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 मीठा और चींटे !

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● चंद्रशेखर शर्मा

दत्तात्रय होसबले अभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सर संघचालक मोहन भागवत के बाद सेकंड इन कमांड हैं। उन्हें आप संघ का सीईओ भी माने तो हर्ज न। होसबले अभी अड़सठ के हैं और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में बरसों राष्ट्रीय महासचिव रहे हैं। कहते हैं कि भाजपा के अभी जो तीन सौ से अधिक सांसद हैं उनमें से करीब सौ से उनके परिषद के अपने कार्यकाल के समय से संबंध हैं। अलावा इसके नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भी वो बहुत करीबी हैं। इंग्लिश में स्नातकोत्तर होसबले हिंदी, अंग्रेजी, कन्नड़ और संस्कृत सहित कई भाषाओं पर खासा अधिकार रखते हैं।

इन संघमूर्ति की चर्चा इसलिए कि अपने इंदौर को जो नये महापौर मिले हैं, बताते हैं वो पुष्यमित्र भार्गव इन्हीं के कृपापात्र हैं ! सो क्या अचरज कि इनको चुनाव में पार उतारने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और प्रदेश प्रभारी हितानंद शर्मा ने भी केवट होने में कोई संकोच नहीं किया। इंदौर के नये महापौर बने यही पुष्यमित्र भार्गव कल संस्था माहेश्वरी द्वारा इनके सम्मान में रखे गये समारोह में तय समय से कोई दो घण्टे देर से पधारे !

यों समारोहों में नेताओं का देरी से पहुंचना क्या कोई अनूठी या बुरी बात है ? कतई नहीं, बल्कि बहुत आम है या कहें फैशन है ! सो उसकी कोई बात नहीं। हां, गौरतलब बात यह है कि कल भार्गव के तीन कार्यक्रम तो इस लेखक को ही पता थे। ज्यादा भी रहे हों तो हैरत नहीं। तीन में से एक तो बताते हैं सिमरोल के पास बाई ग्राम में गोपी नेमा ने रखा था और बताया गया कि वहीं से लौटने में ट्रैफिक की वजह से भार्गव को दो घण्टे की देर हो गयी। इसे समझा जा सकता है कि अभी सावन है और कल रविवार था तो खंडवा रोड पर सैर के शौकीनों का आवागमन अधिक रहा होगा। खैर।

बात देरी की नहीं है वरन यह है कि मीठे पर चींटे लपकते-चढ़ते ही हैं। जी हां, करीब चालीस बरस के भार्गव नये महापौर हुए हैं तो हर कोई उन्हें ‘जपना’ चाहता है ! ऐसे लोग सिर्फ चाहते नहीं, बल्कि उसके लिए प्रयास या जुगाड़ भी शुरू है। ऐसे लोगों में आप भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव से लेकर हर उस चींटे को शुमार कर सकते हैं जिसे नये महापौर से मीठे की मुराद है या वहां मीठा दिख रहा है। जाहिर है कार्यभार ग्रहण के पहले ही भार्गव चींटों की इस ‘खींचतान’ से जूझ रहे हैं और नित्य अनेक समारोहों में जाना पड़ रहा है तो कहीं देर होना भी लाजमी है। 

बहरहाल भार्गव के महापौर होने के बाद एक चर्चा पूरे शहर में चक्कर लगा रही है। सो यह कि मैदानी राजनीति से खाली किसी व्यक्ति का विधायक-सांसद बनना अलग बात है और महापौर बनना अलग। विधायक या सांसद को विधानसभा और संसद में हाजरी के अलावा अपने निर्वाचन क्षेत्र और वहां के लोगों के कामकाज करने होते हैं। उसका एक सीमित दायरा होता है। इसके उलट आप महापौर के कामकाज का दायरा देखिए। इंदौर जैसे महानगर होते शहर की नगर निगम में दस हजार से भी ज्यादा कर्मचारियों और अधिकारियों का अमला है। महापौर को इतने बड़े अमले से नित्य और नियमित काम लेना होता है और शहर में इतने बड़े निगम से संबंधित ढेर कामों, सुविधाओं और सेवाओं को सुचारू बनाये रखने की जिम्मेदारी भी उसी की होती है। इसके अलावा 85 पार्षदों, नौ विधायकों और एक सांसद सहित शहर के तमाम नेताओं और राजनीतिक दलों से भी सामंजस्य साधना होता है। फिर बताने की जरूरत नहीं कि पिछली नगर निगम परिषद के कार्यकाल में शहर ने अनेक बड़े काम किये हैं और उपलब्धियां पायी हैं तो उस सिलसिले को भी जारी रखने का अतिरिक्त दबाव रहेगा। ऐसी और भी कई बातें हैं। गोया विधायक और सांसद के मुकाबले महापौर की चुनौतियां, जिम्मेदारी, काम का दायरा और दबाव कई गुना ज्यादा होते हैं और उसे लगभग रोज ही इम्तहान देना होता है। लोग कह रहे हैं कि ठीक है भार्गव काबिल अधिवक्ता हैं, लेकिन वो काबिलियत महापौर बतौर कैसे और कितना फायदा पहुंचाएगी और क्या भार्गव इस नये दायित्व को बखूबी निभा पाएंगे ? जाहिर है यदि भार्गव विधायक या सांसद का चुनाव जीते होते तो यह सवाल किसी के ख्याल में भी नहीं आता !

● चंद्रशेखर शर्मा

Ramswaroop Mantri

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