कृष्ण कान्त
लगभग 7 बार उबली चाय का गिलास तकरीबन ढाई घूंट में उदरस्थ करने के बाद चचा ने आशिकी नाम की पीली पुड़िया फाड़ी, उससे तमाकू का सम्मिलन कराया और थोड़ा चुना मिलाकर रगड़ने लगे। यह ध्यान की वो मुद्रा है, जिससे गुजरकर भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हो गया था। कुछ मिनट की रगड़न के बाद जब सुपारी, तमाकू और चुना आपस में आत्मा और परमात्मा की तरह एकाकार हो गए तो चचा ने सारा माल एक फुट दूर से मुंह में प्रक्षेपित किया और कुछ क्षण के लिए आंख बंद करके परम आनंद की अनुभूति ली।
अब तक सनेही का अयोध्या में दीप प्रज्ज्वलन वर्णन चल रहा था। मुंह में प्रक्षेपित माल, गाल में दबाते हुए चचा बोले- “अबहिन ज्यादा दिन नहीं बीता है, कुछ हजार लाशों को मुखाग्नि नहीं नसीब हुई थी। तब ये कहां थे जब लाशों का रिकाड बन रहा था? अब लाखों दीये जलाने का पाखंड उस पाप से नहीं बचा पाएगा।”
हाथ में नया मोबाइल संभाले भगेलू का लौंडा वायरल वीडियो की तरह वोकल हो गया- “वहां दिया जलाने के बाद तमाम लोग दिया से तेल बटोर रहे हैं। तेल एतना महंगा हो गया है कि पब्लिक तेल के नाम पर कचरा भी बटोर ले।”
इसी बीच टोटल चार फुट के एक अनुभवी अधेड़ ने बहुत बड़ी बात बोल दी- “बहुत सरकार देखा, बहुत नेता आए गए, मुला अस महंगाई जीवन भर मा नाइ देखा। अब ये चहै जौन करैं, अबकी जीत न पइहैं।”
वायरल वीडियो वाले वोकल के बगल में बैठा लोकल हिंदू शेर बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसके अंदर का राष्ट्रवाद चोकरने लगा- “चाहे जौन कहो लेकिन कटुवों का दिमाग ठिकाने है…”
बात काटते हुए चचा बोल पड़े- “तुम हो चूतिया! चार दिन सरकार में रह लिए तो बड़के हिंदू रक्षक हो गए! बाकी सब यहां बकचोन्हर बैठे हैं? ये नहीं थे तो हमें कौन उजाड़ दिया था? ये आ गए तो कौन हमको आबाद कर दिए। बस बकैती करवा लो।”
लौंडे को लगा कि सहमति दे देने में भलाई है। धीरे से कांखा- “हां ई तौ है कि ये बीजेपी वाले हर बात पर हिंदू-मुसलमान ही करते हैं।”
गुज्जू नाम का गुटखाखोर जो अभी तक मौनी बाबा बना हुआ था, उसके अंदर का शांत ज्वालामुखी गुटखे की पीक के रूप में पुचुक की आवाज के साथ बाहर आया। थोड़ा मुंह चुनिया कर जिह्वा को धार दी- “अब इनके ऊपर हमारी … ही सुलगती है।” उनका इशारा शरीर के किसी संवेदनशील इलाके में धुआं उठने की ओर था। मुंह में बचा माल पवन वेग से बेंच के पीछे गिरा और बात आगे बढ़ी- “कहते हैं हिंदू को वोट दो, हिंदू को वोट दो, बाकी सब नेतवै मुसलमान हैं? हम सब मायावती को वोट दिए तो हम मुसलमान हो गए? अखिलेश मुसलमान हो गए? इनका नाटक अब बहुत हो गया।”
चचा ने चाय पर चर्चा की ताबूत में करीब-करीब आखिरी कील ठोंक देने वाला क्लोजिंग रिमार्क पेश किया- “सीधी सी बात, सबको आजमाया, इनको भी आजमाया। हिंदू के नाम पर वोट लेकर आये और जबसे सरकार बनी तबसे हिंदू दिन रात छुट्टा गोरू हांक रहे हैं। जैसे सब थे वइसे होते तो भी ठीक था, ये उनसे भी गए गुजरे हैं तौ भइया जय सीताराम…”
इसके बाद हिसाब हुआ कि कौन कौन विधायक का टिकट कटेगा, कौन कौन हारेगा और किसको जीतना चाहिए। ये भी चर्चा हुई कि मोदी आज केदारनाथ में रुद्राभिषेक कर रहे हैं।
अनुभवी अधेड़ ने फरमाया- “अरे भाई परधान मंतरी हैं, खजाना उनके हाथ मा है। चहै घूमें, चहै रैली करें, चहै पूजापाठ करें, उनको कौन कमी है?”
अचानक चचा उठ खड़े हुए, दोनों हाथ से पिछवाड़ा झाड़कर गमछा खोपड़ी में लपेटा, लाठी उठाई और सिवान की तरफ उन्मुख होते हुए बोले- “चलो भैया, खेत रखाओ, नाहीं जो कुछ बचा है वह भी घर नहीं आएगा।”
चचा के प्रस्थान के साथ सभा विसर्जित हुई।
*कृष्ण कान्त*





