डॉ. विकास मानव*
(मनोचिकित्सक/ध्यानप्रशिक्षक)
_धर्म जिन्हें देवात्मा- प्रेतात्मा कहता है, विज्ञान उन्हें पॉजिटिव- निगेटिव एनर्जी कहता है_.
प्रेतात्माओं के छायाचित्र खींचे जा सकते हैं। इसके सबसे बड़े साक्षी हैं--विश्वविख्यात वैज्ञानिक 'सर विलियम क्रुक्स' और 'सर आलिवर लाज'। सर क्रुक्स को प्रेत जगत से अपनी मृत पत्नी के छायाचित्र भी प्राप्त हुए थे।
_विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों और परामनोवैज्ञानिकों का एक दल अमेरिका के 'साइकिक रिसर्च फाउंडेशन' के तत्वावधान में प्रेतात्माओं के अध्ययन में व्यस्त हैं। उनका कहना है--प्रेतात्माएँ हमारी भावनाओं से प्रभावित होती हैं।_
वे प्रभावित व्यक्ति के मन में ही जन्म लेती हैं और उनके सारे कार्य-कलाप उस व्यक्ति की भावनाओं के अनुरूप ही होते हैं। बाह्य जगत की किसी घटना के फलस्वरूप न भूतों का जन्म होता है और न ही उससे वे प्रभावित होते हैं।
_वैज्ञानिक यह मानते हैं कि मानव सदा अदृश्य ऊर्जाओं के सागर में तैरता रहता है। प्रत्येक मानव अपने विचारों के अनुसार अपनी इन्द्रियों द्वारा इन ऊर्जाओं को ग्रहण करता है और उनमें इच्छानुसार परिवर्तन करके बाह्य जगत पर उनका प्रक्षेपण करता रहता है।_
भूत-प्रेतों का जन्म ऐसे ही प्रक्षेपणों के अनुसार होता है। वैज्ञानिक इस चौंका देने वाले निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इस प्रकार के प्रक्षेपणों के दौरान प्रेत-बाधित व्यक्ति के शरीर से जो अदृश्य ऊर्जा विसर्जित होती है, वह परमाणु विस्फोट से विसर्जित ऊर्जा के समान प्रचण्ड और विनाशकारी होती है।
जो लोग अंधत्व या पूर्वांग्रह के कारण अदृश्य शक्तियों को नकारते हैं, वे व्हाट्सप्प 9997741245 पर डिस्कस करने के बाद, हमसे मिलकर प्रमाण ले सकते हैं. मेरे सामने एक बहुत बड़ा रहस्य खुला था. तब समझ आया की अधिकांश प्रेतात्माएँ क़िस कारण विनाशकारी कार्यों में ही अधिक रूचि लेती हैं।
_प्रेतों के प्रत्येक कौतुक के पीछे एक और भी शक्ति है जो चेतोपदेशीय केंद्रों को कोशिकाओं से प्राप्त कर शरीर के ताप को विद्युत् शक्ति में परिवर्तित कर देती है। जब इस मानसिक शक्ति के सहारे बाह्य जगत पर कोई प्रक्षेपण किया जाता है तो मस्तिष्क इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटरिंग यंत्र के समान सक्रिय हो जाता है।_
सन् 1944 में विश्वविख्यात अमेरिकी भौतिक शास्त्री 'जॉर्ज गैमो' ने एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया था जिसके अनुसार यह सम्भव है कि परमाणुओं के किसी वर्ग के संघात में अन्तर्वर्तित प्रतिरूप धारण करने पर सारी शक्ति एक ही स्थान पर केंद्रित हो जाये। ऐसी स्थिति में कौतुक होंगे। जैसे--अंगीठी के कोयले अपने आप जलने लगे, मल-मूत्र गिरने लगे, एकाएक ईंट-पत्थरों की वर्षा होने लगे, कपड़ों में आग लग जाये।
_वे सब प्रेतात्माओं के कौतुक जैसे ही होंगे। मगर मात्र संयोग से परमाणुओं की ऐसी सक्रियता की संभावना बहुत कम है। पर इरादी कोशिशों में ऐसा कभी भी किया जा सकता है। इस सन्दर्भ में आपको यह भी बतला दूँ कि प्रेतों के कारण हुई अलौकिक घटनायें चंचल मन के व्यक्ति की ऐसी ही इरादी कोशिशों के फलस्वरूप होती है।_.
प्रेतलीला और प्रेतों के कौतुकों की यही वैज्ञानिक व्याख्या है।(चेतना विकास मिशन)





