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फटा पोस्टर… निकला हीरो….!!!

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मनीषसिंह रिबोन

आईसीएचआर, आजादी का “अमृत” महोत्सव मना रहा है। “इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च” ने गहरी रिसर्च के बाद.. गांधी, सुभाष, राजेन्द्र प्रसाद, आम्बेडकर, मालवीय, सावरकर और भगतसिंह की तस्वीरों से नेहरू को छुपाने का फार्मूला तैयार किया है।

ये तस्वीरें .. इनका चयन क्यों किया गया है, जरा सोचिए। पोस्टर में जहां लगाया है, वहीं क्यों लगाया है, समझिये.. डिकोड कीजिए।

सबसे ऊपर गांधी हैं। क्योकि “संघी की मजबूरी हैं, महात्मा गांधी जरूरी है”। “आजादी” लफ्ज के साथ ही, गांधी अपने हत्यारों की छाती पर पैर रखकर, इस चित्रावली में शीर्ष पर आ धमकते हैं।

नो चॉइस!!!

अब आते हैं राजेन्द्र बाबू। कांग्रेस के भीतर “दक्षिणपन्थी” और “ब्राह्मणवादी, सनातनी हिंदुत्व” के पैरोकार। संघी दिमाग मे राजेन्द्र प्रसाद की यही छवि है। फिर नेहरू को मौके बेमौके न्यूट्रलाइज करने वाली फोर्स, राजेन्द्र प्रसाद। जगह दी गयी।

सामने सुभाष। सैनिक वर्दी, फासिज्म और नॉजिजम से कदमताल,
मिलिटेंट सोच को अपने करीब लगती है। लोकतन्त्र के पहले राष्ट्रपति के ठीक सामने… उनके मुकाबले, “अधिनायकवादी” सुभाष नही तो कौन??

तीसरी लाइन में सरदार विराजमान हैं। गुजराती, नेहरू के “,शिकार”
द मैन हूम नेहरू बिट्रेड, उनकी कुर्सी छीन ली न। तो देखिए, अब ये सरकार उन्हें राइटफुल प्लेस दे रही है।

संघ पर प्रतिबंध लगाने वाले, और सावरकर पर गांधी हत्या का मुकदमा चलाने वाले गृह मंत्री, गांधीवादी, आयरन मैन को पेंशनखोर माफिवीर से बस एक पायदान ऊपर रखा गया है। सामने बिठाए गए हैं अम्बेडकर, दलितों के नेता, “गांधी के विरोधी”, बम्पर वोट कैचर ..

चौथी लाइन में नंगई खुलकर आ जाती है। मदनमोहन मालवीय, हिन्दू महासभा के जन्मदाता, गोलवरकर के मेंटर, विश्व के पहले फूल छाप कांग्रेसी, काशी हिन्दू विश्व विद्यालय निर्माण के “क्रेडिट थीफ” !!! क्या ही सुंदर है कि मालवीय के सामने उनके गुप्त सहयोगी, सावरकर विराजमान हैं।

जीतेजी “छुपकर साथ बैठने वालों को” आज “खुलकर पोस्टर में साथ” बिठा दिया गया है। वही मालवीय जिन्हें 2015 याने हिन्दू महासभा के गठन के सौवें साल में भारतरत्न मिला। सामने स्वयं सावरकर, हिंदुत्व के पुरोधा, टू नेशन के प्रतिपादक। इस पोस्टर के कांग्रेसी तारामंडल के बीच चोर दरवाजे से घुसाया गया बेनूर एस्टरॉयड..

और आखरी में, लेकिन ध्यान दें, गांधी के विपरीत एंगल पर भगतंसिंह। हिंसा को श्लाघ्य बनाने की कोशिश, गांधी का विकल्प? पोस्टर कहता है.. संघ के राजमार्ग पर भगत के द्वार से प्रवेश कीजिए।

लेकिन भगत तो हिंसक नही थे। अम्बेडकर, गांधी के दुश्मन नही थे। सरदार तो नेहरू को नेता मान चुके थे। सुभाष तो नेहरू के गाढ़े मित्र थे, गांधी को पूजते थे। वो न फासिस्ट थे, न नाजी। राजेन्द्र प्रसाद सनातनी थे, पर सम्प्रदायिक कतई नही थे।

पर ये नफरती विचारधारा, अपनी संकरी निगाह से उन्हें देखती है। अपने मनपसंद मायने निकालती है। अपने जैसा बताने की कोशिश करती है । और फिर, मौजूदा राजनीतिक बिसात में अपने प्यादों की तरह इनकी तस्वीरें, इस पोस्टर के मनमाफिक खानों में फिट करती है। औऱ पोस्टर छाप देती है।

हिस्टोरिकल रिसर्च…?? माई फुट ..

