( स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत की राजनीति में समाजवादी विचारों का प्रभाव रहा। लोहिया उसके केन्द्र में रहें। अब यह राजनीति समाप्त प्रायः हो रही है। सन 96 के बाद से गिरावट तेजी से आई। एक समाजवादी की मनोदशा का चित्रण करती विवेक मेहता की यह कहानी सत्ता के लिए विचारों में आई गिरावट को रेखांकित करती है। 19-20-21को पूना में हो रहे समाजवादियों के समागम के समय संघर्ष, सत्ता, सोच भी विचारणीय विषय होना चाहिए। )
-विवेक मेहता
बहुत व्यथित थे वे। समाचार पत्र के पन्ने, टीवी के सारे चैनल टटोल टटोलकर जानकारी पाना चाहते थे। कभी समाचार पत्रों में छपी खबरों से बैचेन होते तो कभी टीवी पर अपने नेताओं के बयान से बौखलाते। घर से निकलना भी इन दिनों कम कर दिया। लोग छेड़छाड़ कर व्यर्थ में परेशान करते। अब लोगों को क्या दोष दें ! जो सच होगा कहेंगे ही वे तो। जब अपनों में ही गलती हो, मुंह से सिद्धांत की बात निकले और कर्म स्वार्थ के हो तो भला किस मुंह से बाहर जाए।
सिद्धांत हूंऊ… सिद्धांत। हंस दिये। अब तो यह खोखला शब्द रह गया। कोई भी समझौता कर लो और सिद्धांत का नाम दे दो। वह भी क्या वक्त था जब डॉक्टर साहब ने जनता पर गोली चलाने पर अपनी पार्टी की सरकार से त्यागपत्र मांग लिया था। अब तो कल तक जिन बातों का, विचारों का, लोगों का विरोध करो आज उन्हीं की जय जयकार करो। दोगलापन है यह तो। राजनीति में यही सब चलता हैं। खाक चलता है। नकटे हैं साले। सारे के सारे। कुर्सी से चिपके चींटे!!
चींटे… उनकी आंखों के सामने एक दूसरे पर चढ़ते, एक दूसरे को धकेलते, हाथापाई करते नेताओं का दृश्य उभार आया। चक्कर लगाते लगाते वे रुक गए। इस कल्पना से थोड़ी राहत मिली। मुस्कुराहट चेहरे पर दौड़ आई।
उम्र गुजर गई। गरीब-मजदूर की बात करते। वोट-फावडे की बात करते। आम आदमी की बात करते हैं लोग। क्या होता है आम आदमी? अपने आदमी के लिए वह हमेशा संघर्षशील रहें। जेल गए। कई जुलूस-जलसों में आगे रहें। माइक नहीं होता तो भोंगा मुंह से लगाकर चीखते थे। लोगों को इकट्ठा करते। अपनी बात कहते। और जो कहते उसे करके भी दिखलाते। ऐसा नहीं की कहा कुछ, किया कुछ। अब जार्ज को ही ले लो। समाजवादी आंदोलन का मुखिया। लोहिया का वारिस संसद से बाहर निकलते ही मुखौटा बदल ले, तो जनता कैसे विश्वास करें ! सर को झटका देखकर उन्होंने इस विचार को दिमाग से निकलने की कोशिश की। नजर लोहिया की तस्वीर पर पड़ी। उनकी इच्छा हुई कि पूछें- डॉक्टर साहब क्या-क्या सपने दिखाए थे आपने और क्या स्थिति बन गई? आप ही तो कहते थे कि विपक्ष का संयुक्त गठबंधन खड़ा करना राजनैतिक लूटखसौटपन के अवसर पैदा करने जैसा होगा। फिर भी आपने गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया। देकर आप तो स्थिति सम्हालने के लिए रहें नहीं। काश अच्छा कि आपने वह नारा नहीं दिया होता। यह दिन तो न देखने पड़ते। अब आप ही ढूंढ लो चिराग लेकर समाजवादियों को। सबको कुर्सी की चाह हो गई। कुर्सी के पीछे दो जनता दल में, दो कांग्रेस में, दो की समाजवादी पार्टी तो दो की समता पार्टी। दो की जनता पार्टी तो दो की भारतीय जनता पार्टी। दो की बसपा। कोई यहां तो कोई वहां। मगर कौन कहां, किसको खबर? सब गड़बड़ हो गई। नेताओं को तो सत्ता मिल गई और गरीब पीस गया। कौन करें उसके लिए संघर्ष ! अरे, सत्ता न मिली थी तो न मिली थी मगर लोगों का विश्वास तो मिला था।
बेचैनी बढ़ती जा रही थी। कहीं ब्लड प्रेशर ना बढ़ जाए। थोड़ा सा सो ही जाते हैं। या कुछ पढ़ लेते हैं। ‘राम, कृष्ण और शिव’ पढ़ें या ‘निराशा के कर्तव्य’। पुस्तक की ओर हाथ बढ़ाया और हटा लिया। कितनी बार तो पढ़ ली।
बिस्तर पर लेट गए। कुछ भी कहो डॉक्टर साहब आदमी तो जीनियस थे। दूरदृष्टा भी। क्या मुद्दे लाते थे। सप्त क्रांति, आय का अंतर एक और दस का हो। आज तो अंतर बढ़ता जा रहा है। एक और सौ, एक और हजार या…. वह आगे की न सोच पाए।
