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*मनरेगा को खत्म करने का षड्यंत्र दरअसल देश की अर्थव्यवस्था को खत्म करने की साजिश तो नहीं*

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      परमजीत बॉबी सलूजा,

 ग्रामीण भारत में बेरोजगारी कम करने, पलायन रोकने, गरीबी दूर करने हेतु केंद्र की डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तात्कालीन यूपीए सरकार  महत्वाकांक्षी योजना नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (नरेगा) लेकर आई थी। 07 सितंबर 2005 को इसे अधिसूचित किया गया था और 02 फरवरी 2006 को इसे देश के 200 जिलों में लागू किया गया था। 2008 में इसे देश के सभी 593 जिलों में लागू किया गया। 02 अक्टूबर 2009 को इस महती योजना को  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के नाम समर्पित करते हुए इसे महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा) नाम दिया गया था। इस महत्वाकांक्षी के पीछे बेल्जियम में जन्में प्रख्यात अर्थशास्त्री ज्यों द्रेज जो दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से संबद्ध थे, की अहम भूमिका थी। यूपीए की चेयरपर्सन श्रीमति सोनिया गांधी की विशेष दिलचस्पी एवं सक्रियता ने इसे अमलीजामा पहनाया था। यह दुनिया का वाहिद कार्यक्रम था जिसमें वर्ष के सौ दिन रोजगार देने का बाकायदा कानून था न कि यह केवल सरकारी योजना थी। इस गारंटी एक्ट की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि ग्रामीण महिलाओं को सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सक्षम बनाने हेतु इसमें 1/3 हिस्सा महिलाओं को रोजगार देने का तथा बिना लैंगिक भेद के समान पारिश्रमिक देने का प्रावधान किया गया था। इस महती वृहद योजना की प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय मंच पर सराहना हुई थी। विकासशील भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में यह योजना गेम चेंजर साबित हुई थी, इसने कई परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर आने में मदद की थी, उस दौर में कुल जमा 27 करोड़ आबादी गरीबी रेखा से ऊपर उठकर अपना जीवन यापन कर रही थी। इसमें भी कोई शक नहीं कि इस एक योजना ने भी 2009 के आमचुनाव में यूपीए सरकार की वापसी में बड़ी भूमिका निभाई थी। 

2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने पर मोदी जी ने संसद में इस योजना को लेकर मनमोहन सरकार पर खूब कटाक्ष किया था और मनरेगा को आजादी के बाद भी रोजगार देने के नाम पर गड्ढे खोदने का काम कहा था और इसे कांग्रेस की विफलता का जीता जागता स्मारक कहा था तथा इसके ढोल पीटते रहने की बात कही थी। मोदी जी का सत्ता के अहंकार में किया गया व्यंग्य तब उन्हें ही भारी पड़ा जब वैश्विक महामारी कोविड19 के दौर में सबकुछ थम गया था, अर्थव्यवस्था डूब रही थी तब कांग्रेस की विफलता का यही जीता जागता स्मारक ग्रामीण भारत को तबाह होने से बचाने के काम आया था। खैर वह बुरा दौर तो बीत गया पर कांग्रेस सरकार द्वारा लाई गई इस योजना के प्रति मोदी जी का पूर्वाग्रह कम नहीं हुआ, किसी तरह से इसे कमजोर करने, खत्म करने का प्रयास जारी रहा। 

दिसंबर 2025 संसद के शीतकालीन सत्र में अंततः मोदी सरकार ने इस योजना को खत्म करने की ओर कदम बढ़ा दिया है। शुरुआत इसके नाम को बदलने से किया गया है। मनरेगा का नाम बदलते हुए इसे विकसित भारत- गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) VB- G RAM G *जी राम जी* करने का प्रावधान लाया गया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से इस विचारधारा की दुराग्रह, नफ़रत फिर उभरकर सामने आ गई। इस योजना को जिस मकसद से लाया गया था उसे ही खत्म करने को सरकार बढ़ चुकी है।

1.  यूपीए सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में पांच कि मी के अंदर ही और साल में सौ दिनों तक रोजगार देने की गारंटी का प्रावधान किया था पर एनडीए सरकार के प्रस्तावित बिल में यह गारंटी प्रावधान ही नहीं है। ऐसे में इसके सुचारू रूप से चलने पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो जाएंगे।

2.  धारा 22(2) के तहत मनरेगा की राशि आंबटन में 90% हिस्सेदारी केंद्र सरकार द्वारा तथा 10% हिस्सेदारी राज्य सरकारों द्वारा वहन करने का प्रावधान सुनिश्चित था पर नए बिल में मोदी सरकार ने केंद्र की हिस्सेदारी 60% और राज्यों की 40% तय की है। राज्यों की आर्थिक स्थिति वैसी नहीं है कि इसे वहन कर सकें ऐसे में बजट के अभाव में योजना चरमरा कर खत्म हो जाएगी जिसका ठीकरा केंद्र सरकार राज्यों पर फोड़कर अपना पल्ला झाड़ लेगी। 

