अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*हिन्दी लघु पत्रिकाओं का क्षेत्र:तानाशाह कभी अपने समय का नायक नहीं हो सकता*

Share

जाहिद खान 

हिन्दी लघु पत्रिकाओं का क्षेत्र बेहद विस्तृत है। इनमें से कई पत्रिकाएं ऐसी हैं, जो अपने वैचारिक कॅन्टेन्ट, सुरुचिपूर्ण छपाई और अनेक बेहतरीन विशेषांकों के बाद भी अलक्षित ही हैं। उनके काम को उस तरह से सराहा नहीं गया, जितनी कि वे उसकी हक़दार थीं। मैं ज़िक्र कर रहा हूं भोपाल से प्रकाशित पत्रिका ‘रचना समय’ का। कथाकार हरि भटनागर और बृजनारायण शर्मा के दृष्टिसम्पन्न सम्पादन में इस पत्रिका के अब तक कई महत्वपूर्ण विशेषांक आये हैं। ख़ास तौर पर विश्व साहित्य के प्रतिष्ठित लेखकों पर केन्द्रित उन्होंने जो विशेषांक निकाले, उनका कोई जवाब नहीं। वे सभी ला—जवाब हैं। इन विशेषांकों में गाब्रिएल गार्सीया मार्केस, अन्तोन चेख़व, ज़्याक देरिदा, सिमोन द बोउआर, एरिक हॉब्सबॉम, एडवर्ड सईद, पुश्किन, निकोलाई गोगोल, जॉर्ज ऑरवेल, समरसेट मॉम, फ्रेंज़ काफ्क़ा, लोर्का, मिशेल फूको, लुकाच, कामू और ज्याँ पॉल सार्त्र अहम हैं।

इन विशेषांकों में सम्बंधित रचनाकारों की प्रमुख रचनाएं, विचार, इंटरव्यू, व्याख्यान, पत्र और उन पर केन्द्रित आलेख शामिल हैं। अंकों की ख़ासियत इनका शानदार अनुवाद है। जिन्हें पढ़कर एहसास ही नहीं होता कि ये रचनाएं दीगर ज़बानों से हिन्दी में अनूदित होकर आई हैं। वाक़ई ये काफ़ी श्रमसाध्य कार्य है, पर इच्छाशक्ति हो तो असंभव भी नहीं। एक लिहाज़ से देखें, तो ‘रचना समय’ के ये अंक मैगज़ीन की शक्ल में एक मुक़म्मल किताब हैं। जिन्हें हर विचारवान पाठक अपने पास रखना चाहेगा। इसी सिलसिले में पत्रिका का आगामी अंक फ्रेंज़ काफ्क़ा पर केन्द्रित है, जो जल्द ही पाठकों के बीच होगा।

‘रचना समय’ ने अपनी साहित्यिक यात्रा का और विस्तार करते हुए, हाल ही में एक अभिनव क़दम उठाया है। विश्व के शीर्षस्थ रचनाकारों पर एकाग्र विशेषांकों के अलावा अब पत्रिका समय—समय पर ए​​क विशेष पुस्तिका भी प्रकाशित करेगी। यह पुस्तिका किसी कथाकार की एक कहानी या किसी कवि की कुछ कविताओं पर केन्द्रित होगी। जिसमें रचनाओं के साथ—साथ उन पर विमर्श भी होगा। सीरीज़ का आग़ाज़ इक्कीसवीं सदी के चर्चित कथाकार तरुण भटनागर की कहानी ‘पारगमन’ से हुआ है। पुस्तिका में न सिर्फ़ यह कहानी प्रकाशित हुई है, बल्कि इस कहानी पर कथा आलोचक सूरज पालीवाल, जयप्रकाश और कवि सौमित्र के समीक्षात्मक आलेख भी हैं।

तरुण भटनागर की जितनी अच्छी कहानी है, उतने ही बेहतरीन ये आलेख हैं। इन आलेख में आलोचकों ने जिस तरह से ‘पारगमन’ पर बात की है, कहानी का रेशा—रेशा अलग हो गया है। अपनी कहानी में कथाकार जो कहना चाहता है, पाठक उसके मंतव्य तक पहुंच जाते हैं। यही एक अच्छी आलोचना की पहचान है। सूरज पालीवाल और जयप्रकाश समर्थ कथा आलोचक हैं, और जब वे किसी रचना पर बात करते हैं, तो उसके कुछ ख़ास मायने होते हैं। पाठक उनकी बात को गंभीरता से लेते हैं। यह साख कोई एक दिन में नहीं बन जाती, बरसों साधना करना पड़ती है, तब जाकर वह बात पैदा होती है।

बहरहाल, सूरज पालीवाल अपने इस आलेख में लिखते हैं—”’पारगमन’ पढ़ते हुए मैं पहली शताब्दी के भारत, चीन और श्रीलंका के बौद्ध विहारों में भी घूमता रहा और यह भी देखता रहा कि ज्ञान की भूख दुर्गम रास्तों को भी सहज बना देती है। कहानी का सोपान बड़ा है, यानी पहली शताब्दी से लेकर अब तक।” किसी कहानी को पढ़कर, पाठकों को अगर इस तरह का एहसास हो। लफ़्ज़ों से जब तस्वीरें बनने लगें, तो कथाकार अपने मक़सद में कामयाब है। कोई कहानी या रचना बड़ी तब बनती है, जब उसका कैनवस बड़ा हो। फिर ये कहानी तो पहली शताब्दी से लेकर मौजूदा दौर तक आती है।

