रिफ़अत सरोश
गोरा चिट्ठा रंग, किसी क़द्र अंडाकार चेहरे पर ऐनक सजी हुई। एक प्रतिष्ठित संजीदगी, मगर नाज़ुक मुलामियत के साथ होंठों पर एक तबस्सुम, जो बात करने वाले पर जादू करे। और चेहरे पर फ़रिश्तों जैसी मासूमियत। आवाज़ मीठी, लहज़ा धीमा और रुका-थमा। लिबास ख़द्दर का सफ़ेद उजला कुर्ता और पाजामा। बातें जैसे फूल झड़ते हों। और जब गर्मा-गर्म बहस हो रही हो, और दूसरे लोग आग बरसा रहे हों, तब भी उनके लहजे में वही फूलों की बरसात और अपनी तार्किक गुफ़्तगू से बिल आख़िर महफ़िल पर छा जाने का अंदाज़। ये है एक हल्की-सी झलक बन्ने भाई यानी सैयद सज्जाद ज़हीर की।
‘लंदन की एक रात’ लघु उपन्यास के लेखक सज्जाद ज़हीर। ‘अंगारे’ जैसी इंक़लाब बरपा करने वाली किताब सम्पादित करने वाले सज्जाद ज़हीर और हिन्दुस्तान में अंजुमन तरक़्क़ी-पसंद मुसन्निफ़ीन के संस्थापक सज्जाद ज़हीर। अदब की वो तहरीक जिसने एक ज़माने में पूरे हिन्दुस्तान के अदीबों को मुतास्सिर किया था। और जिसका जादू कम से कम गत सदी तक सब के सर पर चढ़कर बोला। बम्बई की फ़िज़ा को अदबी रंग रंगने में सज्जाद ज़हीर का बहुत बड़ा हाथ है। जिनकी प्यारी शख़्सियत को छोटे-बड़े सब ‘बन्ने भाई’ कहते हैं।
बम्बई में उनका बा-क़ाइदा निवास उस वक़्त हुआ, जब दूसरी जंग-ए-अज़ीम के दौरान सोवियत यूनियन के जंग में शामिल होने की वजह से ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’ ने उसे क़ौमी जंग कहना शुरू किया। बम्बई में पार्टी का हेडक्वार्टर क़ायम किया गया। और वहीं से हफ़्तावार ‘क़ौमी जंग’ अख़बार जारी किया गया। इसके एडिटर बन्ने भाई। यानी सैयद सज्जाद ज़हीर और उनकी चुम्बकीय शख़्सियत के चलते इस दफ़्तर में कुछ ऐसे लोग आए, जो आगे चलकर बम्बई की ज़िन्दगी, ख़ास तौर पर अदबी ज़िन्दगी का हुस्न भी कहलाए। और जिनकी सक्रियता ने बम्बई में एक नई लहर दौड़ा दी। ‘बन्ने भाई’ के इन साथियों के नाम हैं-सैयद अली सरदार जाफ़री, सैयद अतहर हुसैन कैफ़ी आज़मी, सैयद सिब्ते हसन, ज़िया-उल हसन, कुँवर मुहम्मद अशरफ़ और ज़ोए अंसारी वगैरा।
ऐसे बा-कमाल नौजवान अदीबों और जर्नलिस्टों की कमान जिसके हाथ में हो, उसकी अज़्मत से कौन इंकार कर सकता है ? ‘बन्ने भाई’ इतने मधुरभाषी आदमी थे, जिनको मैंने न कभी ग़ुस्सा होते देखा और न सुना। ‘क़ौमी जंग’ अख़बार का वो अजीब ज़माना था। ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’ का उर्दू मुख्य—पत्र ‘क़ौमी जंग’ बम्बई में हाथों-हाथ लिया जाता था। भिंडी बाज़ार में सरदार जाफ़री और कैफ़ी आज़मी इस अख़बार को हॉकरों की तरह खड़े-खड़े बेच देते थे। पत्रकारिता का मैदान हो या सभा को सम्बोधन का, सज्जाद ज़हीर सब्र से काम लेते थे। जलसों में सरदार जाफ़री और डॉ. कुँवर मुहम्मद अशरफ़ की तक़रीर सरपट दौड़ती थी, मगर बन्ने भाई के लफ़्ज़ सभास्थल में संभल-संभलकर चलते थे। और उनका मीठा बोलना दिलों को वश में कर लेता था।
