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*ताकि सनद रहे : आपातकाल में लोकसभा’ की समीक्षा*

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जाहिद खान 

राजगोपाल सिंह वर्मा का नाम आज किसी तआरुफ़ का मोहताज नहीं। बीते पांच साल में ऐतिहासिक सब्जेक्ट पर उनकी एक के बाद एक कई किताबें प्रकाशित हुई हैं। साल 2020 में ‘बेगम समरू का सच’ (संवाद प्रकाशन) से शुरू हुआ ये सिलसिला ‘सुभाष—एमिली अधूरे प्रेम की पूरी कहानी’ (हिन्द—युग्म प्रकाशन) तक पहुंच गया है।

इस दरमियान उनकी तक़रीबन एक दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। हिन्दी में वे बिल्कुल अछूते मौज़ू पर लिख रहे हैं। और फिर उनकी रफ़्तार के क्या कहने ! एक किताब पर चर्चा की इब्तिदा नहीं होती, कि दूसरी बाज़ार में आ जाती है। बहरहाल, मैं बात करना चाहता था, ‘…ताकि सनद रहे आपातकाल में लोकसभा’ पर, लेकिन एक महीने के अंदर उनकी दूसरी किताब आ गई। नई किताब पर बात फिर कभी। 

फ़िलहाल ‘…ताकि सनद रहे आपातकाल में लोकसभा’ का ही तज़्किरा करते हैं। यह किताब जैसा कि टाइटल से ब—ज़ाहिर है, इमरजेंसी के दौरान लोकसभा की कार्यवाही पर केन्द्रित है। किताब के ब्लर्ब पर ख़ुद लेखक यह एतिराफ़ करते हैं कि ”किताब किसी नज़रिए की नुमाइंदगी नहीं करती, बस पृष्ठभूमि और सन्दर्भ बताते हुए एक ऐतिहासिक विवरण पेश करती है, और वह यह कि आपातस्थिति घोषित होने के बाद लोकसभा में उस बारे में क्या बहस हुई।” और इस बहस को आज जानने की क्या ज़रूरत है ?

वह इसलिए कि आज से पचास साल पहले 25 जून, 1975 की आधी रात इमरजेंसी का ऐलान हुआ था, जो 21 मार्च 1977 तक यानी 21 महीने तक लागू रही। इमरजेंसी पर काफ़ी कुछ लिखा गया है और आगे भी लिखा जाता रहेगा। क्योंकि लोकतंत्र में इस तरह की अधिनायकवादी प्रवृत्ति को कभी सही नहीं माना जा सकता। राजनीतिक विरोधियों का दमन, नागरिक अधिकारों पर अंकुश और प्रेस पर सेंसरशिप तानाशाही की निशानी हैं। फिर जम्हूरियत के क्या मायने रह जाते हैं ! इस लिहाज़ से नई पीढ़ी को भी इसे अच्छी तरह से जानना-समझना चाहिए। ताकि उसकी एक समझ विकसित हो। 

यह बात सच है कि ‘…ताकि सनद रहे आपातकाल में लोकसभा’ किसी ख़ास नज़रिए की नुमाइंदगी नहीं करती। लेकिन लोकसभा की कार्यवाही को पढ़ते हुए, इमरजेंसी को लेकर सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष की सारी दलीलें हमारे सामने आ जाती हैं। यही नहीं उस दौर के देश-दुनिया के हालात का भी बहुत कुछ अंदाज़ा होता है। जिससे आप ख़ुद ही अपने निष्कर्ष निकाल सकते हैं। किताब के आग़ाज़ में ‘प्रस्तावना और पृष्ठभूमि’ के अंतर्गत लेखक ने आपातकाल की पृष्ठभूमि पर तो रौशनी डाली ही है, बल्कि वह इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि ”जिन इन्दिरा गांधी ने आपातकाल लगाया, उन्हीं इन्दिरा गांधी ने 18 जनवरी 1977 को नये चुनाव कराने का आदेश दिया था और पराजित होने के बाद आपातकाल हटाया।” साथ ही वे यह टिप्पणी भी करते हैं कि ”कोई भी ‘तानाशाह’ ऐसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव क्यों कराएगा ?” लेखक की यह टिप्पणी भी विचारणीय है कि ”देश में आपातकाल लागू करने की परिस्थितियों का कोई ज़िक्र नहीं किया जाता, क्यों शायद इसलिए कि ये तथ्य सार्वजनिक तानाशाही बनाम लोकतंत्र के सावधानीपूर्वक बनाये गये मिथक को ध्वस्त कर सकते हैं। आपातकाल लागू करने वाली परिस्थितियों को सार्वजनिक चर्चा से गायब कर दिया गया है।”

