अग्नि आलोक
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*कमाल के  साफ-सुथरे और दिल के  सच्चे थे ताहिर सिद्दीकी*

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इंदौर। ताहिर कमाल सिद्दीकी! ये नाम तीन अलग-अलग खूबियां बयान करता है, जिनके मालिक ने सिर भाई! आल्लाह ने उन्हें जो नफासत बक्शी थी, वो बहुत ही कम को नसीब होती है। हमेशा खुशमिजाज रहना उनकी खूबी थे और फक्कड़पन को उनकी कमी भी कहा जा सकता है। उन्होंने जिंदगी को अपने अंदाज में जैया, लंबे पत्रकारिता जैवन में उनहें बहुत बड़ी बड़ी जगह, बड़े-बड़े लोगों के साथ काम करने का मौका मिला, लेकिन वे दिल-ओ-दिमाग पर बोझ लेकर काम करने वाले इंसान न थे। किसे मालूम था, इतने खुश और नर्म दिल शख्स का दिल ही धोखा दे जाएगा।

करीब चार साल पहले दिल ने उन्हें खतरे से आगाह किया था, लेकिन वे कहां मानने वाले थे, वो तो दिल से मानने वाले थे, यहीं वजह रही कि इंदौर के हर कोने में उनके चाहने वाले मिल जायेंगे, शुरुआत में कुछ वक्त उनके पास गाड़ी नहीं थी तो वे लिफ्ट लिया करते थे आप हैरान होंगे कि शहर के हर कोने में उनको लिफ्ट देने बाले दोस्त मिल जाया करते थे, इससे उनकी मकबूलियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। उनके चाहने वालों में मसलक, जाति और धर्म का कोई दखल नहीं था। न कद का, न रुतबे का इसीलिए जब उनके गुजर जाने की खबर अग्निबाण के वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप मिश्रा ने सुनी तो उपफ’ करके रह गए। फिर कहा ‘सज्जनता’ शब्द ही उनके लिए बना था (प्रभात किरण के पत्रकार एवं को-आर्डिनेटर हिदायतुल्लाह खान को आवाज ताहिर भाई के जाने का गम बर्या कर रही थी और शिकायत उनके फक्कड़पन की। इस शिकायत में बहुत-सा दर्द था साथ ही उनकी सादगी और नफासत का तब्सिरा भी।

वे भले ही शहरभर से रूबरू रहे, लेकिन कभी किसी विवाद में उनका नाम नहीं आया। झगड़ा क्या होता है, शायद उन्हें पता है नहीं था। आज के दौर में जब विचारों की लड़ाई तो लगभग हर दोस्त, हर मिलने वाले के बीच है, लेकिन ये कमाल ताहिर भाई का था कि वे सब के सिद्दीक (सच्चे) दोस्त थे। शायद इसीलिए उनके इंतकाल की खबर सुनकर एक्टिविस्ट और इस्लामिक स्वर्टेलर सलीम अंसारी ने कहा ताहिर की ये खूबी थे कि उनकी कोई विचारधार ही नहीं थी। बेहद खुश अखलाक और खुश रुह इंसान था। वे सबके विचारों का सम्मान करते थे, इसलिए कांग्रेस, भाजपा, हिंदू, मुस्लिम, शिया, सुत्री, सबकी महफिलों में नजर आ जाते। ख्वाजा उस्मान ए हारूनी कमेटी के सलीम लाइक जब चादर और उर्स की तैयारी करते तो सलाहकारों में ताहिर भाई भी होते और मौलाना शाहिद बरकाती की ग्यारहवीं की दावत में भी।