3.  मनरेगा में योजना ग्रामों की होती थी और बजट का बहुत बड़ा हिस्सा केंद्र द्वारा आंबटित होता था जबकि नए बिल में योजना केंद्र सरकार बनाएगी, बजट भी कम देगी। आशय यह कि अब केंद्र सरकार तय करेगी कि कहां काम कराया जाएगा, साफ है इससे भेदभाव बढ़ेगा। ऐसे में केंद्र तथा राज्यों का टकराव बढ़ेगा, जिसके चलते केंद्र का इस योजना को बंद करने का मंसूबा पूरा हो जाएगा।

4.  मनरेगा में राज्य सरकार तथा ग्राम पंचायत तय करते थे कि योजना कहां चलानी है, कब तक चलानी है, कैसी चलानी है पर नए बिल में केंद्र सरकार इसके मानक तय करेगी। साफ है कि वह भेदभाव और मनमानी करेगी, इससे केंद्र तथा राज्यों में तनातनी बढ़ेगी अंततः स्थितियां योजना को बंद करने की दिशा में बढ़ेंगी जो कि केंद्र सरकार की मूल मंशा है।

5.  मनरेगा में राज्य सरकार का स्थानीय प्रशासन मजदूरों को भुगतान की राशि तय करता था पर नए बिल के मुताबिक केंद्र सरकार ही तय करेगी कि मजदूरों को कितनी मजदूरी दी जाएगी। यह सीधे राज्य के अधिकार का हनन है इससे भी रस्साकशी बढ़ेगी जो इस योजना को बंद करने का कारण बनेगी, केंद्र सरकार यहां भी आरोप राज्यों पर लगा देगी।

ऐसे अनेक गंभीर सवाल हैं जिसका कोई जवाब केंद्र सरकार के पास नहीं है और वह अपने चिरपरिचित अंदाज में मुद्दे को भटका रही है। सरकार की इस पहल से समझ आता है कि उसके समक्ष गंभीर आर्थिक संकट है और वह इस महती योजना को बजट देने की स्थिति में नहीं है। वह अपनी नाकामी का ठीकरा राज्यों पर फोड़कर अपना पिंड छुड़ाना चाहती है। इसी बदनीयती से वह नया बिल लेकर आई है।

देश की जनता के लिए यह चेतावनी है कि देश की आर्थिक दशा बिल्कुल सही नहीं है।  पहले नोटबंदी का सिरफिरा फैसला लिया गया जिस पर कोई गंभीर तैयारी नहीं की गई थी, मोदी सरकार जिन कारणों से इसे लागू करने के तर्क दे रही थी वह कोई भी फलीभूत नहीं हुई बल्कि देश में रोजगार देने वाला सबसे बड़ा सेक्टर MSME पूरी तरह से तबाह हो गया तथा उस भयानक फैसले से आर्थिक स्थिति बेपटरी हो गई जो आज तक सही दिशा में नहीं आई है। देश में भयंकर बेरोज़गारी का बहुत बड़ा कारण नोटबंदी भी है। इसके बाद कोविड महामारी के दौर में परिस्थितियों ने विकराल रूप लिया, सरकार समय रहते कोई भी सही कदम नहीं उठा सकी जिससे आर्थिक समस्या बढ़ती गई, उस समय सरकार ने विपक्ष, अर्थशास्त्रियों, अनेक एनजीओ के दबाव में 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दिया। कोविड के बाद सरकार को आर्थिक नीतियों पर गंभीरता से काम करते हुए रोजगार मुहैया कराने की दिशा में काम करना था और मुफ्त राशन योजना को समाप्त करना था पर वह योजना आज भी जारी है और लगता है कि सरकार भी चाहती है कि देश के इस बड़े तबके को यूं ही मुफ्त राशन मुहैया कराते हुए अपना आश्रित बनाए रखा जाए। बेरोजगारी तथा मुफ्तखोरी के बाद अब मनरेगा को बंद करने की दिशा में बढ़ती हुई सरकार देश को गहरे आर्थिक संकट की ओर धकेल रही है, क्योंकि MSME के बंद होने से शहरी बेरोज़गारी भयंकर रूप से बढ़ी और अब मनरेगा बंद होने से ग्रामीण बेरोज़गारी भयावह रूप से बढ़ेगी। कृषि क्षेत्र की बदहाली भी किसी से छिपी नहीं है, अनगिनत किसानों की आत्महत्या इसका सबूत है। ऐसे में चहुंमुखी आर्थिक संकट से देश किन झंझावतों में फंसेगा और इससे देश की जनता को किन समस्याओं से जूझना पड़ेगा, कल्पना की जा सकती है। 

आवाम की अभी की खामोशी, हमेशा के लिए खामोश रहने की पटकथा होगी, बस इतना समझ लिजिए।

                परमजीत बॉबी सलूजा,

               नया रायपुर, छत्तीसगढ़।

                     18. 12. 25.

Ramswaroop Mantri

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