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बिकती बूतपूजा : मंदिरों ने बढ़ाए कथित भगवानों के दर्शन~शुल्क

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(मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा कहीं भी नहीं है ऐसा बाजार)

         ~ पुष्पा गुप्ता

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      तेल-गैस वेगैरह की तरह कतिपय मंदिरों ने दर्शन के वास्ते चार्ज बढ़ा दिया है. कमाई तो खूब करेंगे, मग़र टैक्स नहीं देंगे. सरकार में कर निर्धारण क़ानून बदलने की हिम्मत नहीं. वोट बैंक खिसकने का डर है, जो सत्ता और प्रतिपक्ष दोनों को सताता है।    वो दिन दूर नहीं, जब धर्माधीश तय करेंगे, कि उनके मतावलंबी अपनी कमाई का कितना हिस्सा ‘धर्म-कर‘ के रूप में दें। आस्था है, तो कराइये मंदिरों में जेबें ढीली.

       ~पुष्परंजन

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       एक गरीब आदमी जो अपने बाल-बच्चों के साथ माता-पिता को दर्शन कराने लाएगा, उसके तीन से पांच हजार रूपये सिर्फ बाबा के दरबार में इंट्री पर खर्च हो जायेगा। काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा की आरती करना इस साल और महंगा हो गया है।

      अब भक्तों को बाबा विश्वनाथ की मंगला आरती करने के लिए 350 रुपए की जगह 500 रुपए चुकाने होंगे। यानी पहले से 150 रूपये अधिक। सप्त ऋषि आरती, श्रृंगार भोग आरती और मध्याह्न भोग आरती के टिकट में भी 120 रुपये की वृद्धि की गई है।

       इन आरती के लिए 180 की जगह 300 रुपए देने होंगे। यह नया रेट 1 मार्च 2023 से लागू हो चुका है। भक्तों से मुद्रा-मोचन की यही व्यवस्था उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में लागू है। 1500 रुपए शुल्क चुकाइये, गर्भगृह में जाकर महादेव का जलाभिषेक कीजिए। इसके लिए जजमान को पंडे-पुजारियों के साथ जाने की ज़रूरत नहीं रहेगी। काबा की चर्चा करेंगे कभी, काशी में बाबा का दर्शन करना है, तो मोटा पैसा चुकाइये। 

उज्जैन में महाकालेश्वर के दर्शन के लिए 250 रुपए शुल्क देकर कतार में लग जाइये। मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी ने बताया कि रुद्राभिषेक के टिकट में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसके टिकट की कीमत 450 रुपए से लेकर 2600 रुपये, और उससे भी अधिक है।

     यह अंतर महाकालेश्वर की अर्चना कराने वाले शास्त्री की संख्या के आधार पर बदलती रहती है। सिर्फ एक शास्त्री के साथ रुद्राभिषेक में 450 रुपए लगेंगे। वहीं, 11 शास्त्री के साथ रुद्राभिषेक में 5500 रुपए लिए जाएंगे।

        काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी डॉ. सुनील वर्मा ने बताया कि 2018 में दर्शन शुल्क को शत-प्रतिशत लागू किया गया था। 2018 से पहले मंगला आरती में जाने वालों से शुल्क लिया जाता था, लेकिन वह शत-प्रतिशत लागू नहीं था। जिसकी इच्छा होती थी वह कूपन लेता था, और आगे की लाइन में खड़ा होकर बाबा की आरती देखता था। यों, बिना कूपन वालों को भी मनाही नहीं होती थी।

        अब सभी के लिए समान शुल्क लागू है। डॉ. सुनील वर्मा ने बताया कि चार साल बाद यह रेट 350 से बढ़ाकर 500 रूपये किया गया है। दर्शन शुल्क 180 से बढ़ाकर 300 रूपये किया गया। क्योंकि इस शुल्क से मंदिर रख-रखाव जैसे तमाम कार्य कराए जाते हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ी है, तो आय में भी वृद्धि हुई है, इस सच से इंकार नहीं कर सकते। न्यास बोर्ड के सीईओ ने बताया कि बाबा विश्वनाथ मंदिर को 2022-23 में 105 करोड़ रुपये दानस्वरूप मिला है।

       इस साल का बजट 40 करोड़ रुपए तय किया गया है। इतना ही नहीं, बोर्ड द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर में पूरे साल के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन किए जाने के लिए कैलेंडर तैयार किया जाएगा। एक इंटरनल कमेटी का गठन कर ट्रस्ट की डायरी मार्च महीने में छपवाने की तैयारी की जा रही है।

      बाबा देखते-देखते कारपोरेट व्यवस्था से नियंत्रित हो गये। विश्वनाथ मंदिर के समीप रहने वाले मनीष मर्तोलिया कहते हैं, ‘ धर्म का मूल स्वभाव सेवा है। परिसर को धर्मशाला मुक्त करके होटल युक्त कर दिया। अन्नक्षेत्र की जगह ‘फूड कोर्ट‘ बना दिया गया है। मंदिर का सेवा भाव कब का समाप्त हो चुका।

