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भारत में राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाने का ढोंग बनाम बच्चियों,स्त्रियों और विधवाओं की नारकीय स्थिति

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-निर्मल कुमार शर्मा

बेटों से भी बेटी भली,
क्यों जन्म से पूर्व उसकी बलि..!

हर क्षेत्र में लड़की आगे,
फिर क्यों हम लड़की से भागें।

दुनिया में उसे आने तो दो,
चैन से उसको जीने तो दो…!
करेगी वो भी ऊँचा नाम,
आएगी दुनिया के काम।।

बेटी कुदरत का उपहार,
नहीं करो उसका तिरस्कार..!

जो बेटी को दे पहचान,
माता-पिता वही महान..!
जीने का उसको भी अधिकार,
चाहिए उसे थोड़ा सा प्यार..!

जन्म से पहले न उसे मारो,
कभी तो अपने मन में विचारो..!
शायद वही बन जाए सहारा,
डूबते को मिल जाए किनारा…!

घर-आंगन का शृंगार है बेटियां,
रिश्तों का आधार है बेटियां..!

बेटी नहीं बेटे से कम, भूल जाओ सारे भ्रम..!

कमजोरी बेटी में नहीं, बेटी नंबर वन में है।

बेटी को पढ़ाना है, आगे उसे बढ़ाना है।
हरदम उसका साथ देकर, अतंरिक्ष पहुंचाना है।।

कोमल है, कमजोर नहीं तूं,
शक्ति का नाम ही नारी है…!
जग को जीवन देने वाली,
मौत भी तुझसे हारी है…!

जब घर में संकट आते हैं,
तब बेटियां ही उससे बचाती हैं…!

न अपनी दुनिया स्वंय मिटाओ,
होश में आओ, बेटी बचाओ।

नजरिए को बदलो, नजारे बदल जायेंगे।
बेटियों को मौका दो, बुराई कम नजर आयेंगे..!

       बेटियों पर उक्त मार्मिक और हृदयस्पर्शी  कविता को किसी कवि ने लिखा है,जिसे हम इस लेख की शुरूआत में साभार प्रस्तुत कर रहे हैं ।

   भारतीय धार्मिक समाज में प्राचीनकाल की धार्मिक पुस्तकों में स्त्रियों के लिए बड़ी-बड़ी सम्मानजनक बातें लिखी हुईं है,जैसे, 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता नमस्तयै,नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम : मतलब जिस कुल में नारियों की पूजा, अर्थात सत्कार होता है,उस कुल में दिव्यगुण, दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों कि पूजा मतलब सम्मान नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल है ! माँ के लिए जगज्जननी,शक्ति की प्रतीक दुुर्गा,अन्न की प्रतीक अन्नपूर्णा,विद्या की प्रतीक सरस्वती,घर की लक्ष्मी आदि आदरसूचक शब्द हैं । इसके अतिरिक्त बच्चियों के सम्मान मेें नवरात्रों में हिन्दू समाज में लगभग प्रत्येक घरों में नन्हीं बच्चियों को अभूतपूर्व सम्मानित करने हेतु कन्यापूजन का आयोजन होता है,जिसमें छोटी-छोटी बच्चियों को सम्मान पूर्वक स्वादिष्ट भोजन कराने के साथ ही घर के वयस्क लोग उनके सम्मान में उनके चरणस्पर्श भी करते हैं,उन्हें विभिन्न उपहार भी उन्हें स्नेह पूर्वक दिये जाने की अभूतपूर्व एक अच्छी परंपरा है । गृहस्वामी उन नन्हीं बच्चियों को आदरपूर्वक चरणस्पर्श करके घर से विदा करता है । 

          लेकिन कितने दुःख की बात है कि दूसरी तरफ हिन्दू धर्म के ही कथित सबसे सैद्धांतिक ग्रंथ मनुस्मृति में मनु अपने श्लोक संख्या-2-213 में स्पष्टता से लिखता है कि, 

‘स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम्।अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः॥

(मनु स्मृति 2-213)

        इसका भावार्थ है कि ' “इस दुनिया में पुरुषों को बहकाना महिलाओं का स्वभाव है; उस कारण से, विद्वान कभी भी महिलाओं के साथ बिना संरक्षण के नहीं रहता है। “

        वह आगे लिखता है कि 'सत्रीशूद्रौ नाधीयताम ' 

         इसका भावार्थ है 'स्त्री और शूद्र ज्ञान प्राप्त न करें ! '

         इसी प्रकार कथित ईश्वर द्वारा रचित वेदों में जबकि वास्तविकता यह है कि वेदों को ईसा पूर्व कुछ शताब्दियों पूर्व कुछ बहुत ही धूर्त व शातिर लोगों के समूहों द्वारा इनकी रचना की गई है,में भी स्त्रियों के बारे में बहुत ही बेहूदगी और अमर्यादित बातें भरी पड़ीं हैं,जिनका विस्तृत विवरण देना यहाँ संभव नहीं है ।                

            इसीलिए आज के वर्तमान समय में देश की वर्तमान परिस्थितियाँ एकदम उल्टी दिशा में घूम रही हैं,आज देश की लगभग पचास प्रतिशत आबादी मतलब महिलाएं,उक्तवर्णित उपाधियों और अलंकरणों से सम्मानित औरतों की हालत वास्तव में बहुत ही चिन्ताजनक और जहालतभरी और शर्मनाक स्थिति में हैं । आज जगह-जगह औरतों कोप्रताड़ित,अपमानित,गालीगलौज,अभद्रता, छेडख़ानी,बलात्कर,शोषण, गालीगलौज और निर्मम हत्या तक का सामना करना पड़ रहा है !  