आज तो कारपोरेट जगत के हाथ में सत्ता सिमट गई। अभी कहीं पढ़ा था कि आज एक आदमी की दिनचर्या में सारी चीजें- मंजन, दवाई, खाना-पीना, कपड़े, स्टेशनरी सभी तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बनी उपयोग में आती है। तुर्रा यह कि- गर्व से कहो हम भारतीय हैं। व्यंग्य भरी मुस्कान उनके चेहरे पर तैर गई। जीवन का स्तर ऊंचा हो गया। घर-घर में वाहन आ गए। झोपड़ों में टीवी आ गया। और क्या चाहिए ! यही प्रगति है। पीने को पानी नहीं मिले, प्रति व्यक्ति हजारों का ऋण माथे हो, किसान आत्महत्या कर रहा हो, नौजवान बेरोजगार हो, कुंठित हो, नशे का आदि हो।
नशे पर याद आया। वह चाहते थे कि नशाखोरी के विरोध में आंदोलन चलाएं। जन जागृति पैदा करें। पार्टी में बात रखी पर कुछ न हो पाया। बाद में पता चला पार्टी के अध्यक्ष के वाहन में अफीम भारी मात्रा में पकड़ी गई। कैसे-कैसे लोग आ गये पार्टी में। दीमक ने नहीं, ऐसे लोगों ने ही पार्टी को चाट खाया। अपने हितों के लिए गरीब आदमी का शोषण किया। नारे लगवाए, जेल भिजवाया और खुद नेता बन गए।
सोकर भी चैन नहीं मिल रहा था। एक सपने के टूटने का दर्द कैसा होता है वह महसूस कर रहें थे। लोहिया जी के जाने के बाद से ही समाजवाद दिग्भ्रमित सा हो गया था। जनता पार्टी के गठन-विघटन के बाद तो राजनीति से विरक्ति ही हो गई थी। राज नारायण, चरणसिंह के हनुमान बन गए। मधु जी स्वास्थ्य के कारण को लेकर संन्यासी बन गए। मामा जी अपने भीलों में लीन हो गए। शरद-जार्ज मुखौटे बदल-बदल कर असली चेहरा भूल गए। मुलायम से आशा बंधी थी। बाबरी मस्जिद विवाद में दृढ़ता दिखलाई थी। फिर वोटो की राजनीति में वह घोर जातिवादी बन गया। संघी समाजवादी बन गया। सोचकर हंसी आ गई।
संघी समाजवादी। और फिर गांधीवादी समाजवाद। संघी है तो कट्टर। लक्ष्य के प्रति सजग। झूठ बोलेंगे, दोहरी चाल चलेंगे। जब तक लाभदायक रहोंगे, दोहन करेंगे। जब लाभदायक ना हो तो मक्खी की तरह निकल फेंकेंगे। आरिफ संविद सरकार के बाद उनसे जुड़ गया। क्या मिला? मुखौटा बना फिरता है। उन्हें भी तो खींच रहे थे। पद का लालच भी दिया था।
क्या करते पद का। भगवान ने सब कुछ तो दिया। दो समय की दाल रोटी मिल जाती है। कुछ संतुष्टि के लिए, लोगों की भलाई के लिए समाजवाद के प्रति आकर्षित हुए। फिर लगाव उपजा। विरक्त न हो पाये। विरक्त रहते तो इतना दुखी नहीं होते। बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरने का समाचार सुन बेचैन हुए थे। तब खुद को दोषी नहीं मानते थे।सांप्रदायिक पार्टी की सोच के प्रति लोगों को सचेत करते रहे थे वह और उनके समाजवादी साथी। तब सोचा था सभी समाजवादियों को इकट्ठा होकर अब संघर्षरत होना चाहिए। तभी जार्ज ने समाजवादी आंदोलन शुरू किया। नमक सत्याग्रह। कारगिल कंपनी के प्रवेश के विरुद्ध। वह भी कांडला गए थे। पुराने समाजवादियों साथियों के साथ गिरफ्तारी देते हुए प्रसन्नता हुई थी। वह लड़ाई जीत लेने के बाद आशा बंधी थी। इसी कारण जॉर्ज से जुड़ गए थे। जॉर्ज ने समता पार्टी बनाई। चलो ठीक है। बिहार में सत्ता प्राप्ति के सपने दिखायें, ठीक है। लालू के सामने वहां हारे तो अखरा नहीं। साधन और साध्य के मामले में डॉक्टर साहब के बजाय गांधी ठीक थे। अब तो गांधी को ही खारिज करने लगें देश से लोग। उन्हें बतलाया गया कि यह चुनावी गठजोड़ हैं। नीतियां मुख्य हैं। वह क्या कहते ? और कहते तो सुनता भी कौन हैं अब। चुनाव के बाद कैसी-कैसी खबरें आती हैं। पार्टी के नेता कैसे-कैसे वक्तव्य देते हैं ! मन खट्टा हो जाता है। वैसे कुछ भी कहो समाजवादी आत्महत्या भी करेगा तो संघर्ष का जामा पहना कर। पीड़ा भारी लकीरें चेहरे पर उभर आई जब याद आए लोगों के ताने- नेताजी कब जा रहे हो सांप्रदायिक पार्टी में।
घड़ी देखी समाचारों का वक्त हो गया था। उठें। टीवी चालू किया। पर्दे पर सब कुछ अस्पष्ट था। बाहर कहीं से गाने के बोल सुनाई दिए-दिल के टुकड़े हजार हुए कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा। निगाहें डॉक्टर साहब की तस्वीर पर गई। वे बोल उठे देख रहे हैं ना आप गैर कांग्रेसवाद का व्यावहारिक रूप।