        पहले अमीर-गरीब एक साथ खाना खाते थे। अब अमीर फूड कोर्ट में बैठकर खाना खा रहे हैं, ग़रीबों का ठिकाना गली-कूचे में या कहीं और है। दर्शनार्थियों के लिए बने नये-नवेले होटलों का किराया आम आदमी के बटुए से बाहर हो चुका है।‘

कारपोरेटीकरण की बढ़ती दिशा को देखकर लगता है, कि काशी विश्वनाथ कारीडोर को पैसा वसूल की दृष्टि से क्योटो के बराबर कर देना है। प्रधानमंत्री मोदी इस महत्वाकांक्षी योजना के रणनीतिकार हैं।

       नई दुकानों में पुराने वालों को कितनी प्राथमिकता दी गई, वहां पहले वालों की लिस्ट से वेरीफाई कर सकते हैं। काशी विश्वनाथ के गिर्द पुराने बाशिंदों के साथ सपनों के सौदागर ने कितना छल किया, यह अलग विषय है। वो वोटबैंक थे बीजेपी के। उनका आशियाना भी छिना, और आबोदाना भी।

मित्रों, राष्ट्र निर्माण में बलिदान तो देना होता है। बात दूर तलक न जाए, इसे रोककर मूल प्रश्न पर आते हैं कि देवस्थानों पर दर्शन के लिए भक्तों की जेबें ढीली क्यों की जा रही है?

        प्रधानमंत्री द्वारा काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के उद्धाटन के बाद जो जानकारी पत्र सूचना कार्यालय ने 12 दिसंबर 2021 जारी की, उसके अनुसार वहां निर्माण पर 339 करोड़ ख़र्च किये गये थे। फरवरी 2020 में यूपी सरकार के बजट भाषण में जानकारी दी गई थी कि केवल काशी विश्वनाथ के सौंदर्यीकरण पर 200 करोड़ ख़र्च का प्रावधान किया गया है।

        दोनों राशियों को मिला दें, तो काशी विश्वनाथ पर देश के करदाताओं का ख़र्च 539 करोड़ रूपये का हुआ। 2020 में केवल काशी और अयोघ्या के लिए धार्मिक बजट में यूपी सरकार ने 595 करोड़ के प्रावधान किये थे। साल दर साल यह बजट कितना बढ़ा है, इसका कोई श्वेत पत्र फिलहाल उपलब्ध नहीं है। 

       करदाताओं को मालूम तो होना चाहिए कि कामरूप से कन्याकुमारी तक देश के महत्वपूर्ण मंदिरों पर केंद्र और राज्य सरकारों ने कितने पैसे अबतक ख़र्च किये? व्यय को तो भूल जाइये, मंदिरों में आय का भी ब्योरा वहां घंटा बजाने वाले भक्तों को उपलब्ध नहीं है।

      आप सरकारों से अनुदान लेते हो, दर्शनार्थियों से दान भी लेते हो। गैस-तेल व दूध की क़ीमतों की तरह दर्शन-पूजन की फीस बढ़ाये जा रहे हो। अब जब ईशदर्शन पर वसूली का गुजरात मॉडल स्थापित हो चुका, तो इनकम टैक्स रिटर्न मंदिर प्रशासन क्यों नहीं भरे?

तिरूमाला तिरूपति देवस्थानम (टीटीडी) में अलग-अलग दर्शन की फीस 300 से शुरू होकर हज़ार रूपये तक है। ये तो केवल दर्शन शुल्क है, बाकी़ आपकी श्रद्धा, जितना चढ़ा आइये। टीटीडी का नेटवर्थ (निवल मूल्य) 30 अरब डॉलर है, अर्थात ढाई लाख करोड़ रूपये।

       तिरूमाला तिरूपति देवस्थानम का बैंकों में 16 हज़ार करोड़ रूपये और 10. 25 टन सोना जमा है। पूरे देश में ‘टीटीडी‘ की 960 प्रॉपर्टीज़ हैं। 2022-2023 के वास्ते टीटीडी का सालाना बजट है, 3100 करोड़ रूपये। बैंकों में कैश डिपॉजिट से टीटीडी को 668 करोड़ रूपये सालाना ब्याज के रूप में प्राप्त होता है। 

      आप फिर पूछेंगे, क्या ये इनकम टैक्स देते हैं? बाबाजी का ठुल्लू देते हैं। यदि पूजास्थल किसी ट्रस्ट के तहत रजिस्टर्ड है, तो उसे कोई हाउस टैक्स नहीं देना होता है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 12-ए के तहत, गैर-लाभकारी संगठन जैसे धर्मार्थ ट्रस्ट, कल्याणकारी समाज, गैर सरकारी संगठन, धार्मिक संस्थान आदि आयकर छूट के भी अधिकारी हैं।

