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*कहानी : ऊर्जा-प्रवाहों का विज्ञान*

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             पुष्पा गुप्ता

    आध्यात्मिक रहस्यों के विज्ञान तंत्र के प्रयोगधर्मी साधक बिहार-मिथला क्षेत्र के दरभंगा रियासत के नरेश  रमेश्वरसिंह का जीवनक्रम किसी विलक्षण अनुष्ठान से कम न था। वे नित्य दो बजे रात्रि को उठकर शय्या पर ध्यान का एक क्रम संपूर्ण कर लेते थे। उसके पश्चात साढ़े तीन बजे स्नान आदि से निवृत्त होकर एक मन चावल का नित्य पिंडदान करते थे। उसके पश्चात लिंग-पूजन ब्रह्ममुहूर्त में ही भगवती मंदिर में। यहाँ पर वे तांत्रिक संध्या करने के बाद तांत्रिक विधान के अनुसार पात्र स्थापन करते थे।तदुपरांत कुमारी, सुवासिनी, बटुक, सामयिकों का पूजन-तर्पण करके महाप्रसाद ग्रहण करने के बाद दस बजे तक तैयार हो जाते थे।

    एक घंटे के विश्राम के बाद ११ बजे से साढ़े तीन बजे तक राज्य का कार्य देखते थे। इसके पश्चात स्नानादि करके वैदिक संध्या संपन्न करके प्रदोष काल में पार्थिव पूजन संपन्न करके निशाकाल में भगवती का सांगोपांग निशार्चन संपन्न करते थे। अपने संपूर्ण जीवन को महाअनुष्ठान में परिवर्तित करने वाले महाराज उच्च शिक्षित एवं महान विद्वान थे। अँगरेजी, फ्रेंच, बँगला, हिंदी एवं संस्कृत पर उनका पूर्ण अधिकार था। तंत्रशास्त्र के उच्चकोटि के विद्वान होने के साथ वेदांत, सांख्य, योग एवं व्याकरण पर उनकी पारगामिता थी।

    याचकों को मुँहमाँगा दान देने वाले, प्रजावत्सल, न्यायप्रिय नरेश की एक तीव्र इच्छा थी कि तंत्र की वैज्ञानिकता से लोग सुपरिचित हों। इसीलिए वर्ष १९०८ ई० के जाड़े के दिनों में उन्होंने दरभंगा में विशिष्ट विद्वानों का सम्मेलन बुलाया था। इसमें विद्वान ब्राह्मणों एवं मनीषी साधकों के साथ विज्ञानवेत्ता वैज्ञानिक भी थे। जैसे वैद्यनाथ धाम के प्रकाशानंद झा, काशी के शिवचंद्र भट्टाचार्य, श्रीविद्या के महान साधक सुब्रह्मण्यम् शास्त्री, कलकत्ते की आगम अनुसंधान समिति के अध्यक्ष जॉन वुडरफ (आर्थर एव्लन) थे।  जॉन वुडरफ को  वह श्रेय जाता है कि उन्होंने तंत्र के रहस्यों को सर्वप्रथम पश्चिमी जगत में उद्घाटित किया था। सर जॉन वुडरफ के साथ ब्रिटेन के महान चिकित्सा वैज्ञानिक इवान स्टीवेन्सन एवं भौतिक शास्त्री विलियम हॉपकिन्सन भी आए थे। इस अवसर पर महाराज के मित्र पटियाला नरेश भूपेंद्रसिंह भी पधारे थे। दरभंगा नरेश की मित्रता ने इन्हें भी शक्तिसाधक बना दिया था। महाराज पिछले कई दिनों से स्वयं इन अतिथियों को दरभंगा के आस-पास तंत्र-साधनास्थलों के दर्शन करा रहे थे। इसी क्रम में उनका सहरसा क्षेत्र भी जाना हुआ। यहीं पास महिषी में भगवती उग्रतारा पीठ है।