और इसमें एक ऐसा संदेश है, जो हमेशा प्रासंगिक रहेगा। ‘पारगमन’ में दो अहम—तरीन पैग़ाम हैं। पहला, मानवजाति और कुदरत की किसी भी तरह हिफ़ाज़त की जाए। दूसरा, अपनी जान को भी जोखिम में डालकर, उस इल्म को बचाना जो इंसान को इंसान बनाता है। अपने समीक्षात्मक आलेख का अंत सूरज पालीवाल एक समीचीन टिप्पणी से करते हैं, ”दंभ व्यक्ति को तानाशाह बनाता है और तानाशाह कभी अपने समय का नायक नहीं हो सकता। इसलिए सारी बड़ी कथाएं तानाशाहों की अपेक्षा उन सहज साधारण लोगों की हैं, जिन्होंने त्याग, उदारता और कल्याणभरा जीवन जिया। नन्हे तोते की कथा भी ऐसी ही कथा है, जो आग, धुआं और अंधेरे से भरे समय में जीवन जीने की शक्ति देती है।”

‘पारगमन’ पर दूसरा समीक्षात्मक आलेख जय प्रकाश का है। जय प्रकाश पाठकों के बीच ‘कथादेश’ में कहानियों पर लिखे अपने विचारोत्तेजक कॉलम के लिए जाने जाते हैं। वे अपना काम काफ़ी गंभीरता से करते हैं। जय प्रकाश ‘पारगमन’ समीक्षा करते हुए लिखते हैं कि इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘आकाशदीप’ और मुक्तिबोध की कहानी ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्य’ की याद आती है। लेकिन आगे चलकर वे इनमें एक अहम फ़र्क करते हैं। उनके मुताबिक़ ‘आकाशदीप’ और ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्य’ की कथा—गति इतिहास की सरलरैखिक गति के साथ चलती है, जबकि ‘पारगमन’ की संरचना बहुवृत्तात्मक है, उसमें प्रासंगिक उपकथाएं हैं, जिनकी परिधियॉं घूमती हुई चलती हैं और कथा के नाभिक में परस्पर मिल जाती हैं।

ग़ौर करें कि नन्हे तोते की, ऋषिका की या फाह्यान की उपकथाओं के स्वतंत्र वृत हैं, जो विमलमित्र के जीवन—वृत से पृथक किन्तु उससे सम्बद्ध भी हैं। ‘आकाशदीप’ और ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्य’ कहानी की तरह ‘पारगमन’ का आख्यान बीते हुए समय में, अतीत में अवस्थित है, लेकिन उसका कथ्य समकालीन है।” ज़ाहिर है​ कि यही बिन्दु किसी भी रचना को प्रासंगिक बनाता है। जय प्रकाश अपने लम्बे आलेख का अंत इस तरह से करते हैं, ”इतिहास के तंतुओं से बनी यह कहानी उसके भीतर अपना समकाल निर्मित करती है। वह अतीत का आख्यान नहीं, साभ्यतिक यथार्थ का दर्पण भी है। इसमें क्या संदेह कि समकालीन संदर्भों से न जुड़े, तो कहानी सिर्फ़ अतीत का वृत्तांत होकर रह जायेगी।”

युवा कवि सौमित्र की नज़र में ”’पारगमन’ ज्ञान, मोह और मुक्ति की गाथा है। भारतीय परंपरा के बौद्ध योग की कहानी है। इस कहानी के माध्यम से उन्होंने लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व के भारत, और उस समय के बौद्ध भिक्षुओं तथा बुद्ध से जुड़े आध्यात्मिक ज्ञान को केन्द्र में रखकर कथा रची है।” सचमुच तरुण भटनागर की इस कथा का रचाव दिलचस्प है और कहानी अपने आग़ाज़ से लेकर आख़िर तक पाठकों को बांधे रखती है। कथा का शिल्प प्रभावित करता है, तो भाषा का प्रवाह भी ज़बर्दस्त है।

कहानी, क़िस्सा—गोई है और तरुण भटनागर इस हुनर को बेहतर तरीक़े से जानते हैं। यही वजह है कि इतना जटिल विषय होने के बावजूद वे कहानी का संदेश पाठकों तक पहुंचाने में पूरी तरह से कामयाब साबित हुए हैं। ‘रचना समय’ और उसके सम्पादकों को साधुवाद कि उन्होंने न सिर्फ़ एक बेहतरीन कहानी का इंतिख़ाब किया, बल्कि उस पर सारगर्भित समीक्षात्मक आलेख भी लिखवाये। उम्मीद है कि हिन्दी साहित्य जगत भी ‘रचना समय’ की इस नयी पहल—क़दमी का ज़ोर—शोर से ख़ैर—मक़्दम करेगा।

पत्रिका समीक्षा : ‘रचना समय’ (कथाकार तरुण भटनागर की कहानी ‘पारगमन’ पर विशेष पुस्तिका), सम्पादक : हरि भटनागर, अंक : जून 2025, मूल्य : 100 रुपए, सम्पादकीय पता : 197, सेक्टर—बी, सर्वधर्म कॉलोनी, कोलार रोड, भोपाल, मोबाइल : 94244 18567

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें