
ज्योतिषाचार्य पवन कुमार (वाराणसी)
_"यदि आपकी दृष्टि मर्यादा उत्तर में श्रीनगर से दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पश्चिम में कराची से पूर्व में डिब्रूगढ़ तक पहुंचती हो , तो उसके लिए आपके पास हिन्दी को छोड़ और कोई साधन नही है | मैं आपको समझा चुका हूं कि , अंग्रेज़ी हमारी राष्ट्रभाषा नही बन सकती | अंग्रेजी से मुझे नफरत नहीं ; अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों और पश्चिमी विज्ञान के लिए उसकी जरूरत है | लेकिन जब उसे वह स्थान दिया जाता है , जिसके योग्य वह है ही नहीं , तो मुझे दुःख होता है |"_
[ 5 जुलाई 1936 को बंगलौर में हिंदी प्रचार सभा के उपाधि वितरण समारोह के अवसर पर महात्मा गांधी के भाषण का अंश ] आज 2022 है , परंतु 85 वर्षों के बाद भी बापू का दुःख यथावत है| इस दुःख की एक पृष्ठभूमि भी है जिसे जानना बहुत जरूरी है| आखिर क्या कारण है कि हमारे देश की कोई औपचारिक राष्ट्रभाषा नही है|
आज़ादी के इतने वर्षों पूर्व से ही बापू जिस हिंदी / हिंदुस्तानी की वकालत करते दिखाई देते है , आज़ादी मिलने के बाद भी वह बतौर राष्ट्रभाषा स्वीकृत क्यो नहीं हो सकी | आखिर बापू का स्वप्न आज भी अधूरा क्यों है ? ऐसे तमाम प्रश्नों का उत्तर , भारत जैसे महादेश की विविध क्षेत्रीय जातीय भाषायी और धार्मिक अस्मिताओं की इंद्रधनुषी विविधा के स्वीकार में निहित और विहित है |
भारत अनेक राष्ट्रीयताओं और उपराष्ट्रीयताओं का समुच्चय है| कश्मीर , तमिल , गुजराती , असमिया संस्कृतियां एक दूसरे से नितांत भिन्न है| उनका खान पान , बोली भाषा , रहन सहन , तीज त्योहार , वेशभूषा सब अलग अलग है | सांस्कृतिक तौर पर अमृतसर जितना लाहौर के करीब है उतना लखनऊ से नही है , इसी तरह कलकत्ता जितना ढाका से जुड़ा है उतना कोयम्बटूर से नही|
यह भारतीय राष्ट्र का ऐसा यथार्थ है जिसमे एक कॉमन सूत्र ढूंढना जो प्रत्येक भारतीय को एक राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ सके , खासा मुश्किल काम था | एक भाषा के तौर पर हिंदी में ही इतनी ताकत है जो सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में जोड़ सकती है क्योंकि यह इकलौती ऐसी भाषा है जो इस महादेश के पूरे विस्तार में सबसे ज्यादा बोली लिखी और समझी जाती थी|
राष्ट्रभाषा की मान्यता बेशक हिंदी को न मिल सकी परंतु बतौर राजभाषा उसे पूरे भारत वर्ष के लिए अवश्य स्वीकार कर लिया गया|
26 जनवरी 1950 से पूरे भारत मे हिंदी और अहिंदी प्रान्तों में 15 वर्षों के लिए अंग्रेज़ी बतौर सह राजभाषा स्वीकृत हुई|
अंग्रेज़ी इस कारण से कि , स्वतंत्रता से पूर्व वह राजकाज की भाषा थी लिहाज़ा उससे एकदम से सम्बंध विच्छेद असम्भव था | यह भी तय हुआ कि 15 वर्षों बाद यानी 26 जनवरी 1965 से सम्पूर्ण भारत मे अंग्रेज़ी की जगह हिंदी ही राजभाषा हो जाएगी|