    सम्मेलन की अध्यक्षता का भार शिवचंद्र भट्टाचार्य पर था, जिन्होंने स्वयं महाराज को तंत्र-साधना के लिए विशिष्ट मार्गदर्शन दिया था। इसी के साथ वे जॉन वुडरफ के भी दीक्षा गुरु थे। महाराज जी की प्रेरणा से ही सर जॉन वुडरफ ने पंडित शिवचंद्र भट्टाचार्य से शक्ति-साधना की दीक्षा ली थी। वे कह रहे थे- “तंत्र दरअसल सृष्टि के विराट अस्तित्व में एवं व्यक्ति के स्वयं के व्यक्तित्व में प्रवाहित विविध ऊर्जा प्रवाहों के अध्ययन-अनुसंधान एवं इनके सार्थक सदुपयोग का विज्ञान है। तंत्र मानता है कि जीवन एवं सृष्टि का हर कण शक्ति से स्पंदित एवं ऊर्जस्वित है। यह बात अलग है कि कहीं यह शक्ति-प्रवाह सुप्त है तो कहीं जाग्रत। इस शक्ति की अभिव्यक्ति यों तो अनंत रूपों में है, पर इसकी मूलतः दशमहाधाराएँ हैं, जिन्हें दशमहाविद्या कहा जाता है।”

    शिवचंद्र भट्टाचार्य तंत्र के मूलभूत वैज्ञानिक सत्य को उद्घाटित कर रहे थे। वे बता रहे थे कि विराट ब्रह्मांड में प्रवाहित ये शक्ति प्रवाह व्यक्ति में प्राण-प्रवाह के रूप में प्रवाहित हैं। ब्रह्मांड में इन्हीं प्रवाहों से सृष्टि-सृजन हुआ है। इसी के साथ उन्होंने निवेदन किया कि व्यक्ति में प्राण-प्रवाह के रूप में प्रवाहित इन शक्ति-धाराओं का स्वरूप विवेचन महाराज रमेश्वरसिंह करेंगे एवं ब्रह्मांडव्यापी इनके स्वरूप की विवेचना स्वयं सुब्रह्मण्यम् शास्त्री करेंगे। आचार्य शिवचंद्र के इस निर्देश को थोड़ा संकोचपूर्वक स्वीकारते हुए महाराज उठे। उनका भरा हुआ गोल चेहरा, रौबदार मूँछें, औसत कद, गेहुँआ रंग, माथे पर श्वेत भस्म का ऊर्ध्व तिलक उन्हें भव्य बना रहे थे।

    उन्होंने कहना प्रारंभ किया- “योगशास्त्र में वर्णित पाँच प्राण एवं पाँच उपप्राण ही दरअसल व्यक्ति के अस्तित्व में व्याप्त दशमहाविद्याएँ हैं, जो व्यक्ति को विराट से जोड़ती हैं। इनमें आदिविद्या महाकाली एवं तारा अपान एवं इसके उपप्राण कूर्म के रूप में जननेंद्रिय में वास करती हैं। षोडशी एवं भुवनेश्वरी प्राण एवं इसके उपप्राण नाग के रूप में हृदय में स्थित हैं। भैरवी एवं छिन्नमस्ता उदान एवं देवदत्त के रूप में कंठ स्थान में निवास करती हैं। धूमावती एवं बगलामुखी समान एवं कृकल के रूप में नाभिप्रदेश में स्थित हैं। मातंगी एवं कमला व्यान एवं धनंजय के रूप में मस्तिष्क में अवस्थित हैं।”

     ऐसा कहकर महाराज थोड़ा रुके और बोले- “मैंने महामाया के इन रूपों का स्वयं में इसी तरह से साक्षात्कार किया है।”