      भारत में औरतों के साथ ये जो समाज में बुराइयाँ व्याप्त हैं,वे अचानक नहीं आ गईं हैं, पिछली सदी तक भारतीय समाज में ऐसी-ऐसी बुराइयां व्याप्त थीं,जिन्हें सुनकर,सोचकर,आज भी शरीर में सिहरन पैदा हो जाती है,उनमें से एक है सती प्रथा,इसमें किसी औरत के पति के किसी वजह से मृत्यु के उपरांत समाज में उसे इतना घृणा का पात्र बना दिया जाता था कि उसे उस समय के धार्मिक ठेकेदारों ने उसके समाधान के लिए अपने पति की चिता के ऊपर बैठकर जीवित ही अग्नि में जलकर मरने की मनुष्यता की सबसे कठोरतम् सजा निर्धारित कर दिए थे !

            इस कुप्रथा में उस विधवा स्त्री की इच्छा,अनिच्छा का उसे कोई विकल्प नही होता था  ! उसे अपने पति के मृत शरीर के साथ उसी की चिता पर जलना बिल्कुल अनिवार्य ही होता था । इसके लिए गाँव से पूरा समूह मय ढोल-नगाड़े के और लाठियों के साथ शवयात्रा में उस विधवा के साथ शमशान घाट पर जाता था । वहाँ चिता सजाने के बाद वह विधवा पूर्ण श्रृंगार करके चिता के ऊपर बैठ जाती थी । अब ढोल, नगाड़े खूब जोर-जोर से बजाकर खूब शोर किया जाता था ।

      अब चिता में आग लगने पर ऊपर बैठी वह मृतक की जिन्दा विधवा स्त्री जब जलने लगती थी ,तब कई बार वह अग्नि से भयाक्रांत होकर, चीखती-चिल्लाती और चिता की आग से कूदकर अपनी जान बचाने के लिए भागने की कोशिश भी करती थी,तो चारों तरफ से चिता को घेरे लाठियों से लैस पुरूषों का घेरा उसे लाठियों से मारकर ,ठेलकर उस जलती चिता में उसे मरने के लिए बाध्य कर देता था,उस असहाय स्त्री की चीखें सुनाई न दें इसलिए ढोल,नगाड़े वाले उन्हें और जोर-जोर से बजाकर उसकी आवाज़ को दबा देते थे !

       अन्त में इस क्रूर और वहशी समाज के राक्षसरूपी पुरूष उस अकेली,अबला,असहाय, रोती- विलखती विधवा स्त्री को जीते - जी जलाकर उसके मृत पति की राख में उसको भी मिला देते थे । इस लोमहर्षक और वीभत्स दृश्य को आज अपनी माँ ,बहन ,बेटी और पत्नी के साथ कल्पना में घटित होने की कल्पना करिये आपका रोम-रोम सिहर जायेगा,हृदय विदीर्ण हो जायेगा !

           आज वह क्रूर प्रथा अँग्रजों के सहयोग से बन्द तो हो गई है,परन्तु भारतीय समाज में बच्चियों और विधवाओं के प्रति संकीर्ण और अमानुषिक विचारधारा अभी भी सर्वत्र व्याप्त है । आज समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत ही दयनीय है । हमारे समझ में ये बात नहीं आती कि इन नन्हीं बच्चियों को माँ-बाप उन्हें इतने प्यार-दुलार से पालपोस कर,प्यार दुलार और स्नेह लुटाकर पालते हैं और हम बड़े होकर उनके प्रति इतने क्रूर और अमानवीय कैसे हो जाते हैं कि पिताजी के देहावसान के बाद हम अपनी उसी प्यारी माँ को जो बचपन के असहाय दिनों में हमें सहारा देकर चलना सिखाया,रात-रात भर जग कर हमारी सेवा करके हमें बड़ा बनाया,खुद को भूखी रखकर हमें सबसे अच्छी चीज खिलाया,न जाने कितना त्याग किया, इसकी कोई सीम नहीं है।

      और हम हैं की उसकी उम्र के अंतिम पड़ाव में ,जीवन के सान्ध्य काल में उस बेसहारा अशक्त माँ को अपने साथ न रखकर काशी,मथुरा के अनाथालयों और वृद्धाश्रमों में डालने जैसा कुकृत्य करने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं । लानत है ऐसे बेटों और पुत्रों पर जो अपनी जन्मदात्री माँ को मथुरा की सड़कों पर भीख माँग कर खाने के लिए और तड़प-तड़प कर जीने वाली अभिषप्त जिन्दगी जीने के लिए मजबूर कर देते हैं ! हमें दुःखद आश्चर्य है ऐसे बेटों पर जो स्वयं अति सम्पन्न जिन्दगी जीते हुए अपनी अशक्त माँ को उनके जीवन के उन दिनों में बेसहारा छोड़ देते हैं,जब उन्हें सबसे ज्यादे सहारे की जरूरत होती है । ऐसे पुत्र न ही हों तो अच्छा,वैसे ऐसे कुपुत्र होना न होना बराबर है । 


-निर्मल कुमार शर्मा, 'गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पाखंड,अंधविश्वास,राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक,वैज्ञानिक,पर्यावरण आदि सभी विषयों पर बेखौफ,निष्पृह और स्वतंत्र रूप से लेखन ', गाजियाबाद, उप्र,संपर्क - 9910629632,ईमेल - nirmalkumarsharma3@gmail.com

Ramswaroop Mantri

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