        कर राहत इस बात को ध्यान में रखते हुए है, कि गैर-लाभकारी संस्थाएं (एनजीओ) समाज कल्याण के लिए काम करती हैं, न कि लाभ कमाने के लिए। उन्हें सेक्शन 12-एए के तहत निबंधित कराने के साथ-साथ फार्म 10-ए में सारा कुछ घोषित करना होता है। 

       अर्थात, करोड़ों-अरबों की कमाई करेंगे, और टैक्स घेला भर नहीं देंगे। तिरूवनंतपुरम का पदमनाभस्वामी मंदिर, सिद्धि विनायक मंदिर मुंबई, शिरडी साईबाबा मंदिर, स्वर्ण मंदिर अमृतसर, मदुरै का मीनाक्षी मंदिर, गुजरात का सोमनाथ मंदिर, केरल में शबरीमाला अयप्पा मंदिर, पुरी का जगन्नाथ मंदिर, दिल्ली का स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर, बैष्णोदेवी मंदिर जम्मू, और काशी विश्वनाथ मंदिर इन प्रमुख धर्मस्थलों में वैभव बरसता है।

        दरगाह व मस्जिद प्रबंधन दर्शनार्थियों से भले पैसा फिक्स न करे, मगर उनकी आय होती है, इस सच से इंकार नहीं कर सकते।

      जामा मस्ज़िद दिल्ली, मक्का मस्जिद हैदराबाद, ताजउल मस्जिद भोपाल, जामिया मस्जिद श्रीनगर, बड़ा और छोटा इमामबाड़ा लखनऊ, जामा मस्जिद भिलाई, नगीना मस्जिद और जामा मस्जिद आगरा, मुंबई का हाजी अली, अजमेर शरीफ ख़्वाज़ा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह, हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह दिल्ली, धन संचय के मामले में समृद्ध माने जाते हैं। 

      गोवा का बैसिलिका ऑफ बॉम जीसस, से कैथेरीन चर्च और रेइस मागोस चर्च, केरल के फोर्ट कोच्चि स्थित सांता क्रूज़ बैसिलिका, सेंट फ्रांसीस चर्च, वेलांकन्नी चर्च, चेन्नई का सेन थाम बैसेलिका, कोलकाता का सेंट पॉल कैथेड्रल, केरल के मोंआतूपुझा स्थित कदमत्तम चर्च, एरनाकुलम का वल्लारपदम चर्च के पास अकूत धन है।

     बौद्ध मठों के पास धन देखना हो तो धर्मशाला से लेकर बोधगया, सिक्किम, और लदाख हो आइये। लेकिन इन सभी स्थलों पर फिक्स रेट या लूट का धंधा नहीं है.

हिन्दू धर्मस्थलों पर दर्शन को आये श्रद्धालुओं से फीस बढ़ाते जाओ, और सरकार को कोई इनकम टैक्स न दो। आज़ादी के बाद से लेकर अबतक इसकी ज़रूरत क्यों नहीं समझी गई कि धर्मस्थलों के लिए फ्री-बी वाले कर निर्धारण क़ानून बदले जाएँ?

      उसके पीछे वोट बैंक खिसकने का डर है, जो सत्ता और प्रतिपक्ष दोनों को सताता है। वो दिन दूर नहीं, जब हिन्दुस्तान में हर मत के मठाघीश यह तय करेंगे, कि उनके मतावलंबी अपनी कमाई का कितना हिस्सा कर के रूप में दें। यूरोप में यह सब लंबे समय से आरंभ है, उसमें सरकारों का कोई दखल नहीं है। 

       स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, स्वीडेन, फिनलैंड, डेनमार्क जैसे देशों को देखिये, चर्च वाले ईसाई मतावलंबियों से अनिवार्य रूप से धार्मिक कर वसूलते रहे हैं। पुर्तगाल, इटली और स्पेन जैसे तीन देश स्वेच्छा से चर्च कर देने को कहते हैं। लेकिन आयरलैंड, ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नार्वे और नीदरलैंड में चर्च टैक्स नहीं है।

      अब जिन देशों में चर्च टैक्स है, वहां घीरे-धीरे इस व्यवस्था से आज़िज व आर्थिक रूप से अशक्त लोगों ने ईसाई घर्म का ही परित्याग कर दिया है। पीईडब्ल्यू रिसर्च सेंटर ने चर्च टैक्स के हवाले से 2022 के अंत में 15 देशों का सर्वे कराया था।

       कुछ सूचनाएं चौंकाने वाली थी, जिसमें सबसे ऊपर ये कि ईसाई मतावलंबियों में से कुछ ने अपने धर्म का परित्याग कर स्वयं को नास्तिक घोषित कर दिया। वे चर्च जाते हैं, मगर यह बोलकर कि हम यहां तफरीह के वास्ते आये हैं। तो क्या भारत में भी धर्मभीरू आबादी का एक छोटा सा हिस्सा नास्तिकता की तरफ़ बढ़ेगा?

Ramswaroop Mantri

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