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*पृथ्वीपुत्र से हारा स्वर्ग का राजा*

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         ~ अदिति शर्मा 

संस्कृति बहती है. यह रुका हुआ जलाशय नहीं है। लोकजीवन की युगयात्रा में कितने-कितने मोड आते हैं, कितने-कितने परिवर्तन हो जाते हैं कि हम कल्पना भी नहीं कर पाते। 

    दीपावली को अब लक्ष्मी-गणेश का पूजन- पर्व माना जाता है. तब के जमाने में गोकुल में दीपावली इन्द्रपूजा का पर्व था।

सूरदास ने भी,
ये ई हैं कुल देव हमारे,
दीपमालिका के दिन पांचक गोपन कहयौ बुलाई..
का उल्लेख किया है।
करौ बिचार इन्द्रपूजा कौ
जो चाहौ सो लेहु मंगाई..
अथवा
पूजा करत इन्द्र की जानी।

इंद्रपूजा की तैयारी चल रही थी.
कृष्ण ने नन्दबाबा से पूछा, “हमारे यहां यह क्या हो रहा है ? किस देव की पूजा की तैयारी हो रही है ?”
नन्दबाबा ने उत्तर दिया कि, “बेटा , इन्द्र मेघों का स्वामी देवता है , वह वर्षा करता है। हम उसकी मान्यता करते हैं। उसकी पूजा करते हैं। यज्ञ करते हैं। यह हमारी पुरानी रीत है।”

कृष्ण ने नन्दबाबा से कहा, “बाबा, आपने ही तो कहा था कि लोग अपने कर्म का ही फल पाते हैं. यदि लोग कर्म का ही फल पाते हैं, तो इसमें इन्द्रदेवता का क्या अहसान है?
महेन्द्र: किं करिष्यति ?
कर्मैव प्रभुरीश्वर:।
कर्म ही ईश्वर है।
हम इन्द्र का यज्ञ क्यों करें ?

कृष्ण ने कहा कि, “हम वनवासी हैं , हमारे पास तो स्थायी घर भी नहीं है, वन पहाड ही हमारे घर हैं, हम पर्वतराज की पूजा करें, परिक्रमा करें, उनका भोग लगावें और यज्ञ के लिये बनी यह सामग्री गरीबों, दलितों, पतितों और पशुओं को खिलाई जाय. अन्त में हम लोग प्रसाद ग्रहण करें।”

ब्रजवासियों को कृष्ण से प्यार ही इतना था कि उसकी बात घट में तुरन्त उतर गयी। लोग उस सामग्री के साथ गिरिराज का पूजन करने लगे , परिक्रमा की।
बोल गिरिराज-महाराज की जै !
बोल पूछरी के लौठा की जै !!

अब स्वर्ग के देवता को क्रोध आया, “इन अहीरों का इतना दु:साहस ! मेरा यज्ञ बंद करके पर्वत को ही देवता मान लिया !”
उसने प्रलय कर देने वाले बादल भेज दिये। ब्रज को डुबा दो.
ब्रज को गोवर्धन ने शरण दे दी।

अन्त में स्वर्ग का देवता धरती के बेटे से हार गया। इन्द्र, भगवान -कृष्ण की शरण में आया और जो स्तुति की वह भागवत के १० वें स्कन्ध के अध्याय २७ में है।
परोक्ष के स्थान पर प्रत्यक्ष की प्रतिष्ठा. शास्त्र और लोक की अनन्तान्त – प्रक्रिया से संस्कृति का विकास होता है।

Ramswaroop Mantri

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