इस बात से थोड़ा—बहुत इत्तिफ़ाक़ जताया जा सकता है, लेकिन किसी भी हाल में इमरजेंसी अमल में लाने को जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। जम्हूरियत में यक़ीन रखने वाला हर शख़्स ऐसी किसी भी प्रवृति की आलोचना ही करेगा। ख़ुद इन्दिरा गांधी ने बाद में यह बात तस्लीम की थी कि यह क़दम ग़ैर—ज़रूरी था और इससे बचा जाना चाहिए था। कांग्रेस पार्टी ने भी आगे चलकर कभी इमरजेंसी लगाने का बचाव नहीं किया और इसके लिए समय—समय पर माफ़ी भी मांगी।  

दीगर किताबों की तरह लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा ने ‘…ताकि सनद रहे आपातकाल में लोकसभा’ पर भी काफ़ी मेहनत और रिसर्च वर्क किया है। इमरजेंसी के दरमियान जो लोकसभा की कार्यवाही हुई उसके साथ—साथ किताब के परिशिष्ट में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा निर्णीत वाद के मुख्य बिंदु—जिसके बाद आपातकाल लगाया गया, आपातकाल के सम्बन्ध में तत्कालीन राष्ट्रपति की उद्घोषणा और राष्ट्र के नाम तत्कालीन प्रधानमंत्री के पैग़ाम को शाए कर, उन्होंने किताब को दस्तावेज़ी शक्ल दे दी है। यही नहीं फुटनोट में सभी लोकसभा सदस्यों की संक्षिप्त जानकारी मसलन उनकी पार्टी, निर्वाचन क्षेत्र आदि पाठकों के इल्म में इज़ाफ़ा ही करेगी। क्योंकि इनमें कई ऐसे लीडर हैं, जिन्हें हम वक़्त गुज़रने के साथ भूलने लगे हैं।

जबकि भारतीय राजनीति और समाज में उनका एक बड़ा योगदान है। आपातकाल के दौरान लोकसभा में जो कार्यवाही हुई, सिर्फ़ उसी की बात करें, तो किताब इन अहम अध्यायों में बंटी हुई है—’लोकसभा सत्र 21 जुलाई 1975′, ‘आपातस्थिति की उद्घोषणा के अनुमोदन के सम्बन्ध में सांविधिक संकल्प पर चर्चा 21 जुलाई 1975’, ‘आन्तरिक सुरक्षा बनाये रखना (दूसरा संशोधन) विधेयक 23 जुलाई 1975’, ‘आन्तरिक सुरक्षा बनाये रखना (संशोधन) अध्यादेश 1975′,’संविधान (39वॉं संशोधन) विधेयक 25 जुलाई 1975’, ‘आन्तरिक सुरक्षा बनाये रखना (दूसरा संशोधन) विधेयक 25 जुलाई 1975’, ‘भारत रक्षा (संशोधन) विधेयक 28—29 जुलाई 1975’, ‘आर्थिक प्रगति के नये कार्यक्रम सम्बन्धी प्रस्ताव लोकसभा की कार्यवाही 31 जुलाई 1975’, ‘राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव 6,7,8 जनवरी 1976’, ‘राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव—जारी 9 जनवरी 1976’, ‘लोकसभा (कालाविधि विस्तारण) विधेयक लोकसभा, 3 फरवरी 1976’, ‘लोकसभा (कालाविधि विस्तारण) विधेयक लोकसभा, 4 फरवरी 1976’, ‘भारत रक्षा (धारा 6 का संशोधन) विधेयक—जारी 8 अप्रैल 1976’ और ‘संविधान के अन्तर्गत प्रदत्त स्वतन्त्रता की बहाली के बारे में संकल्प लोकसभा, 14 मई 1976’। 

