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*सिद्ध संत का लेखन* 

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    डॉ. विकास मानव

किसी भी प्रकार का लेखन वो चाहे ग्रंथ हो पुस्तक हो आलेख हो या कोई पंक्ति हो अगर वास्तविक संत ने लिखा है तो उसे समझने के लिए उस तरह की ही दृष्टि रखनी होगी। 

    संतत्व वहां से शुरू होता है जहां से पुस्तक बंद होती हैं। पुस्तकों के अंदर की बातें ऐसा संत नहीं करता है। उसकी की यात्रा पुस्तक के अंदर से नहीं हो सकती है। उस की यात्रा की शुरुआत ही आँख बंद करके होती है। इसलिए वहां पुस्तक काम नहीं करती हैं। 

   पुस्तक से यहाँ अर्थ है पोथी पुराण, मंत्र, तंत्र, योग, ध्यान, परमात्मा, गुरु। अनुभव सिद्ध के लिए गुरु भी अर्थहीन है। उस के पास न गुरु है, न परमात्मा है और न ही कोई अन्य मार्ग दर्शिका है।

     हर संतमार्गी का अलग तरह की यात्रा है। आप किस रास्ते जाएंगे आपको तय करना है। अगर आपके चित्त में पहले से गुरु है, परमात्मा है, कोई मंत्र, तंत्र, योग या ऐसा ही कुछ है तो वो जगत की यात्रा होगी न की संत-लेखक की। तो हर मौलिक संत की खोज नई होगी | नया तभी संभव है जब पहले से ही पुराना सब कुछ छूट गया हो।

    विभिन्न विषयों पर बहुत सारे ग्रंथ, आलेख और छोटे छोटे लेख जो संन्यासियों ने लिखे हैं इस जगत में उपलब्ध हैं | ध्यान रहे, ये संन्यासी हैं। हमेशा कुछ न कुछ का समाधान खोजने वाले वैज्ञानिक हैं। कुछ नया ही लेकर आएंगे। इस बात को ठीक से समझ लें जो भी ग्रंथ संन्यासी के लिखे होंगे वो भौतिकता पर आधारित नहीं हो सकते हैं।

     अगर चिकित्सा का ग्रंथ हैं। लेकिन चिकित्सा शरीर की नहीं। चिकित्सा शरीर को शून्य करने की | संन्यासी के लिए शरीर का होना ही रोग है। अगर संन्यासी चिकित्सा की बात करेगा तो कर्म जनित रोगों की चिकित्सा पर बात होगी। 

    संन्यास का अर्थ परिवार या कुछ भी छोड़ना नहीं, स्वयं को पकड़ना और जीना है. सन्यास मार्ग में बहुत सारे व्यवधान आते हैं। हर किसी के अपने अनुभव होते हैं। कुछ बातें सभी में समान होती हैं। जैसे सभी कर्मों का समाधान होने से पूर्व ही शरीर समाप्त हो जाता है। इसका समाधान सभी को चाहिए। 

    पहले होश रहते सभी कर्मों का नाश हो जाए फिर शरीर छूटे। फिर शरीर छोड़ने में किसी को दिक्कत नहीं होगी। रसायन विद्या और रसायन विज्ञान संन्यासियों की इसी दिशा की खोज है। अजर अमर रहेंगे कब तक जब तक सभी कर्मों का समाधान नहीं हो जाता है।

      ये अलग बात है कालांतर में लोगों ने उसमें अपने अर्थ घुसेड़ दिए हैं। उन्होंने इस अजर और अमर होने की बात कह कर कल्प आदि से जोड़ दिया। संन्यासी तो खुद ही शरीर को छोड़ने की दिशा में है वो क्यों अजर अमर होना चाहेगा।

      संन्यासी चाहता है जब तक सभी पूर्व जन्मों के कर्मों का समाधान न निकल जाए तब तक शरीर न छूटे। अन्यथा अगला जन्म किसका और कैसे होता है। फिर यहीं लटके रहेंगे। इसलिए मरने से पहले ही सब प्रकार से मुक्त होने के लिए रस विद्या और रस विज्ञान की खोज की गई।और जो लोग संन्यास मार्ग में हैं, उनके मार्ग दर्शन के लिए रस विज्ञान पर ग्रंथ लिखे गए। 

      संन्यासी अकारण लिखेंगे भी नहीं | अन्यथा उनसे भ्रम और गहरा हो जाता है। इस बात को सभी ध्यान में रखें संन्यासियों ने तत्व ग्रंथ या तत्व विवेचन संन्यासियों के लिए लिखे हैं। बाद में लोगों ने इनमें अपने अर्थ घुसा दिए हैं।

     संन्यासी अपनी गति अपनी विद्या का उपयोग अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए करता है न कि श्वानों के समक्ष यह सिद्ध करने के लिए कि वही विद्वान और धर्मवेत्ता है। हमें किसी को यह समझाने की आवश्यकता नहीं कि हम ही बेहतर हैं। 

     अपना मूल्य साबित करने के लिए अपना समय और ऊर्जा बर्बाद न कर उन्हें सकारात्मक प्रयासों में लगाएं। वह करें जो मनोनुकूल हो।

     सबसे अधिक वही लोग ही हमारा मूल्यांकन करते हैं, जिनका खुद कोई विशेष मूल्य नहीं होता। इसलिए हर किसी को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। जीवन में यही राह अपनाना श्रेयस्कर है।

    अधिकांश लोगों के पास ब्लड ग्रुप के अलावा कुछ पॉजिटिव नहीं होता है और जिनका पॉजिटिव हो तो वे भी ‘ निगेटिव ‘ हो सकते हैं।

Ramswaroop Mantri

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