अक्सर लोग ‘खेतवाड़ी’ पर कम्यून में रहते थे, मगर सज्जाद ज़हीर 29 बालकेश्वर रोड पर उम्दा फ्लैट में रहते थे। (आख़िर सर वज़ीर हसन के बेटे थे।) और इस फ्लैट से ही ‘अंजुमन तरक़्क़ी-पसंद मुसन्निफ़ीन’ की हफ़्तावार बैठकों का वो सिलसिला शुरू हुआ था, जिसने पूरे हिन्दुस्तान में अंजुमन की बैठकों की नींव डाल दी थी और चर्चा और तर्क की जो प्रतिष्ठित रिवायत सज्जाद ज़हीर साहब ने डाली थी, वो जब तक क़ायम रही, संगठन के लोगों में जूतियों में दाल नहीं बँटी। अदब और अदीबों में एक नई रूह फूँकना, सज्जाद ज़हीर का एक ऐसा कारनामा है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता।
बम्बई आने से पहले 1936 में ‘अंजुमन तरक़्क़ी-पसंद मुसन्निफ़ीन’ की पहली कॉन्फ्रेंस के लिए ये सज्जाद ज़हीर ही थे, जिन्होंने प्रेमचन्द को सदर बना लिया था। टैगोर को अपने साथ लेने में उनका हाथ था। और 1938 में कलकत्ता की कॉन्फ्रेंस के बाद वो जब बम्बई आ गए, तो उन्होंने बम्बई के वातावरण को सजा दिया।
सज्जाद ज़हीर की शख़्सियत में बड़ा रख-रखाव था। ख़ुद लेखक ने उनकी शख़्सियत का जादू पहले-पहल अक्टूबर, 1945 में ‘हैदराबाद उर्दू कॉन्फ्रेंस’ के मौके़ पर देखा। फ़िराक़ गोरखपुरी, डॉ. अब्दुल अलीम, एहतिशाम हुसैन, क़ाज़ी अब्दुल ग़फ़्फ़ार, हसरत मोहानी, मख़दूम मोहिउद्दीन, मुमताज़ शीरीं, डॉ. मुल्कराज आनंद और बहुत से नौजवान अदीब और शायर। गोया सब इस प्रगतिशील संत के हाथ पर दीक्षा कर चुके थे। बम्बई में उनका क़याम ज़्यादा अरसा नहीं रहा। तक़्सीम-ए-वतन के कुछ अरसे बाद ही उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान काम करने के लिए भेज दिया था।
जहाँ वो फै़ज़ के साथ ‘रावलपिण्डी केस’ में गिरफ़्तार हुए। (ये अलग क़िस्सा है) गोया उनके बम्बई में क़याम की मुद्दत अंदाज़न चार-पाँच साल है। मगर उनकी शख़्सियत के असरात आज तक देखे जा सकते हैं। उनकी अदबी उदारता का आलम ये था कि एक उनकी कशिश की वजह से बालकेश्वर रोड के ‘अंजुमन तरक़्क़ी-पसंद मुसन्निफ़ीन’ के जलसों में शिरकत करने वालों में आम और मशहूर तरक़्क़ी-पसंद अदीबों और शायरों के अलावा ऐसे नाम भी हैं, जिनका अंजुमन के संविधान से कोई वास्ता न था।
मसलन मिर्ज़ा यास यगाना चंगेज़ी, पतरस बुखारी, जुल्फ़िकार बुख़ारी, मीराजी, नख़्शब जार्चवी, जिगर मुरादाबादी (और मजरूह सुल्तानपुरी भी इसी तरह आए थे, जो बाद में प्रगतिशीलता के प्रशंसक हुए।) मदनपुरे और नागपाड़े के मज़दूरों और कामगारों के हलकों में ‘बन्ने भाई’ बहुत मक़बूल थे। उनकी मौजूदगी से महफ़िल हो या जलसा एक प्रतिष्ठा और प्रबंध, और सुकून रहता था। वो लोगों को एक साथ लेने और सहमत बनाने में विशेषज्ञता रखते थे।