    महाराज के अनुभवपरक ज्ञान ने सभी को विमुग्ध किया। आचार्य शिवचंद्र का संकेत पाकर महाराज के बैठने के पश्चात सुब्रह्मण्यम् शास्त्री उठे। इन्होंने अभी कुछ वर्षों पूर्व महाराज रमेश्वरसिंह को तंत्र-साधना की साम्राज्य मेधा नाम की विशिष्ट दीक्षा दी थी। उनका स्वर ओजस्वी था। उन्होंने गंभीर वाणी में कहना प्रारंभ किया :

    “इस अखिल ब्रह्मांड में आदिविद्या महाकाली शक्ति रात्रि १२ से सूर्योदय तक विशेष सक्रिय रहती हैं। ये आदि महाविद्या हैं। इनके भैरव महाकाल हैं और इनकी उपासना महारात्रि में होती है। महाविद्या तारा के भैरव अक्षोम्य पुरुष हैं। इनकी विशेष क्रियाशीलता का समय सूर्योदय है एवं इनकी उपासना का विशेष समय क्रोधरात्रि है। षोडशी, जो श्रीविद्या हैं, इनके भैरव पंचमुख शिव हैं। इनकी क्रियाशीलता का समय प्रातःकाल की शांति में है।

    इनका उपासनाकाल दिव्यरात्रि है। चौथी महाविद्या भुवनेश्वरी के भैरव त्र्यंबकशिव हैं। सूर्य का उदयकाल इनका सक्रियताकाल है। इनकी उपासना सिद्धरात्रि में होती है। पाँचवीं महाविद्या भैरवी हैं। इनके भैरव दक्षिणामूर्ति हैं। इनका सक्रियताकाल सूर्योदय के पश्चात है। इनकी उपासना कालरात्रि में होती है। छठवीं महाविद्या छिन्नमस्ता हैं। इनके भैरव कबंधशिव हैं। मध्याह्न सूर्य का समय इनका सक्रियताकाल है। इनका उपासनाकाल वीररात्रि है।

    धूमावती सातवीं महाविद्या हैं। इनके भैरव अघोररुद्र हैं। मध्याह्न के पश्चात इनका सक्रियताकाल है एवं इनकी उपासना दारुणरात्रि में की जाती है। बगलामुखी आठवीं महाविद्या हैं। इनके भैरव एकवक्त्र महारुद्र हैं। इनकी सक्रियता का समय सायं है। इनकी उपासना वीररात्रि में होती है। मातंगी नौवीं महाविद्या हैं, इनके भैरव मतंगशिव हैं। रात्रि का प्रथम प्रहर इनका सक्रियता काल है। इनकी उपासना मोहरात्रि में होती है। भगवती कमला दशम महाविद्या हैं। इनके महाभैरव सदाशिव हैं, रात्रि का द्वितीय प्रहर इनका सक्रियताकाल है। इनकी उपासना महारात्रि में की जाती है। इन दश महाविद्याओं से ही सृष्टि का व्यापक सृजन हुआ है। इसलिए ये सृष्टिविद्या भी हैं।

    इसी के साथ महाराज द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में तंत्र विज्ञान की व्यापक परिचर्चा होते-होते साँझ हो आई। महाराज की विशेष अनुमति लेकर उनकी सायं ‘साधना के समय जॉन वुडरफ के साथ आए वैज्ञानिकों ने महाराज का विभिन्न यंत्रों से परीक्षण किया।

     इस परीक्षण के बाद उन्हें आश्चर्यपूर्वक कहना पड़ा कि ध्यान-तंत्रसाधक में प्राण विद्युत एवं जैव चुंबकत्व सामान्य व्यक्ति की तुलना में आश्चर्यजनक ढंग से अधिक होता है। 

   उनके इस कथन पर महाराज रमेश्वरसिंह हँसते हुए बोले- “दरअसल यह दृश्य के साथ अदृश्य के संयोग के कारण है। इसका वैज्ञानिक अध्ययन ज्योतिर्विज्ञान के अंतर्गत होता है।”

Ramswaroop Mantri

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