जब भी, जिससे भी मिलते बड़े अदब से मिलते, छोटा हो या बड़ा उनके अदब में कोई कमी न थी। यहीं वजह थी उनसे भी हर कोई मुहब्बत और अदब से ही मिलता। दैनिक दस्तक के प्रबंध संपादक सलीम दस्तक कहते हैं ताहिर भाई बिना किसी चाहत के मुहब्बत करते थे। एक वाकिया सुनाते हुए कहते हैं एक बार मुझे कोई परेशानी हुई तो उन्होंने सबसे पहले फोन लगाया और तसल्ली दी। मैं कहता आप बड़े खानदान से ताल्लुक रखते हैं…. तो वे मुस्कुराकर कहते सब मुहब्बत करते हैं तो मैं भी सबसे मुहब्बत करता हूँ। कवि एवं वरिष्ठ पत्रकार पंकज दीक्षित ताहिर भाई की खबर सुनकर स्तब्ध रह गए। कल एक हंसता मुस्कुराता चेहरा आंखों के सामने घूम रहा है। निहायत शरीफ इसन थे ताहिर भाई।

अग्नि आलोक की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि । ताहिर भाई को अल्लाह ताला जन्नत नसीब करे

वे भले ही हंसते मुस्कुराते रहते थे, लेकिन उनके साथ बेतकल्लुफ होना बहुत मुश्किल था। अलबत्ता ऐसा भी नहीं था कि वे किसी से बेतकल्लुफ नहीं होते थे। हां, इस बेतकल्लुफी में वे अपनी जुबान, लहचे और शयाकत का खास ख्याल रखते। इस दायरे से बाहर उन्हें जहां भी बेतकल्लुफी का अंदाजा होता, वहां से फौरन बाहर हो जाते फिर चाहे कितनी भी बड़ी महफिल हो अपने चरित्र के साथ ही वे अपने लिबास का भी बहुत ख्याल रखते। हम दोस्त अक्सर कहते ताहिर भाई की पेट की क्रीज को भी हमने कभी टूटे हुए नहीं देखा, न कभी बाल बेतरतीब देखे न दाढ़ी। सब में कमाल के थे ताहिर भाई। अल्लाह उनकी ममफिरत करें, आमीन, या रब्बुल आलमीन !

 -आदिल सईद

कमाल की शख्सियत

खूबसूरत अखलाक, संजीदगी और खुशमिजाज तबीयत के मालिक ताहिर कमाल सिद्दीकी नहीं रहे। शहर के सियासी, सामाजिक, दीनी और राजनीतिक हलकों में अपनी नेक सीरत से खास पहचान बनाने वाले ताहिर कई दिनों से बीमार थे। दिल का ऑपरेशन हुआ था। कां दिली को गमगीन कर गए।

अस्पताल में भर्ती होने की खबरों के बाद ताहिर के लिए सेहतचाबी की दुआ दिल से निकल रही थी, लेकिन अल्लाह की खबहिश ताहिर को अपने पास बुलाने की थी। शहर के कई अखबारों में लिखे गए ताहिर के कॉलम खूब चाच से पढ़े जाते थे। खासकर रमजान में अग्निबाण में प्रकाशित होने वाला उनका कॉलम खूब मशहूर थे। परिवरिक दस्तक और नईदुनिया में भी लिखते थे। ताहिर के इंतकाल की खबर ने उनके दोस्तों के साथ ही पूरे शहर को झकझोर दिया है।

ताहिर भाई को सिर्फ लिख्मा-बोलना ही नहीं आता था, रहन-सहन और मेल-जोल के साथ हर वो हर अदा थी, जो नेक इंसान बनाती है। शराफत कूट-कूटकर भरी थी, क्योंकि वालिद से मिले थी, लेकिन दुनिय के तौर-तरीके नहीं सीख पाए। कोशिश की पर नाकाम रहे। जंदगी की गाड़ी पकड़ने के लिए दौड़ते रहे लेकिन स्टेशन से ऐसी छूटी की हाथ ही नहीं आई। फिर किसी ने चेन भी नहीं खोची।

ताहिर भाई को देखकर हमेशा लगता था इस सात दुनिया में इतना शरीफ आदमी कहां से आ गया? जाहिर है दुनिया तो रास्ता बदलने वाली नहीं थी। ताहिर भाई को ही तय करना था कैसे चलना है और कत्त निकल गया। शराफत के कंपलीट पैकेज थे ताहिर भाई लेकिन अफसोस! उनमें बदमाशी क्यों नहीं थे?

