डॉ. विकास मानव
विभिन्न स्थानों पर भाषाई उच्चारण दोष के कारण लोगों के नाम का उच्चारण जगह जगह पर बदल जाता है जैसे कि भारत मे ही भगवान राम दक्षिण में रमण हैं और बंगाल में रामो।
कभी कभी कोई स्वर भी उच्चारण में जुड़ जाता है जैसे कि ब्रम्ह का उच्चारण अब्राहम या इब्राहिम हो सकता है।
राम का उच्चारण रिम (Reim) हो सकता है जिसका मन्दिर फ्रांस में पेरिस के पास है या फिर रोम भी हो सकता है क्योंकि आज के इजिप्ट (Egypt) का मूल नाम अजापति (Aegypt, इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका देखें) है जो भगवान राम का नाम भी है।
इंग्लैंड में अनेक शहरों के नाम मे शायर (ईश्वर) लगा हुआ है जैसे लंकाशायर, यॉर्कशायर आदि जैसे भारत में भुवनेश्वर, महावलेशर, गढ़मुक्तेश्वर आदि।
इंग्लैंड में तो एक शहर का नाम रुद्री भी है। अगर कैंटरबरी (Canterbury) मे सी का उच्चारण स करें (जैसे सीमेंट मे) तो कैंटरबरी शंकरपुरी (bury= पुरी) जैसा भी प्रतीत होता है।
उसी प्रकार बंगाल में लक्ष्मी को लखी बोलते और कृष्णा को क्रिस्टो कहते हैं। तब अगर कृष्ण का उच्चारण दुनियां किसी भाग में क्राइस्ट भी तो हो सकता है। लेकिन कुपढ़ ज्ञानशून्य इन बातों को नहीं मानेंगे क्योंकि इस से आग नहीं लग सकता।
अगर आप कृष्ण और क्राइस्ट के जन्म कथा को देखें तो कुछ आश्चर्यजनक समानता दिखेंगी।
जैसे :
दोनो का जन्म घने अंधेरे काले रात में होता है। दोनो के जान को वहां के राजा से खतरा है। दोनो को पैदा होते ही जन्म स्थान से तुरन्त हटा दिया जाता है।
क्राइस्ट की माता मैरी अक्षतयोनि (चिर कुमारी है) और कृष्ण का जन्म जगद जननी मां जगदम्बा से जुड़ा है, इत्यादि इत्यादि जो एक गहन शोध का विषय है।
समानता को मिटाने के लिए क्राइस्ट के जीवन का बारह वर्ष की उम्र से लेकर पच्चीस वर्ष का हिस्सा ही गायब है। कुछ लोग कहते कि इस बीच वे कश्मीर में थे तो कुछ केरल बताते हैं। मजे की बात यह है की कृष्ण ने जब कंस वध किया था उस समय उनकी उम्र लगभग ग्यारह बारह वर्ष थी और करीब पच्चीस वर्ष की उम्र में वे मथुरा से द्वारका चले गए थे।
कुछ आया समझ में?
अब आगे बढ़ते हैं :
ईसाई धर्म रोमन साम्राज्य के पतन के बाद शुरू हुआ और रोमन में इसको X-मस भी कहते। रोमन लिपि के गिनती में X को दस कहते हैं।
वैदिक भारत में इस महीने को आकाशीय विभाजन के हिसाब से दसांबर (अम्बर, आकाश का दसमा भाग) कहते थे, वही दसांबर अब दिसम्बर महीना है।
मैं पहले भी कहता रहा हूं वैदिक (सनातन) धर्म में त्योहार सारे सायन (सौर) गणना से होते थे और निर्यन गणना का उपयोग केबल गुप्त अनुष्ठान करने वाले तांत्रिक लोग ही करते थे।
सायन गणना के हिसाब से सूर्य का संक्रमण मकर राशि मे पच्चीस दिसम्बर से पहले हो जाता है। ज्योतिष शास्त्र में मकर राशि कालपुरुष की कुण्डली मे दसवां राशि है जो रोमन X से लिखा जायेगा। सूर्य का दशम राशि मे भ्रमण दसवां मास है (X-मास)। यह भ्रमण माघ (मार्गशीर्ष) महीना कहलाता है और गीता मे कृष्ण कहते “मासानाम मार्गशिर्षोहम”।
इस प्रकार क्रिसमस अर्थात् X-मस मूल रुप से भगवान कृष्ण की पूजा के लिए था जिस मे सफेद दाढ़ी वाला बूढ़ा (नन्द बाबा) बच्चों को मिठाईयां बांटता है जो हर्ष का प्रतीक।
कुछ लोग कह सकते हैं कि मैं जबर्दस्ती कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा लेकर भानुमती का कुनबा जोड़ रहा हूं। तो उन से मेरा प्रश्न है अंग्रेजी तारीख बारह बजे रात (मध्य रात्रि) से क्यों बदल जाता है। यह प्रत्यक्ष प्रमाण है क्रिसमस अर्थात् X- मास (दसम महीना) के वैदिक होने का।
हमारे हैं दिन (तिथि) विचार सूर्योदय से होता है। अक्षांशतर जानने वाले जानते हैं कि जब हमारा शुबह होता है तो इंग्लैंड (ग्रिनमिंविच टाइम से) में उधर मध्यरात्रि होता है (करीब साढ़े पांच घंटा पीछे) वहां के गणितज्ञों ने तो इनामदारी वरती लेकिन हमारे तथाकथित धर्म के प्रवर्तकों ने तो सनातन परम्परा का केबल विनाश ही किया है।