जो यहां नही है, वो जो खतरा है, वो जिससे दहशत है.. वो जो लोकतन्त्र की नींव इतनी गहरी गाड़ गया, की तमाम ताकत, कैडर, पैसे, तकनीक, गुंडागर्दी मिलकर भी इसे हिला नही पा रही।

नेहरू !!!

संघ को मालूम है कि नेहरू इंसान नही है। वो भारत हैं, उसकी अस्थि, मज्जा, खून और साइकि हैं। जी हां, नेहरू आजाद भारत की तासीर हैं। नर्म, मजबूत, विजनरी, सहिष्णु, धर्मनिरपेक्ष, मध्यमार्गी, प्रेमिल और सहकार के भाव से भरा, यही 70%भारत है।

आज वो 30% मेजारोटेरियन परत के नीचे दबा है, ऊँघ रहा है। पर जब खड़ा हुआ, तो उसके ऊपर खड़ी ये भुसभुसी दीमक की बाम्बी, धराशायी हो जाएगी।

दुविधा की जड़ समझिये, ये लोग नेहरू को आजादी के महोत्सव में खड़ा कैसे करें? सरदार से डर नही, शास्त्री से डर नही, सुभाष, अम्बेडकर, राजेंन्द्र प्रसाद, भगतसिंह से डर नही क्योकि उनकी विरासत अब शक्लों में नही है, वोट बैंक में नही है।

नेहरू की विरासत का वोट बैंक है, उसका एक चेहरा है, वो चैलेंज कर रहा है।

वंशवाद, गुलामी, पप्पू, बारबाला, स्मगलर, विदेशी मूल.. तमाम लांछन के बावजूद !!! कांग्रेस में सुरंगे खोद बमबारी के बावजूद…

पैसे, ताकत, मशीन, प्रचार के बावजूद बाद भी नब्बे साल का कुचक्र 22 करोड़ वोट तक जा पाया है। इधर नेहरू का खून, नेहरू की धारा.. अपनी परम दुर्दशा में भी बारह करोड़ वोट ले जाती है।अब नेहरू जरा सा आजाद किये गए, तो पांच सात करोड़ लोगों को पलटते वक्त न लगेगा। तख्तों ताज पलटते वक्त न लगेगा।

हिस्टोरिकल रिसर्च, इस नतीजे पर आ चुका है। उसने परिणाम दे दिए है। वो पोस्टर की शक्ल में आपके सामने है।

नेहरू जिंदा हैं, वो सर्च किया जा रहा है, उस पर बात हो रही है। वो मेरी आपकी जुबान में बोल रहा है। वो लड़ रहा है इस रेजीम से..

दुख यह है, कि अपने दम पर लड़ते इस नेहरू, को कांग्रेस ने अपने हाल पर छोड़ दिया है। जी हां, नेहरू को इर्रिलेवेंट आज के कांग्रेसमैन बनाते हैं। सबसे बड़ा स्टेट्समैन, गांधी का चयनित उत्तराधिकारी, लोकतन्त्र का निर्माता और पार्टी का सबसे बड़ा फिगर, कांग्रेसियों के जेहन से गायब है।

मूर्ख कांग्रेसी नेहरू की ताकत नही समझते। आम संघी की तरह वे भी अपढ़, कुपढ और नेहरू में अनास्था रखने वाले लोग हैं। वे भी नेहरू को एडविना के आशिक, कश्मीर और चीन के अपराधी, एड्स के मरीज और राहुल के परनाना से ज्यादा नही जानते।

नेहरू से डरने वाले, दरअसल नेहरू को भूल चुके कांग्रेसियों के कारण राहत में हैं। कांग्रेसजनो को चाहिए कि नेहरू को जाने, पढ़ें, समझे और हमारे जेहन में जिंदा, ऊर्जा से भरे नेहरू की उंगली पकड़कर चलें।

हिस्टोरिकल रिसर्च के सरकारी नतीजे सामने है। इससे भी ऊर्जा लीजिए। इसी ऊर्जा से, आखिरकार पोस्टर फटेगा, और इन सितारों के बीच से हमारा सूरज..

… हमारा हीरो निकलेगा।

मनीषसिंह रिबोन

Ramswaroop Mantri

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