ऐसा समझा गया कि तब तक हिंदी सर्वग्राही स्वरूप हासिल कर लेगी परंतु ऐसा नही हो सका| सांस्कृतिक परिवर्तन समय लेते है और लगता है कि 15 वर्ष की अवधि कम पड़ गयी क्योंकि 26 जनवरी 1965 से ठीक एक दिन पहले यानी 25 जनवरी को तमिलनाडु के मदुरै शहर में कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध भाषायी दंगे आरम्भ हो गए|
यह हिंदी विरोधी आंदोलन तेज़ी से पूरे मद्रास प्रान्त में फैल गया. सरकारी आंकड़ों में कोई 70 लोग मरे और हजारों घायल हुए |अंततः यह आंदोलन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के इस आश्वासन पर समाप्त हुआ कि अहिंदी प्रदेशो में अंग्रेज़ी बतौर राजभाषा वहां के निवासियों के प्रसादपर्यंत बनी रहेगी|
1967 में चुनाव के बाद तमिलनाडु में डीएमके सरकार बनी और तब से लेकर आज तक कांग्रेस सत्ता में न आ सकी | चुनाव के परिणाम को अगर जनभवनाओ का अनुवाद समझे तो यह साफ है कि भाषा जन के मन मे कितने गहरे पैठी होती है |
ऐसे ब्यौरों से यह अनुमान सहज ही लग जाता है कि हिंदी की अंतरदेशिक स्वीकार्यता बना पाना कितना मुश्किल काम है| कम से कम इतना तो तय है कि कानून बनाकर और नितांत प्रशासनिक तरीकों से भाषा का प्रश्न हल नहीं हो सकता|
जब तक लोग खुद न आगे बढ़कर किसी भाषा का स्वागत करें तब तक किसी भी भाषा को जुबान नही मिल सकती|
हिंदी के साथ एक और दिक्कत यह थी , कि हिंदी के पास ज्ञान , विज्ञान , तकनीक और राजकाज की शब्दावलियों का भी अभाव था|
इस समस्या से निपटने के लिए पण्डित नेहरू ने दो पारिभाषिक और तकनीकी शब्दो के हिंदीकरण के लिये दो कमेटियां बनाई | पहली कमेटी के अध्यक्ष थे डी एस कोठारी , दूसरी के राम धारी सिंह ” दिनकर ” जिसमें एक सदस्य हरिवंश राय बच्चन भी थे|
बच्चन जी अपनी आत्मकथा के एक खण्ड ” दशद्वार से सोपान तक ” में एक संस्मरण सुनाते है | हुआ यूं कि Customs House Officer का अनुवाद होना था , तो Customs का हुआ सीमाशुल्क , House का हुआ सदन और Officer का अधिकारी | यानी फाइनल अनुवाद हुआ ” सीमा शुल्क सदन अधिकारी “|
सुनते ही दिनकर जी ने कहा कि यह तो चौपाई हो गई | कहने का आशय यह कि अनुवाद की हिंदी मूल शब्द से भी अक्सर कठिन , शब्द बोझिल और अर्थ दुरूह हो जाती| यानी हिंदी के निर्बाध विचरण में उसके पांवों ऐसी भी अलक्षित जंजीरे हुआ करती थी |
कुल मिला कर देखा जाए तो तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद हिंदी का अंतर्देशीय व्यवहार नही हो पा रहा है |
हिंदी के प्रसार में आने वाली समस्याओं और बाधाओं की चर्चा हिंदी प्रचार प्रसार की काफी निराशाजनक छवि प्रस्तुत करती प्रतीत होती है परंतु वस्तुतः यह स्थिति अन्य अनेक कारणों से इतनी निराशाजनक रह नही गई है | आगे इन कारणों की पड़ताल भी होगी| आज़ादी के बाद से ही देश मे हालात निरंतर बदले है , देश मे चतुर्दिक विकास हुआ है और देश के विकास के साथ साथ हिंदी का प्रसार भी काफी संतोषजनक रूप से बढ़ रहा है|
साहित्यकार और गोवा की गवर्नर मृदुला सिन्हा के शब्दों को उधार लेकर कहूँ तो ” हिंदी भारत के माथे की बिंदी ” बनती जा रही है | अब सवाल उठता है कि जो काम तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद मृदु मंद मंद मंथर मंथर चल रहा था तो ऐसा क्या अलग और अतिरिक्त हो रहा था जिसने हिंदी को आज देश भर में कमोवेश स्वीकृत करा लिया है|
