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*शिक्षक दिवस विशेष*

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शशिकांत गुप्ते इंदौर

इन दिनों शिक्षक दिवस भी अन्य दिवस की तरह औपचारिक रूप से मनाया जा रहा है।

फादर्स डे,मदर्स डे,फ्रेंड्स डे,वेलेंटाइन डे,आदि।

इसका मतलब प्रत्येक वर्ष में कोई एक दिन मुकर्रर कर उसी दिन हम माता पिता को याद करने की औपचारिकता का निर्वाह करते हैं।

जीवन की पहली शिक्षिका मां होती है,ऐसा पुस्तकों में लिखा हुआ है।

सुविधाभोगी और भौतिकवादी मानसिकता से ग्रस्त बेटें अपने माता,पिता को वृद्धाश्रम में भर्ती कर देते हैं। व्यवहारिक भाषा में इसे माता,पिता को वृद्धाश्रम में रखना कहते हैं।

बहरहाल मुद्दा है शिक्षक दिवस का? वर्तमान में विद्यार्थियों के समक्ष एक व्यवहारिक और अहम प्रश्न उपस्थित होता होगा? 

किस शिक्षक को प्राथमिकता दे कर सम्मान करें, विद्यालय, महाविद्यालय के शिक्षक या ट्यूशन क्लासेस के शिक्षकों का?

शिक्षक का मतलब आचार्य  होता है।

मुझे एक विचारक ने आचार्य चाणक्य के वक्तिव्य के महत्व को समझाते हुए कहा कि,चाणक्य ने  सभी शिक्षकों के समक्ष एक महत्वपूर्ण संदेश प्रस्तुत किया है,शिक्षक को कभी भी सत्ता के मातहत नहीं होना चाहिए। 

शिक्षक मतलब आचार्य जब सत्ता के मातहत होता है तो उसे सत्ता की गलत नीतियों का मजबूर होकर समर्थन करना पड़ता है।

*चाहे वह द्वापर युग में घटित चिर हरण जैसी घटना ही क्यों न हो?*

शिक्षक सृजनकर्ता होता है।चाणक्य ने एक बालक में नेतृत्व के गुण देखकर उसे शासक बनाया। चंद्र गुप्त को राजा बनाने के बाद चाणक्य ने शिक्षक होने के नाते राज्य व्यवस्था पर अपना वर्चस्व रखा था।

यदि चाणक्य वैतनिक शिक्षक होता तो सत्ता पर अपना प्रभुत्व रख नहीं पाता।

शिक्षक का महत्व शिक्षक स्वयं भी तब समझ पाएगा जब वह नागरिक शास्त्र जैसे ऐच्छिक विषय की अनिवार्य विषय, समझ कर पढ़ेगा और अपने विद्यार्थियों को भी पढ़ाएगा।

किसी भी विषय को पढ़ाने वाला शिक्षक हो और कोई भी  विषय पढ़ने वाला विद्यार्थी हो उसे सर्व प्रथम एक योग्य नागरिक बनना

चाहिए।

कोई चिकित्सक हो,अभियंता हो,वैज्ञानिक हो,किसी भी सामाजिक एवं राजनैतिक दल का पदाधिकारी हो उसे अपने देश का योग्य नागरिक बनना अनिवार्य है।

शिक्षक दिवस पर हम सभी शिक्षकों के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए,यही संकल्प ले कि हम सभी अपने देश के सच्चे नागरिक बनेंगे।

यदि देश की जनसंख्या एक सौ चालीस करोड़ है,तो एक बटा एक सौ चालीस करोड़ मै भी हूं।

इस बात को सभी नागरिकों ने आत्मसात करना चाहिए।

हम योग्य नागरिक बनेंगे तो, हम प्रत्येक भारतवासी अपने देश में सर्वधर्म समभाव,के सिद्धांत पर अमल केरेंगे।

शिक्षक देश की भावी पीढ़ी का निर्माता होता है। यदि शिक्षक ही अपने अबोध विद्यार्थियों को सांप्रदायिक सद्भाव की जगह सांप्रदायिक वैमनस्यता के लिए उकसाता है तो यह सिर्फ वैमनस्यता नहीं है यह भावीपीढ़ी के जेहन में शत्रुता का ज़हर भरने की घिनौनी साज़िश है।

शिक्षा ग्रहण करने का अर्थ सिर्फ पढ़ा लिखा होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि शिक्षित भी होना  चाहिए।

शिक्षित होने पर हमारी वैचारिक सोच व्यापक हो सकती है।

Ramswaroop Mantri

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