ज़ाहिर है कि इन सभी अध्यायों में पूरी कार्यवाही का विस्तार से वर्णन है। सरकार का अपना पक्ष और विपक्ष का हल्ला बोल ! उस दौर की लोकसभा कार्यवाही को अगर देखें, तो पता चलता है कि सभी संसद सदस्य किस विद्वता के साथ अपना पक्ष रखते थे। बहस में उनका संसदीय अध्ययन देखते ही बनता था। इस पॉंचवी लोकसभा में सोमनाथ चटर्जी, इरा सेझियन, त्रिदिब चौधरी, इन्द्रजीत गुप्ता, पी.जी. मावलंकर, एस.एम. बनर्जी, ए.के. गोपालन, सरजू पाण्डे, झारखण्डे राय, बी. आर. भगत, बाबू जगजीवन राम, भागवत झा आज़ाद, शशि भूषण, मोहन धारिया जैसे पक्ष और विपक्ष के प्रभावशाली और अनुभवी सांसद थे।

यह बताना लाज़िमी होगा कि 1967 के बाद साल 1971 में लोकसभा चुनाव हुए। आज़ाद भारत का यह पॉंचवां आम चुनाव होने के साथ-साथ देश का पहला मध्यावधि चुनाव भी था। इस लोकसभा में 518 निर्वाचन क्षेत्रों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आर) के 352 साठ सांसद थे यानी पार्टी को पूर्ण बहुमत था। बैंकों के राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स की समाप्ति और ‘गरीबी हटाओ के नारे’ से श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने बेहतरीन प्रदर्शन किया था। वहीं संसद में   दूसरी बड़ी पार्टियॉं कम्युनिस्ट पार्टियॉं थीं। जिनमें सीपीआई (एम) के 25 सांसद और सीपीआई के 23 सांसद थे।

 12 जून, 1975 में कांग्रेस पार्टी को बड़ा झटका लगा। दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी राज नारायण की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें चुनावी भ्रष्टाचार में लिप्त पाया और उनके चुने जाने तक को ग़ैर-क़ानूनी बता दिया। इंदिरा गांधी पर चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का इल्ज़ाम लगा था। नतीजे में उन्होंने इस्तीफ़ा देने की बजाय देश में इमरजेंसी लगाने का ऐलान कर दिया। इंदिरा गांधी को अपने इस फ़ैसले की आगे सज़ा भी मिली और 1977 के आम चुनाव में उनकी पार्टी बुरी तरह से हारी। बावजूद इसके हमारे हुक्मरानों ने इस चुनाव से कोई सबक़ लिया हो, कहीं नहीं दिखाई देता। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर सरकारों के द्वारा ऐसे फ़ैसले लिए जाते हैं, जो इमरजेंसी ही की याद दिलाते हैं।

अकेले आपातकाल की जब—तब आलोचना और चर्चाएं करने भर से ही सरकारें अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकतीं, बल्कि उन्हें ऐसे अलोकतांत्रिक फ़ैसलों और तानाशाही कार्यवाहियों से बचना चाहिए, जो घोषित या अघोषित आपातकाल की याद दिलाते हैं। ‘ताकि सनद रहे आपातकाल में लोकसभा’ ‘सेतु प्रकाशन’ से प्रकाशित हुई है। किताब के लेआउट से लेकर कवर पेज़ और छपाई तक में सौंदर्यबोध स्पष्ट दिखाई देता है। पढ़ने के साथ ही किताब देखने में भी आँखों को भाती है। वहीं डिमाई आकार में 328 पेज़ की किताब के दाम 399 भी कोई ज़्यादा नहीं। कंटेंट के लिहाज से किताब की क़ीमत वाजिब है। और इसे पढ़ा जाना चाहिए। ताकि सनद रहे।

किताब : ‘ताकि सनद रहे आपातकाल में लोकसभा’, लेखक : राजगोपा सिंह वर्मा, पेज़ : 328, मूल्य : 399, प्रकाशक : सेतु प्रकाशन प्रा. लि. नोएडा। 

(

Ramswaroop Mantri

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