प्रखर अरोड़ा
एक अनजाने उपवन में अचानक किशोर सक्सेना की आँख खुली, वो एक झटके में उठ कर बैठ गए, हल्की सी सर में खुमारी थी जैसे एक बहुत गहरी नींद के बाद उठे हों वो, उनको ख़ुद में कहीं भी दर्द महसूस नहीं हुआ और उल्टा वो बहुत हल्का महसूस कर रहे थे।
आँखों से बिना चश्मे के साफ दिख रहा था, एक स्फूर्ति की लहर दौड़ रही थी उनमें, एक ऊर्जा जो कि उन्होंने अंतिम बार कभी तीस पैंतीस साल पहले महसूस की थी। वो उठ कर खड़े हुए तो उन्होंने देखा कि वो उपवन बहुत बड़ा था, और वहाँ सब लोग चाहे वो कोई भी हो एक ही वेशभूषा में था, सबके वस्त्र इतने श्वेत थे कि उस जैसा श्वेत रंग आज से पहले किशोर जी ने कभी देखा ही नहीं था।
किशोर धीरे धीरे सोचने लगे शायद ये उस हॉस्पिटल का उपवन हो जिसमें वे भर्ती हैं, उनको एक मेजर हार्ट अटैक आया था, मगर वो तो अब इतना स्वस्थ महसूस कर रहे थे कि अपने नाती के साथ रेस लगाने की सोच रहे थे।
नाती से अचानक उनको ध्यान आया अपने स्वजनों का, वो अपने बेटों और बेटियों को खोजने लगे, उन्होंने अपनी धर्मपत्नी के बारे में सोचा, “ये रेखा भी न ऐसी हालत में मुझे इस बाग में अकेला छोड़ गई, कोई साथ में भी नहीं है।”
बहुत देर तक किशोर उन श्वेत वस्त्र धारियों में अपने परिवार वालों को ढूंढते रहे। हॉस्पिटल की कोई बिल्डिंग आस पास दिख भी नहीं रही थी मगर किशोर जी को इस बात का आश्चर्य हो रहा था कि उनको जो स्वजनों पर इस तरह अकेले छोड़ने पर क्रोध आता वो पल भर में छू मंतर हो जाता और हर बार उनका मन परिवार वालों को भूल कर उस उपवन पर मोहित हो रहा था।
उस उपवन जैसे फूल उन्होंने कहीं नहीं देखे थे, हालांकि वो रिटायर्ड बॉटनी के प्रोफेसर थे, फिर भी उन फूलों का आकार और और रंग देख कर एकदम अचंभा हो रहा था। उन फूलों को देख कर यूँ लगता था जैसे नीले आकाश को काट कर किसी ने फूल के रूप में मिट्टी में लगा दिया हो। उस उपवन में कोई बाँसुरी बजा रहा था तो कोई सितार, मगर उन दोनों की धुन उसे अलग अलग सुनाई दे रही थी.