तमिलनाडु जो हिंदी विरोध का गढ़ हुआ करता था वहां 1925 से स्थापित दक्षिण भारतीय हिंदी प्रचार सभा न केवल जीवित है बल्कि बहुत बढ़िया काम कर रही है , दक्षिण भारतीय लोगो के लिए हिंदी के कई पाठ्यक्रम चलाती है , उन्हें डिग्री और प्रमाणपत्र देती है | उनकी संस्थाओ में रजिस्ट्रेशन बढ़ता जा रहा है | दक्षिण भारतीय अभिभावक अपने साथ साथ अपने बच्चों को भी हिंदी सिखा रहे हैं |
इस पहेली के हल के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र हमे भारत ही नही सम्पूर्ण विश्व मे अंग्रेज़ी के प्रचार – प्रसार के विश्लेषण में मिल सकता है | यद्यपि अंग्रेज़ी भारतीय समाज के लिए पूरी तरह अजनबी भाषा थी तथापि अंग्रेज़ो के चले जाने के बावजूद आज भी अंग्रेज़ी के प्रभाव से न तो कोई संस्था , न सत्ता और न ही कोई भारतीय मुक्त है|
अंग्रेज़ी भारत की सम्पर्क भाषा और आम भाषा न होते हुए भी सर्वाधिक सशक्त भाषा के तौर पर प्रतिष्ठित है | आखिर क्यों ? हम सब जानते है कि अंग्रेज यहां व्यापारी बन कर आये थे और कालांतर में यहां के शासक बन बैठे | यानी उनके भारत मे होने के दो मूल कारण थे व्यापार और शासन |
व्यापार के लिए अनिवार्य था कि व्यापारी और ग्राहक के बीच सम्प्रेषण की सुविधा के लिए कोई एक भाषा हो जिसे दोनों पक्ष समझ सके | इसके लिए आवश्यक था कि , या तो अंग्रेज हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषा सीखते या भारतीय अंग्रेज़ी सीखते|
अनेक कारणों से सुविधा का संतुलन अंग्रेज़ी के पक्ष में था लिहाज़ा अंग्रेज़ो के बजाय भारतीयों के लिए यह ज्यादा जरूरी हो गया कि वह अंग्रेज़ी सीखते | व्यापार के अलावा अंग्रेज , चूंकि सत्ता में भी थे लिहाज़ा अंग्रेज़ी सत्ता की भाषा भी थी | अपने व्यापारिक हितों के मद्देनजर अंग्रेजों ने भारत के विविध क्षेत्रों में सकारात्मक हस्तक्षेप भी किया|
जैसे वह रेल लेकर आये , डाक तार लेकर आये , रेल और डाक तार प्रशासन के साथ ही उन्होंने राजस्व प्रशासन , न्याय प्रशासन , पुलिस प्रशासन स्थापित किया | दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता बनाई आदि आदि|
इन संहिताओं की भाषा , प्रशासन की भाषा , उसके तकनीकी पद सब अंग्रेज़ी में ही हो सकते थे , सो थे भी |
अंग्रेज़ो के आगमन के समय भारत मे मुग़ल शासन था और मुगल शासन में राजकाज की भाषा फारसी थी जो कालांतर में स्थानीय बोलियों और भाषाओं से मिलकर आसान होती गयी और एक नई भाषा स्थापित हुई जिसे हम उर्दू / हिंदी / हिंदुस्तानी के रूप में जानते है | इसीलिए हमें आज भी कोर्ट कचहरी , थाने की भाषा में फारसी और उर्दू शब्द बहुतायत में मिलते है|
असल में यह एक लम्बा संक्रमण काल था | अंग्रेज़ो के मज़बूत होते जाने के कारण कालांतर में अंग्रेज़ी ने फारसी को रिप्लेस कर दिया | यानी सत्ता प्रतिष्ठान अब अंग्रेज़ी लिखने बोलने लगे थे और उसका अनुवाद उर्दू / फारसी में होने लगा था | एक रोचक तथ्य यह भी बताना दिलचस्प है कि लोक में अत्यंत प्रसिद्घ मुहावरा ” पढ़ें फारसी बेचे तेल ” असल मे फारसी के सत्ता प्रतिष्ठान से निष्क्रमण की ही कथा कहता है |