ताहिर भाई का ‘66419’ कहना याद आएगा !

ये मेरा नंबर है, लेकिन उनके लिए जैसे किसी रिश्ते का ताबीज। आज जब लोग आनी बीवी पा बच्चों का नंबर तक मोबाइल पर ढूंढते हैं, जो बरसों से मेरा नंबर हिक्रा किए बैठे थे। न उनकी नीयत बदली, न मेरा नंबर।

दुबई जाने की वजह से मुलाकादों का सिलसिला थम गया था। वक्त बाता रहा (साल बीतते गए, लेकिन पिछले महीने प्रेस क्लब के चुनाव में अचानक आमना-सामना हुआ। उन्होंने मुस्कुराकर का 9827066419 और हम दोनों जोर से हंसे। जैसे वक्त पलटकर वहीं आ गया हो जहां से बातें अधूरी रह गई थीं।

ताहिर भाई शराफत की मिसाल थे। लाजा, पहनावा, उठना-बैठना सब में सलीका झलकता था। जैसे किसी किताब से निकले हों, जिसमें इंसानियत के मारे सबक लिखे गए हों। वालिद का असर इतना गहरा थे कि तमीज और तहदीन उनकी नसों में दौड़ती थी मगर इस मरात और चालाक दुनिया की बदमाशियों का एक कतरा में नहीं पहुंचा। कदर कने बाले बहुत थे मगर मौके देने वाले कम। जो समझते थे, उन्होंने समझाने की कोशिश भी की पर ताहिर भाई को अपनी सादगी है अजीज रही। वो जानते थे चालाकी से जिंदगी शायद आसान हो जाती है मगर शरारुत से ही इंसान की असल पहचान बनती है।

अब वो नहीं हैं, मगर जब भी कोई बेदार, सीधा-सच्य इंसान दिखेगा दिल कहेगा कुछ ऐसे ही थे ताहिर भाई। उनकी याद अब सिर्फ एक चोहरे की नहीं, एक किरदार की मिसाल है जो साचित करती है कि सादगी हारते नहीं, बस दुनिया समझ नहीं पाती। अल्लाह तआला वाहिर भाई को अपनी रहमतों में जगह दे। उनकी ममफिरत फरमाए और हमें भी ऐसी जिंदगी दे कि जाने के बाद लोग याद करें। ठीक वैसे ही, जैसे आज सब ताहिर भाई को याद कर रहे हैं।

जाहिद खान

कुछ बदमाशी सीख जाते !

किसी से भी ले सकते थे क्योंकि सब तरफ एक्स्ट्रा है पर उन्हें मुफ्ती साहब से शराफत मिली थी, जिसे आखिर तक नहीं छोड़ा। फिर लोगों के इंतखाब में चूक कर गए। काबिलियत के साथ इंसक्त नहीं हो पाया इसलिए जहां जा सकते थे, वहां तक जा नहीं पाए। प्यार करने वालों ने राह दिखाने की कोशिश की लेकिन ताहिर भाई की अपनी राह अजीज थी। उम्र में छोटे थे पर कभी मुंह से ताहिर निकला ही नहीं क्योंकि सीध नाम तो कोई उनका ले ही नहीं सकता था। यही तो उनकी शख्सियत थी। लिखा जा सकता है कि अप हमेश याद रहोगे पर कौन किसको याद रखता है। हां, कभी कोई शरीफ आदर्भ मिला तो ताहिर भाई याद आ जाएगी। जैसे मुश्किल है।

हिदायतुल्ला खान

Ramswaroop Mantri

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