रमुख

बुद्ध और राम

गौतम बुद्ध एक शाक्य आदिवासी शासक परिवार से थे। मगर राम के विपरीत उन्होंने राजकाज त्याग दिया और भारत के ऐसे पहले दिव्य व्यक्तित्व बने, जिन्होंने समानता और संघ पर आधारित समाज का निर्माण किया। वे जीवनपर्यंत भारत में जाति-मुक्त समाज की स्थापना के लिए काम करते रहे।

आंबेडकर ने देश में बुद्ध-राज की स्थापना के लिए आंदोलन किए। शूद्रों, दलितों और आदिवासियों के लिए बुद्ध-राज के एकदम अलग निहितार्थ हैं।

मगर मोहन भागवत जो कह रहे हैं, उसका अर्थ यह है कि अंग्रेज, जो 1947 में भारत छोड़ कर चले गए थे, देश के लिए असली समस्या नहीं थे। असली समस्या तो मुसलमान हैं।

यह कहना कि राम मंदिर के उद्घाटन का दिन देश का असली स्वाधीनता दिवस है, दरअसल यह संकेत करता है कि भविष्य में भारतीय राज्य और उसकी आध्यात्मिक व सामाजिक प्रणाली पर ब्राह्मणों और क्षत्रियों का नियंत्रण होगा, जैसा कि रामराज के दौरान था।

बौद्ध विरासत

मोहन भागवत के वक्तव्य का यह अर्थ भी है कि आरएसएस को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित वर्तमान संविधान मंजूर नहीं है। ये तीनों मूल्य दुनियाभर के सभी लोकतांत्रिक संविधानों के आधार हैं।

आंबेडकर ने बार-बार कहा था कि भारत के स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के और विशेषकर स्वयं उनके अपने सिद्धांत – फ्रांसीसी क्रांति पर आधारित न होकर – प्राचीन बौद्ध विरासत पर आधारित हैं और यही प्राचीन भारत की असली थाती है।

इसके विपरीत आरएसएस ने कभी यह नहीं माना कि बौद्ध विरासत, भारत की विरासत है और अब तो आरएसएस के मुखिया ने यह एकदम साफ कर दिया है कि भारत के स्वाधीनता दिवस का संबंध राम मंदिर से है और यह भी कि तथाकथित तौर पर उस मंदिर को तोड़ने वाले मुसलमान देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

इसका अर्थ यह है कि आरएसएस को सन् 1950 में लागू किया गया संविधान – जिसका मसविदा आंबेडकर ने तैयार किया था – स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि वह वैश्विक समानता और बुद्ध-राज की संकल्पनाओं पर आधारित है।

समतावादी युग

मनु का धर्मशास्त्र ‘मनुस्मृति’, रामराज का कानून है। इस तथाकथित कानून की किताब को आंबेडकर ने सार्वजनिक रूप से जलाया था। उसे जलाना एक नए समतावादी युग की शुरुआत का प्रतीक था। मगर कुछ लोग अब भी जाति, नस्ल और आस्था से परे मनुष्यों के बीच समानता के विचार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।

सन् 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार के दौरान सभी विपक्षी पार्टियों ने भाजपा के सत्ता में आने पर संविधान खतरे में होने की आशंका व्यक्त की थी। उन्होंने यह भी कहा था कि संविधान तो खतरे में होगा ही, ओबीसी, एससी और एसटी के लिए आरक्षण भी खतरे में होगा।

जिस दिन भारत के आधुनिक राष्ट्र राज्य का संचालन राम के आदर्शों पर आधारित हो जाएगा, उस दिन ओबीसी, एससी और एसटी को समानता के अपने अधिकार को भूल जाना होगा। वे शंबूक, एकलव्य और शूर्पनखा बन जाएंगे। वे शूद्र, वनवासी और चांडाल कहलाएंगे।

असली दिशा

जो शूद्र, दलित और आदिवासी संघ और भाजपा में हैं या जो उनके बाहर भी काम कर रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि भागवत ने जो कहा है, वही आरएसएस के अधीन काम करने वाले सभी संगठनों का आदर्श होगा। और भाजपा उन्हीं संगठनों में से एक है।

आरएसएस-भाजपा अब तक करीब 15 साल भारत पर शासन कर चुके हैं – 1999 से 2004 तक और फिर 2014 से 2025 तक। इन वर्षों में उन्होंने देश की सोच को कई तरीकों से बदला है। भारत के बारे में विमर्श न केवल भारत के अंदर बदले हैं, बल्कि पश्चिमी देशों में भी उनमें बदलाव आया है।

अब हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह या भाजपा के किसी अन्य नेता की बात सुनने की जरूरत नहीं है। वे लोग संविधान, आंबेडकर और लोकतंत्र के बारे में चाहे जो कहते रहें, भागवत की बात ही पत्थर की लकीर है। उन्होंने भारत को और दुनिया को बता दिया है कि भारत का भविष्य कैसा होगा।

भारत की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था लगभग पूरी तरह से आरएसएस के नियंत्रण में चली गई है। जाहिर है कि इस व्यवस्था में किसी शूद्र, दलित या आदिवासी को राम राज्य का सच्चा प्रतिनिधि नहीं माना जाएगा।

गांधी का राम राज्य

महात्मा गांधी ने भी रामराज की अवधारणा प्रस्तुत की थी। मगर जैसा की हिंद स्वराज से जाहिर है उनका रामराज, संघ-भाजपा के रामराज से अलग था।

उनके आधुनिक रामराज में अछूत प्रथा के लिए जगह नहीं थी। हालांकि वे चाहते थे कि वर्ण-व्यवस्था बनी रहे, मगर वे इस व्यवस्था की पुनर्व्याख्या करना चाहते थे और उसे मनुष्यों के कर्मों पर आधारित बनाना चाहते थे। आंबेडकर रामराज के गांधीवादी मॉडल से भी असहमत थे।

जहां तक आरएसएस के रामराज की बात है, वह पूरी तरह से जाति-केंद्रित मनु के धर्मशास्त्र पर आधारित है।

आरएसएस की रामराज की अवधारणा का विस्तार से विवरण किसी पुस्तक में उपलब्ध नहीं है। मगर इस मुद्दे पर उसने पिछले चालीस सालों में जमकर प्रचार किया है और यह प्रचार गांधीवादी आंदोलन के प्रचार से कहीं ज्यादा गहरा और विस्तृत है।

भागवत ने राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा को स्वतंत्रता से जोड़कर यह बता दिया है कि आरएसएस मार्का रामराज कैसा होगा। उसमें ब्राह्मण और क्षत्रिय, बनियों की एकाधिकार पूंजी के बल पर राज करेंगे। पिछले दस वर्षों में इन तीनों का गठबंधन बहुत मजबूत हुआ है।बेशक, यह अत्यंत ही डरावनी चाल है।

(यह आलेख पूर्व में अंग्रेजी वेब पत्रिका ‘दी फेडरल’ द्वारा अंग्रेजी में प्रकाशित है। यहां लेखक की अनुमति से हिंदी अनुवाद प्रकाशित है। अनुवादक : अमरीश हरदेनिया

Ramswaroop Mantri

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