उपरोक्त तथ्यों के विश्लेषण से यही निष्कर्ष निकलता है कि अंग्रेज़ी के प्रचार प्रसार के पीछे मूलतः उसका सत्ता प्रतिष्ठान की भाषा और व्यापार , रोजगार और आजीविका की भाषा होना था|
इन्ही तथ्यों को यदि हिंदी पर लागू किया जाए तो हमे हिंदी के भी अंतर्देशीय प्रसार की युक्ति मिल सकती है | यदि हिंदी वास्तव में सत्ता प्रतिष्ठान की भाषा बन जाये और सारे सरकारी काम काज अमली तौर पर हिंदी में होने लगे तो यह सरकारी अधिकारियों के साथ साथ आम जन की भी मजबूरी हो जाएगी कि , वह इस भाषा के कामकाजी योग्यता अर्जित करे|
यही कारण है कि हिंदी को बतौर राजभाषा अपनाया गया परंतु विडंबना यह भी है कि हिंदी भाषी क्षेत्रो में भी सरकारी काम काज में हिंदी आज भी उतनी प्रचलित नही है जितना कि इसे होना चाहिए था | अंग्रेज़ी की प्रभुता अब भी कायम है | ऐसे में अहिंदी क्षेत्रो में हिंदी की क्या स्थिति होगी उसे आसानी से समझा जा सकता है |
कुल मिला कर राजभाषा के रूप में हिंदी की प्रतिष्ठा , हिंदी के प्रचार प्रसार में अपेक्षित सफलता न दिला सकी | हिंदी के अंतर्देशीय प्रसार के मुख्य कारक के रूप में आज भी व्यापार और आजीविका ही उभर कर आती है | यही वह कारण है जिसने अंग्रेज़ी को पूरी दुनिया मे प्रसारित किया वही कारण भारत वर्ष में हिंदी पर भी लागू होता है|
कोयम्बतूर और इरोड की कपड़ा फैक्ट्रियां हो या सूरत का साड़ी और हीरा उद्योग , महाराष्ट्र और गुजरात की कंस्ट्रक्शन साइट्स हो पंजाब हरियाणा के खेत , हर जगह हिंदी पट्टी से पलायित मजदूर भारी मात्रा में मिलेंगे | आजीविका की तलाश में हुए इस महापलायन में केवल श्रम का पलायन नही हुआ बल्कि भाषा और संस्कृति का भी अंतरण हुआ |
कोयम्बटूर और तिरुपुर के फैक्ट्री मालिक को अगर गोपालगंज और गोरखपुर के मजदूरों से काम लेना होगा तो उसे हिंदी ही बोलनी पड़ेगी , सूरत की साड़ी की डिजाइनों गुजराती से ज्यादा हरदोई की हिंदी की बुनावट मिलेगी| हैदराबाद और मुम्बई की कंस्ट्रक्शन साइट्स के सुपरवाइजर की मजबूरी है कि वह बाँदा और इलाहाबाद के मजदूरों को उनकी ही भाषा मे निर्देश दे|
इन आप्रवासी मजदूरों ने हिंदी भाषा और संस्कृति का जितना प्रचार प्रसार भारत भर में किया है वह किसी भी सरकारी प्रयास से ज्यादा है | हिंदी जब अहिंदी प्रान्तों में वहां के जन की जरूरत बन गयी वह सहज स्वीकृत होने लगी | यह कड़वा है मगर सत्य है कि आज आजीविका की अपरिहार्यता और रोजगार की चाह भारत भर में हिंदी के प्रचार प्रसार का निर्झर है|
इस निर्झर के केंद्र में हिंदी पट्टी के आप्रवासी मजदूर , सरकारी और प्राइवेट सेक्टर के नौकरी पेशा कर्मचारी , छोटे बड़े उद्यमी आदि है|
हिन्दी की जोत इन्ही के तेल से जल रही और हिंदी भाषा और संस्कृति का प्रकाश सम्पूर्ण भारत वर्ष में फैला रही है |
[चेतना विकास मिशन)





