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*विशेष गहन पुनरीक्षण – सार्वभौम मताधिकार के सिद्धांत का उल्लंघन*

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अरुंधती धुरू व संदीप पाण्डेय

जब भारत आजाद हुआ तो आजादी के आंदोलन के विलक्षण नेताओं की बदौलत भारत के नागरिकों को सार्वभौम मताधिकार एक मौलिक अधिकार के रूप में प्राप्त हुआा। विदेशी शासन के समय सिर्फ समाज का सम्भ्रांत तबका ही मतदान कर सकता था। आजादी के बाद इसका विस्तार करते हुए इसमें सारी वयस्क आबादी को शामिल किया गया। विशेष गहन पुनरीक्षण के पहले सोच यह थी कि मतदान के अधिकार से कोई वंचित न रहे। यदि किसी के पास मतदाता पहचान पत्र नहीं भी होता तो किसी अन्य पहचान पत्र पर मतदाता को मतदान करने दिया जाता था बशर्ते उसका नाम मतदाता सूची में हो। यह मान लिया जाता था कि विदेशी नागरिक तो मतदान नहीं करेंगे सिवाए उनके जो इतने लम्बे समय से इस देश में रह रहे हों कि उन्होंने यहां की नागरिकता प्राप्त कर ली हो। अतः जो भी अपने को देश का नागरिक मानता था उसे मतदान कर अधिकार था। यही सार्वभौम मताधिकार की अवधारणा है।
अब विशेष गहन पुनरीक्षण के आने से सार्वभौम मताधिकार की अवधारणा भंग हुई है। यह सिर्फ पुनरीक्षण नहीं है जैसा इसके नाम से लगता है। यह नए सिरे से मतदाता सूची निर्माण की प्रक्रिया है। विशेष गहन पुनरीक्षण का घोषित उद्देश्य मृत, दो बार नाम वाले या स्थाई रूप से कहीं चले गए मतदाताओं का नाम हटाना है। किंतु हकीकत में कई ऐसी श्रेणियों के मतदाताओं का नाम भी सूची में शामिल नहीं हो रहा जो सिर्फ साधारण पुनरीक्षण हो रहा होता तो शामिल हो सकते थे।
उत्तर प्रदेश का मामला देखा जाए जिसकी वयस्क जनसंख्या 16.1 करोड़ है। राज्य निर्वाचन आयोग ने आने वाले पंचायत चुनाव के पहले एक पुनरीक्षण की प्रक्रिया की है जिसमें मतदान केन्द्र स्तर के अधिकारी घर-घर जाकर सर्वेक्षण किए हैं और कुल 12.7 करोड़ मतदाता सूची में शामिल हैं। यह सिर्फ ग्रामीण मतदाताओ की संख्या है। भारत निर्वाचन आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया के तहत प्रदेश के 15.4 वयस्क मतदाताओं को गणना प्रपत्र दिया जिसमें से 12.6 मतदाताओं ने प्रपत्र भरकर जमा किए हैं। यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के मुताबिक पूरे प्रदेश की वयस्क मतदाताओं की संख्या ग्रामीण वयस्क मतदाताओं से भी कम है! इस विसंगति को कैसे समझा जाए?ै मृत, दो बार नाम वाले और स्थाई रूप से कहीं चले गए मतदाताओं के अलावा ऐसे कई मतदाताओं की श्रेणियां हैं जिन्होंने मतदान स्तर के अधिकारी को गणना प्रपत्र जमा नहीं किया है।
मतदाताओं की एक वह श्रेणी है जिसने आॅनलाइन गणना प्रपत्र भरा है जो कि अत्यंत पेचीदी प्रक्रिया है। मतदाता की मोबाइल संख्या आधार कार्ड व मतदाता पहचान पत्र से जुड़ी होनी चाहिए व आधार कार्ड व मतदाता पहवान पत्र पर नाम की वर्तनी में एकरूपता होनी चाहिए। अब यह मत पूछिए कि आधार कार्ड की संख्या क्यों मांगी जा रही, जो कि हाथ से प्रपत्र भरने में मतदाता के लिए वैकल्पिक है, क्योंकि उसके बिना आॅनलाइन की प्रक्रिया पूरी ही नहीं होगी। अपना गणना प्रपत्र भरने के बाद जब मतदाता पुनः केन्द्रीय चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जाकर अपने प्रपत्र की स्थिति जानना चाहे तो गणना प्रपत्र पुनः भरने के लिए खुल जाता है। जिन मतदाताओं ने अपने प्रपत्र हाथ से भर को मतदान स्तर के अधिकारियों को दिए और जो वेबसाइट पर चढ़ा दिए गए हैं उनकी जानकारी वेबसाइट से प्राप्त करने जाएं तो बकायदा एक संदेश आता है कि गणना प्रपत्र जमा किया जा चुका है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को 18 दिसम्बर, 2025 को इस विषय में शिकायत भेजी गई कि आॅनलाइन भरे गए प्रपत्र के विषय में बाद में वेबसाइट पर जाने पर ’गणना प्रपत्र भरा गया’ संदेश नहीं प्राप्त हो रहा। इस शिकायत का कोई जवाब नहीं आया। यह समझ से परे है कि यदि चुनाव आयोग का उद्देश्य है कि ज्यादा से ज्यादा वैध मतदाता अपना गणना प्रपत्र भर पाएं तो उसने आॅनलाइन प्रक्रिया को इतना जटिल क्यों बना रखा है?
