तेजपाल सिंह ‘तेज’
मज़हबी टेहनी पे गुल फूटेंगे अभी और,
इंसानियत के हौसले टूटेंगे अभी और।
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फर्ज अपना गैर ने छोड़ा नहीं ऐ! तेज,
अपनों ने पर अपनापन बाजार किया ।
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भरने का अभी प्रश्न कहाँ कि सदियों से,
सियासत भूखे पेट की खाई नाप रही है।
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ढूंढने को खुद को अब जाऊं किधर को मैं,
ये रहा न वो रहा, ग़र मैं रहा तो क्या रहा।
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वो कहता है बात-बात पर कि मैं मजे में हूं,
फिर आँख में आँसू, है हाथों में जाम क्यूं।
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दिखावे की चीज थोड़े ही होती है दोस्ती,
दोस्ती के रिसाव से निभाव चला जाता है।
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घड़ी भर को ही सही, मिली तो सही,
यूं भी खुशी सबको सदा मिलती नहीं।
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शब कितनी ही सियाह हो लेकिन,
सहर के होते ही सिमट जाती है।
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मकां में मेरे, क्या कुछ नहीं मिलता,
एक मैं ही हूँ जो खोजे नहीं मिलता।
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वो दिन गुजरे तो ये दिन भी, जल्दी ही गुजर जाएंगे,
मगर अफसोस कि ये ‘जल्दी’ कभी जल्दी नही आती।
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तो वो कभी खुद में जिए, न मैं कभी खुद में जिया,
फिर वो जिए तो क्या जिए, मैं जिया तो क्या जिया।
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सिर पर मेरे गागर नहीं आकाश है,
फिर बता तेरी जेब में पत्थर क्यूँ है।
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बहुत ग़मगीन ग़ज़ल कहता है,
दर्द शायर का असल लगता है।
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मिलके भी कभी आपसी बातें नहीं होतीं,
ये दूरियाँ कैसी हमारे दरमियाँ रखदीं।
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मुझको तो राहेबर पर, शक गुजरता है,
अंदाज उसकी बात का कुछ रहजनी सा है}
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यूँ तो मुद्दत हुई छोड़े हुए शराब, पर
आदत सी हो गई है बहक जाने की।
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इंसानियत के हाथ की नश काटकर,
कुछ लोग हैं जो शहर में मशहूर हो गए।
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मिलती नहीं तवज्जो जिनको अपनों से,
वो गैरों से हाथ मिलाने लगते हैं।
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न जाने उसकी आँख में कितने समन्दर है निहां,
शांत परबत की तरह वो अपना मिज़ाज रखता है।
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तेजपाल सिंह ‘तेज’ का जन्म अगस्त 1949 में
बुलन्दशहर (उ.प्र.) के अला बास बातरी में हुआ।
अब तक इनकी गद्य-पद्य की लगभग तीन दर्जन
किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें से पाँच ग़ज़ल
संग्रह हैं। आपको हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा
“बाल साहित्य” और “साहित्यकार” सम्मान से
नवाजा जा चुका है। आपको बागी तेवर के कवि के
रूप में जाना जाता है।





