कश्मीर समस्या के पीछे का सच**भाग 13
*अजय असुर
1987 के चुनाव में 14 मुस्लिम दलों ने मिलकर मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट का गठन किया। इसने चुनावों में भागीदारी करके लगभग 30 प्रतिशत मत प्राप्त किये। परंतु इस चुनाव में मात्र उसके चार सदस्य जीत पाए और दो सदस्य संघ यानी भाजपा के जीते। मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के तमाम नेताओं व कार्यकर्ताओं की सरेआम पिटाई की गयी। इसने राजनीतिक समस्या को तात्कालिक तौर पर और मुश्किल बना दिया। इस प्रकार कश्मीर राज्य के भीतर सभी प्रकार की राजनैतिक गतिविधियों की स्वतंत्रता का हरण कर लिया गया था। तब फिर राज्य में असंतोष के निकलने का कोई लोकतांत्रिक रास्ता नहीं बच रहा था। सरकारों से कश्मीरी जनमानस का मोहभंग हुआ और कश्मीरी अवाम के पास केवल एक ही रास्ता बच रहा था और वह रास्ता था सशस्त्र जनसंघर्ष का और आने वाले दिनों में आंदोलन इसी रास्ते पर अग्रसरित हुआ।
यदि कश्मीर में एक ओर केन्द्र सरकार की लगातार दखलंदाजी व केन्द्र की प्रभुत्व जमाने की कार्यवाहियां थी तो दूसरी ओर कश्मीर में बनने वाली सरकारें अमूमन भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी थी। इधर शेख अब्दुल्ला ने जनता के संघर्ष को मझधार में छोड़कर भारतीय शासकों के साथ समझौता कर लिया था तो उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला ने कश्मीरियों के आत्म सम्मान की ही सौदेबाजी कर ली थी। ऐसे हालात में देर-सबेर कश्मीरियों की आजादी, अपनी पहचान और स्वाभिमान की भावना को जोर मारना ही था और ऐसा हुआ भी। लेकिन अब कश्मीर की आजादी के संघर्ष का नेतृत्व इस बार कश्मीर का दलाल पूंजीपतियों/सामन्तों के हाथों में नहीं है। इस बार कश्मीर की आजादी के संघर्ष निम्न पूंजीपतियों के नेतृत्व में कश्मीरी जनता के हाथों में आ गया। दलाल पूंजीपति वर्ग में इतना दम-खम नहीं होता कि वह इतना जुझारू संघर्ष लड़ सके, अपने ए. सी. घरों से निकलकर सड़क पर आकर संघर्ष करें। पूंजीपति वर्ग हमेशा ही मौका मिलने पर समझौता करने को तत्पर रहता है।
कश्मीर में संघर्ष की वजह कश्मीरी आवाम अपनी कश्मीरियत और आजादी के अलावा कश्मीर का भारत में विलय के बाद अब तक के कुशासन, भ्रष्टाचार और आर्थिक स्थितियों की बदहाली से कश्मीरी लोगों का विश्वास उठना और चूंकि केन्द्र सरकार की दखलंदाजी के कारण कश्मीर में यह माना जाता रहा है कि यहाँ की लगभग सभी सरकारें अप्रत्यक्ष तौर पर केन्द्र सरकार द्वारा ही संचालित होती है इसलिए उनके विरोध का निशाना भारत सरकार का बनना तय था। इसके अलावा यह कारण भी था कि पिछले दशकों में कश्मीर में पढ़े लिखे लोगों के लिए रोजगार का संकट भी गहरा गया था। 80 के दशक का अन्त आते-आते कश्मीर में वे सभी समस्यायें मौजूद थी जो देश के शेष हिस्सों में मौजूद थी। कहने का आशय है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के आम संकट से कश्मीर मुक्त नहीं था और न ही भारतीय पूंजीवादी व्यवस्था की आम समस्याओं से। ऐसी स्थिति के कारण ही कश्मीरी जनमानस में लम्बे समय से पनप रहा आखिरकार 1988 में उस समय फट पड़ा जब बिजली की दरों में यकायक और भारी बढ़ोतरी कर दी गयी। यह बढ़ोत्तरी भी ऐसे समय में की गयी थी जब बिजली की आपूर्ति काफी गड़बड़ा गयी थी। प्रदर्शनों पर पुलिस द्वारा गोली चलाने और उसमें तीन व्यक्तियों के मारे जाने के कारण लोग और भी क्रुद्ध हुए सरकार ने गोलीबारी की जाँच कराने के बजाय इन प्रदर्शनों को राष्ट्र विराधी करार दिया। कश्मीर घाटी लगातार तीन दिन बंद रही। यह प्रदर्शन लगातार जारी रहे और अंततः इन प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ग्रहण कर लिया। जुलाई में केन्द्रीय तारघर और दूरदर्शन केन्द्रों पर विस्फोट किये गये, प्रदर्शनों की लगातार श्रृंखला के परिणामस्वरूप सरकार विरोध से यह प्रदर्शन भारत विरोध तक जा पहुंचे जिसकी साफ अभिव्यक्ति 15 अगस्त को काले झंडे लहराना और बंद का आयोजन होना। इन प्रदर्शनों में पुलिस और आजादी समर्थकों के बीच सीधी गोलीबारी भी हुई जैसे जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के संस्थापक मकबूल भट की बरसी पर सलमान रश्दी की पुस्तक के खिलाफ हुए प्रदर्शन के समय और शब्बीर शाह के पिता की पुलिस हिरासत में मौत पर हुए प्रदर्शनों के समय प्रदर्शनों पर पुलिस गोलीबारी और आंदोलनकारियों के तीव्र दमन के कारण आंदोलन और तेज होता गया। शासक वर्ग जितना ही वहाँ के आवाम का बलपूर्वक दमन करती है उतनी ही तेजी से वहाँ की आवाम सड़क पता उतरकर विद्रोह करती है।
कश्मीरी आवाम का कहना है कि “सरकार जितना जुल्म करेगी, उतने हम संवरेंगे।” कश्मीर घाटी के हर कोने से वंहा के आवाम की आवाज सुनाई देती है कि ” कोई बात नहीं अगर नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। हमें नेताओं की जरूरत नहीं है। जब तक एक भी कश्मीरी बच्चा जीवित है, हम संघर्ष करेंगे।”
*शेष अगले भाग में…*
*अजय असुर*





