-सुसंस्कृति परिहार
लोग कह रहे हैं कि हमारे साहिब ने बर्रइयों के छत्ते में हाथ डालकर ठीक नहीं किया है सारी दुनियां में बी बी सी की लोकप्रियता है वह ब्रिटिश सरकार की गोद में नहीं खेलता।साफ साफ कहने में उसे डर भी नहीं लगता। जैसा कि हमारे देश में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया को खरीदकर साहिब देश की असलियत सामने नहीं आने देते वह चाहे पुलवामाकांड , राफेल घोटाला हो या राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा आदि हो ।वे सब मनगढ़ंत कहानियां सुनाते रहते है। वे नहीं जानते कि भूमंडलीकरण के इस दौर में जब सारी दुनिया मुट्ठी में हो तब बी बी सी की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म इंडिया द मोदी क्वश्चन प्रतिबंध लगाने के बावजूद वह भारत और विदेशों में करोड़ों भारतीयों ने देखी जिसमें 2002के गुजरात दंगों में साहिब और शाह जी की जो सच्चाई उजागर हुई है उससे शाह और साहिब की जोड़ी बिलबिला गई है और इसकी वजह से बी बी सी पर छापामारी की जा रही है।वे उसे डराने या खरीदने की पुरजोर कोशिश में लगे हुए हैं पर यह भारत की तरह बिकी हुई मोदी मीडिया नहीं है आगे स्थितियां क्या मोड़ लेती हैं ये तो वक्त बताएगा।
भारत में मीडिया पर छापों का लंबा चौड़ा इतिहास है।याद करिए न्यूज़ क्लिक” पर 114 घंटे तक ईडी का छापा, फिर आयकर का छापा, “भारत समाचार” पर इनकम टैक्स छापा, “दैनिक भास्कर” पर इनकम टैक्स छापा, “एनडीटीवी” पर इनकम टैक्स छापा, “द क्विंट” पर इनकम टैक्स छापा, “द वायर” पर मुकदमा “एचडब्ल्यूएल” न्यूज पर इनकम टैक्स का छापा, बीबीसी, स्वर्गीय विनोद दुआ पर देशद्रोह का केस, अभिसार शर्मा पर ₹14 करोड़ के चोरी का मुकदमा, अभिसार शर्मा, पुण्य प्रसून बाजपेई, मिलिंद खांडेकर, रवीश कुमार, अजित अंजुम की नौकरी छीन लेना। नेशनल हैराल्ड पर अनावश्यक तौर पर सोनिया गांधी जी और राहुल गांधी को घंटों कई दिनों की पूछताछ कर उन्हें परेशान करना । ये सब वे मीडिया संस्थान और पत्रकार हैं जो सरकार से सवाल पूछने पर प्रताड़ित और परेशान किये गये है।
आइए थोड़ा बी बी सी के इतिहास पर नज़र डाल लें बीबीसी को पहले विश्व युद्ध के दौरान 14 नवम्बर १९२२ में स्थापित किया गया था, जो एक उस समय के न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का हिस्सा था। यूं तो बीबीसी एक स्वायत्त संस्था है , पर ये ब्रिटिश सरकार के अधीन और जवाबदेह है। इसकी अपनी कोई कमाई नहीं होती , इंग्लैंड की पार्लियामेंट में इसका वित्तीय बिल पेश होकर पास होता है। चूंकि यह ब्रिटिश नागरिकों के टेक्स के पैसे से चलती है , इसलिए एक सर्वे करा कर उनसे उनकी राय ली जाती है।इस साल सर्वे में 75 % ब्रिटिश नागरिकों ने बीबीसी की कार्यप्रणाली पर इत्मीनान का इज़हार किया। ब्रिटिश पार्लियामेंट ने 1.18 मिलियन पाउंड का बजट बीबीसी के लिए मन्ज़ूर किया है इसका तात्पर्य यह है किसी बी बी सी ब्रिटिश नागरिकों के लिए ज्यादा जिम्मेदार है इसीलिए वह स्वायत्त संस्था है और सरकार के खिलाफ भी मुद्दे उठाता है। भारत में बीबीसी लंदन से हिन्दी में प्रसारण पहली बार 11 मई 1940 को हुआ था। इसी दिन विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे। 02 दिसंबर 2021 को बीबीसी ने अपने श्रोताओं, दर्शकों और यूज़र्स की संख्या बताने वाली वार्षिक रिपोर्ट जारी की है जिसके मुताबिक़ सारी दुनिया में बीबीसी की सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले सबसे ज़्यादा लोग भारत में हैं। इसे आज भी पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा विश्वसनीय माना जाता है।बी बी सी का कहना है “हमारा जो विश्वास का रिश्ता अपने दर्शकों के साथ है उसके केंद्र में निष्पक्षता है। हम अपने हर कंटेंट में हर विषय को पूरी निष्पक्षता के साथ सामने रखेंगे ताकि सभी तरह के विचार सामने आ सकें। हम सभी अहम तथ्यों को ईमानदारी और खुले दिमाग के साथ परखेंगे.”
उम्मीद है भारत और ब्रिटिश मीडिया खासतौर पर बी बी सी का फ़र्क आपको समझ आ गया होगा। यहां वे लोग प्रताड़ित हैं जो सच कहने वाले हैं। सरकार से नहीं डरते।इस कड़ी कई प्रशासनिक अधिकारी, न्यायधीश, लेखक,कवि, समाजसेवी, संस्कृतिधर्मी भी शामिल हैं ।इसके ठीक विपरीत वे लोग जो सरकार की तारीफ करते नहीं अघाते ,उनकी मंशानुरूप अपराधिक कृत्य खुलेआम करते हैं वे सम्मानित हैं।
जबकि पत्रकार का उत्तर दायित्व सच से रूबरू कराना है।हाल ही में हिडनबर्ग रिपोर्ट लिखने वाले अमरीका शोध संस्थान से जुड़े खोजी पत्रकार नाथन एंडरसन ने कड़ी मेहनत कर विश्व के नंबर दो रईस गौतम अडानी को अर्श से फर्श पर ला दिया।ये ईमानदार खोजी पत्रकार की ताकत होती है।बी बी सी की भी ऐसे ही शोध के बाद बनी डाक्यूमेंट्री इंडिया द मोदी क्वेश्चन भी सच की तस्वीर पेश करती है।लगता है अब एक के बाद बी बी सी अन्य विषयों पर फिल्में बना सकता है जिससे भाजपा सरकार के परखच्चे उड़ सकते हैं।बी बी सी को छेड़कर सरकार ने आ बैल मुझे मार की स्थिति निर्मित कर दी है अब इस झमेले से बचना मुश्किल ही लगता है क्योंकि वह बिकाऊ संस्थान नहीं है इसकी निष्पक्षता की माला साहिब भी कई बार जप चुके हैं।इस समय भारतीय मूल के श्रृषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हैं वे भी इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं क्योंकि ये मीडिया की न अपनी निजी स्वायत्तता है।