मतदाताओं की एक श्रेणी वह है जिसके पास अपने मतदाता फोटो पहचान पत्र हैं किंतु जब वे अपनी पहचान पत्र संख्या चुनाव आयोग की वेबसाइट पर डालते हें तो संदेश आता है कि ’कोई परिणाम नहीं निकला।’  ये वे मतदाता हैं जिनके नाम मतदाता सूची से गल्ती से अथवा साजिशन हटा दिए गए हैं। परंतु तकनीकी रूप से इनका नाम मतदाता सूची में होना चाहिए था क्योंकि उनके पास मतदाता पहचान पत्र हंै। गम्भीर सवाल यह है कि इन्हें गणना प्रपत्र क्यों नहीं दिया गया? चूंकि इन्हें गणना प्रपत्र मिला नहीं है तो जाहिर है कि भर कर भी नहीं दे सकते। इसका मतलब यह कि उनका नाम नई मतदाता सूची में नहीं होगा।
फिर ऐसे मतदाता की श्रेणी है जिनके पास मतदाता पहचान पत्र तो नहीं है किंतु पिछले 2002-03 के विशेष गहन पुनरीक्षण में उनका या उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम है। यानी वे चुनाव आयोग द्वारा तय किए गए नागरिकता के मानक को पूरा करते हैं किंतु सिर्फ उन्हें गणना प्रपत्र नहीं मिला इसलिए उनका नाम भी पुनरीक्षित सूची में नहीं होगा।
एक बड़ी मतदाताओं की श्रेणी वह है तो सरकार की किसी विकास परियोजना में विस्थापन का शिकार हुए, जैसे कि लखनऊ में पूर्व में अकबर नगर में रहने वाले लोग। इनका मतदान केन्द्र स्तर का अधिकारी इनसे कह रहा है कि चूंकि उनका विधान सभा बदल गया है इसलिए वे स्थाई रूप से चले गए की श्रेणी में आ गए हैं। इस श्रेणी के लोगों का जो नाम हटाने की बात है वह उन मतदाताओ ंका जिनका कोई पता नहीं। किंतु अकबर नगर के मामले में तो यह मालूम है कि सभी विस्थापित वसंत कुंज में रह रहे हैं। कायदे से होना यह चाहिए था कि इन सभी के गणना प्रपत्र भराए जाते और साथ ही इनका पता बदलने के लिए प्रपत्र 8 भी भरवाया जाता। मतदाताओं की यह श्रेणी भी गणना प्रपत्र जमा करने से वंचित होगी क्योंकि इन्हें भी गणना प्रपत्र नहीं दिए गए। इनका नाम भी नई सूची से विलोपित होगा।
जितने भी मतदाताओं का नाम पुनरीक्षित सूची से विलोपित होगा उनसे कहा जा रहा है कि प्रपत्र 6 भरकर अपना नाम सूची में जुड़वा लें। प्रपत्र 6 नए मतदाता के मतदाता सूची में शामिल होने के लिए होता है। इसमें एक घोषणा करनी पड़ती है कि आकांक्षी मतदाता का नाम पहले कभी किसी मतदाता सूची में नहीं था। यानी चुनाव आयोग कह रहा है कि मतदाता झूठी घोषणा के आधार पर प्रपत्र 6 भरें। इससे संदेह खड़ा होता है कि जो वैध मतदाता नई मतदाता सूची से विलोपित होने वाले हैं वे अपना नाम दोबारा जुड़वा भी पाएंगे अथवा नहीं? समाज के सबसे कमजोर तबकों के लोग गरीब, दलित, आदिवासी, महिला व अल्पसंख्यक बड़ी संख्या में मतदाता सूची से विलोपित किए जाएंगे।
यह साफ है कि घर-घर जाकर मतदाता सूची का पुनरीक्षण करने के बजाए विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया में गणना प्रपत्र भरवाने के प्रक्रिया में मतदाताओं की सूची से करीब 18 प्रतिशत मतदाता विलोपित हो गए, जिनमें कई वैध मतदाता हैं। एक मौलिक सवाल है कि एक ही समय में एक ही आबादी का दो अलग स्तर के चुनावों की मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण दो अलग तरीकों से क्यों किया गया? परिणाम सामने है कि दोनों मतदाता सूचियों में करीब 3 करोड़ मतदाताओं का अंतर आ गया है! क्या इससे बढ़िया कोई उदाहरण नौकरशाही की नासमझी, अकार्यकुशलता, जनता के समय व संसाधन की बरबादी करने का हो सकता है? इसमें हम उन मतदान केन्द्र के अधिकारियों की तो बात ही नहीं कर रहे जो इस पूरी प्रक्रिया की तानाशाही का शिकार हो दुनिया छोड़कर ही चल दिए। क्या यह सार्वभौम मताधिकार के सिद्धांत के विपरीत नहीं है?

लेखिका एवं लेखकः अरुंधती धुरू व संदीप पाण्डेय
सम्पर्क मोबाइल व दूरभाष संख्याः 9415022772, 9919664444, 0522 2355978, 3564437
email ids: arundhatidhuru@gmail.comashaashram@yahoo.com
परिचयः अरुंधती धुरू जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय से सम्बद्ध हैं व संदीप पाण्डेय सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के प्रधान महासचिव हैं।

Ramswaroop Mantri

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