सज्जाद ज़हीर के पाकिस्तान जाने के बाद सबसे बड़ा नुक्सान ‘अंजुमन तरक़्क़ी-पसंद मुसन्निफ़ीन’ (बम्बई) को हुआ। आपसी विरोध आन्दोलन की जड़ें काटने लगा। और सतही अदब की मक़बूलियत का बाज़ार ऐसा गर्म हुआ कि उस वक़्त के अदूरदर्शी अदबी लीडरों ने बजाए, नये लोगों को अपनी तरफ़ आकर्षित करने के पुराने साथियों और प्रमाणिक अदीबों, और शायरों को अपनी महफ़िल से कान पकड़-पकड़कर निकालना शुरू कर दिया। इन निकाले जाने वाले लोगों में कैसे-कैसे नामी-गिरामी लोग थे-ख़्वाजा अहमद अब्बास, साग़र निज़ामी, अख़्तर-उल-ईमान, ज़ोए अंसारी।
खि़रद का नाम जुनूँ पड़ गया, जुनूँ का खि़रद
जो चाहे आप का हुस्न-ए-करिश्मा-साज़ करे।
कुछ साल बाद जब सज्जाद ज़हीर पाकिस्तान से हिन्दुस्तान वापस आए, तो उन्होंने अपनी निर्माण की हुई इस इमारत की गिरती दीवारों को रोकने की कोशिश की। मगर उसकी जड़ें खोखली हो गई थीं। वो भी क्या करते ? लोगों ने सज्जाद ज़हीर के इस जुमले को हैरत से सुना कि ‘‘गुज़िश्ता दस साल में बिल्कुल नाकारा साहित्य सृजन हुआ है। सिर्फ़ एक नज़्म क़ाबिल-ए-तारीफ़ है अख़्तर-उल-ईमान की नज़्म ‘एक लड़का’।’’ सज्जाद ज़हीर की पूरी ज़िन्दगी अदब और बेहतर सामाजिक मूल्यों के उत्थान में गुज़री। वो आलमी शोहरत के अदीब और दानिश्वर थे। अफ्रो-एशियाई कॉन्फ्रेंस के संस्थापकों में से थे। और उसी की एक कॉन्फ्रेंस की तैयारी के सिलसिले में ‘अल्मा-अता’ (पूर्व सोवियत यूनियन) गए थे कि उनका दिल उनको धोखा दे गया।
1973 में उनका इंतिक़ाल हुआ। बम्बई के अदबी और समाजी ज़िन्दगी पर उनकी छाप है। इस वक़्त मुझे उनका एक अफ़साना याद आ गया। ‘सैंडहर्स्ट रोड’ ये सड़क चौपाटी से डोंगरी तक जाती है। और इस सड़क पर लड़ाई-झगड़े के कई केन्द्र थे-गोल पटा, भिंडी बाज़ार। शायद इस अफ़साने की व्याख्या ही कृश्न चन्दर का अफ़साना ‘पेशावर एक्सप्रेस’ है। सज्जाद ज़हीर हिन्दू-मुस्लिम एकता के ज़बर्दस्त हामी थे और अदब में जो बड़ा रास्ता उन्होंने बनाया है, वो किसी न किसी अंदाज़ से चलता रहेगा।
तादाद के ऐतबार से उनकी किताबें ज़्यादा नहीं हैं। लघु उपन्यास ‘लंदन की एक रात’, मज्मूआ-ए-कलाम ‘पिघला नीलम’, तरक़्क़ी-पसंद तहरीक का इतिहास ‘रौशनाई’ और एक किताब ख़्वाजा हाफ़िज़ पर ‘ज़िक्र-ए-हाफ़िज़’। और ‘नुकूश-ए-ज़िंदाँ’ पाकिस्तानी जेल से उनके वो ख़ुतूत जो उन्होंने अपनी बेगम रज़िया सज्जाद ज़हीर के नाम लिखे। मगर इससे भी ज़्यादा उनका वो रौशन स्वभाव है, जो नये मन में स्थानान्तरित होता रहेगा। वो बीसवीं सदी के इतिहास का एक अहम अध्याय है।
(रिफ़अत सरोश के इस उर्दू लेख का हिन्दी अनुवाद ज़ाहिद ख़ान और इशरत ग्वालियरी ने किया है।)