वहाँ कोई चित्र बना रहा था तो कोई नृत्य कर रहा था, कोई गा रहा था और फिर भी उनके कानों पर कोई ध्वनि नहीं पड़ रही थी, सब बस जैसे सीधे उनकी आत्मा में उतर रहा हो।
वो अब परिवार वालों के बारे में नहीं सोच रहे थे, उस उपवन में वो धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे, तभी उन्हें अचानक कोई दिखाई पड़ा और किशोर किसी बच्चे की तरह माँ , माँ कहते हुए उसकी तरफ भागे, वो उस श्वेत वस्त्र धारी में अपनी माँ को पहचान गए, “माँ तुम….तुम…” बस इससे ज्यादा वो कुछ नहीं कह पाए और अपनी माँ से लिपट कर रोने लगे। उनकी माँ ने उनको अपने आप से अलग किया और बोलीं “कौन हो तुम?” ये सुन कर किशोर थोड़ा आहत हुए फिर कुछ सोच कर बोले “माँ अरे मैं तेरा किशोरी, तू मुझे नहीं पहचान रही, ओह , अब मैं समझा मेरे चेहरे पर झुर्रियाँ आ गईं हैं न और बाल सफेद हो गए हैं , मगर ध्यान से देख न तू मुझे पहचान लेगी, और एक मिनट माँ” ये कह कर किशोर बहुत खुशी से हँसते हुए बोले “माँ तू तो बहुत सुंदर लग रही है एक दम तेईस चौबीस साल की, जैसे मेरे बचपन में थी तू”।
किशोर की माँ ने उनकी बाहें पकड़ीं और बोलीं “आओ मेरे साथ”, किशोर एक बच्चे की तरह बोल उठे “कहाँ माँ, कहाँ ले जा रही हो मुझे”। वो किशोर को उपवन के साथ लगे एक सरोवर तक ले गयीं, उन्होंने किशोर को सरोवर में अपनी छाया देखने को कहा, जैसे ही किशोर ने अपनी सूरत सरोवर में देखी उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, वो एकदम नवयुवक दिख रहे थे, न चेहरे पर कोई झुर्री न कोई बाल सफेद, उन्होंने अपने हाथों को देखा और वो भी एकदम किसी युवा के भांति थे और वो आश्चर्य से बस अपनी माँ को देखते रहे।
“ये सब क्या है माँ”, किशोर की माँ बोलीं “यहाँ न तुम मेरे कोई हो न मैं तुम्हारी, मैं, तुम, और हम सब, जितने भी यहाँ दिख रहे हैं, सारे उस परम पिता परमेश्वर का अंश हैं।”
“लेकिन तुम मेरी माँ हो मैं तुमको कैसे न पहचानूँ, और यहाँ पिताजी भी हैं क्या, कौन सी जगह है ये माँ, मैं कहाँ हूँ, ये सब क्या हो रहा है।” किशोर की आवाज़ में अभी भी हठ थी जो कि माँ के सामने आ ही जाती है।
किशोर की माँ ने फिर उनका हाथ पकड़ा और सरोवर की दूसरी ओर चल दीं, दूसरी तरफ पहुँच कर किशोर की माँ ने उनको एक रौशनी दिखाई, “वो रौशनी देख रहे हो, उस रौशनी की तरफ़ कदम बढ़ाते जाओ।” क्या है वो माँ, तुम भी चलो न, मैं अकेले जा कर क्या करूँगा, फिर अगर खो गया तो कहाँ भटकूँगा, मैं यहाँ तुम्हारे अलावा किसी को जानता भी नहीं ?”
“उस रौशनी की तरफ सबको अकेले ही जाना पड़ता है, तुम जब उस रौशनी के उस पार निकल जाओगे तो तुम्हें अपने सब प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे और उसके बाद तुम कभी नहीं भटकोगे, फिर तुम किसी को नहीं पहचानोगे और न कोई तुम्हें, जाओ और अपने आप को मुक्त कर लो।”
किशोर ने जीवन भर अपनी माँ का कहा आदेश समझ कर माना था और आज भी वो अपनी माँ के आदेश का पालन करने के लिए उस रौशनी की तरफ आगे बढ़े, एक बार फिर से पीछे मुड़ के देखा मगर किशोर की माँ अब वहाँ नहीं थीं, किशोर जैसे जैसे उस रौशनी की तरफ कदम बढ़ा रहे थे वैसे वैसे उनकी मुस्कान बढ़ती जा रही थी,.
आँखों से आँसू सूखते जा रहे थे, सारे दृश्य उस दूध सी उजियारी रौशनी में धुलते जा रहे थे, हर कदम पर ॐ का नाद बढ़ता जा रहा था, जैसे जैसे उस रौशनी के पास जाने पर उसकी चमक बढ़ती गयी वैसे वैसे किशोर जी के हृदय से सारे बंधन, रिश्ते नाते फीके पड़ते जा रहे थे और जैसे ही उन्होंने उस रौशनी को पार किया.
ठीक उसी क्षण किशोर जी के शहर के शमशान घाट पर उनके बेटे ने उनको मुखाग्नि दे दी।
उनके शहर में उस दिन बारिश हुई और बारिश के बाद जब मौसम खुला तो यूँ लगा जैसे कोई नीले आकाश के रंग का बड़ा सा फूल बना रहा हो।





