अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

गहरी है जड़ें किसानों का संघर्ष की….!

Share

रजनीश भारती

दुनिया भर के बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों की गिद्ध दृष्टि किसानों की जमीन पर लगी हुई है और हमारे देश की खूंखार फासीवादी सरकार देशी विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ मिलकर देश के किसानों की जमीन लूटने के लिए तीन काले कानून बना चुकी है जिसके खिलाफ आज पूरे देश का किसान सड़क पर उतर कर संघर्ष कर रहा है।    यह संघर्ष किसानों और विदेशी साम्राज्यवादियों के  बीच जीवन मरण का संघर्ष बन चुका है। दरअसल पूरी दुनिया में समाजवाद और पूंजीवाद के बीच जीवन मरण का युद्ध चल रहा है। दुनियां भर के 80% बाजार पर चीन का समाजवादी उत्पादन बिक रहा है। पूंजीपतियों का माल नहीं बिक पा रहा है। माल नहीं बिक रहा है तो उनके कारखाने भी नहीं चल पा रहे हैं इन पूजीपतियों ने कारखाने से अपनी पूंजी निकालकर उस पूंजी से चीन का सस्ता माल खरीद करके बेचने के लिए शॉपिंग मॉल, बिग बाजार, सुपर मार्केट खोला परंतु ऑनलाइन शॉपिंग ने इसे भी पीट दिया है। कई पूजीपतियों  ने बड़े डिग्री कॉलेज यूनिवर्सिटी बड़े-बड़े अस्पताल खुलवाए मगर नौकरियां ही नहीं मिल रही हैं तो पढ़ाई से मोहभंग होता जा रहा है। अत: इस क्षेत्र में भी पूंजी खप नहीं रही है। अध्र्य किसी क्षेत्र में भी जगह नहीं बन पा रही है।    बाजार में बुरी तरह से हारने के बाद पूंजीपतिवर्ग अपनी दैत्याकार पूंजी को लेकर कहां जाएं उसे सिर्फ किसानों की जमीन दिखाई दे रही है जहां वह अपनी पूंजी खपाकर मेहनतकशों का खून चूस सकें, इसलिए वह भूखे भेड़िए की तरह किसानों की जमीन देख रहा है। वह किसानं की जमीन छीनना चाह रहा है। अब चीन के सस्ते मालों का मुकाबला करने के लिए पूंजीपतिवर्ग समाजवाद तो ला नहीं सकता, वह अपनी कब्र खुद नहीं खोलेगा, यह काम तो जनता ही कर सकती है। मगर जब तक जनता पूंजीपतिवर्ग का तख्ता पलट कर समाजवाद नहीं कायम करेगी तब तक पूंजीपति वर्ग अपना अस्तित्व बचाने के लिए जनता के खिलाफ हमले करता रहेगा। जहां बड़े-बड़े खूंख्वार पूजीपतियों के पास किसानों की जमीन छीनने के अलावा कोई दूसरा उपाय दिख नहीं रहा है। वहीं किसानों के पास अपनी जिंदगी बचाने के लिए अपनी जमीन बचाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं दिख रहा है इसलिए दोनों के बीच  जीवन मरण का युद्ध चल रहा है।    इस जीवन मरण के युद्ध में  “बच्चा-बच्चा झोंक दो ! जमीन का कब्जा रोक दो!” के नारों के साथ किसान अपनी जिंदगी की लड़ाई कर रहा है। इस संघर्ष में जिस तरह से किसान आपसी प्यार मोहब्बत के साथ मिलकर के एकजुट होकर शोषक वर्ग के खिलाफ  लड़ रहे हैं ऐसी मिसाल  बहुत कम ही कहीं देखने को मिलती है
जनवादी किसान सभा के साथी अजय असुर, नंदलाल स्वामी, छात्र नेता ऐनुद्दीन उर्फ रुआब, दानिश, कन्हैया लाल, रामाश्रय, सुनील पंडित, प्रशांत, गुंजा, मालती, त्रिलोकी, बिरजू, संतोष परिवर्तक, कैलाश प्रसाद, प्रशान्त, रामाश्रय, उदयराज शर्मा,आदि लोग 27 को सिंधु बॉर्डर पर पहुंचे तो  क्रांतिकारी किसानों ने वहां  हम लोगों का जमकर स्वागत किया हमने उस विशाल मंच से जनवादी किसान सभा की तरफ से किसानों की आवाज बुलंद किया। 
दूसरे दिन जुलूस निकाल कर हम लोग 16 किलोमीटर दूर चले गये फिर 16 किलोमीटर वापस आए तो यहां पर हमने देखा हर 200 मीटर पर भोजन का लंगर,  हर 50 मीटर पर चाय का लंगर, कहीं-कहीं काजू किसमिस, बादाम मिले हुए दूध का लंगर, कहीं-कहीं इक्का-दुक्का जगहों पर किताबों का भी लंगर, हर 200 मीटर या उससे कम पर बाथरूम और नहाने के लिए गर्म पानी, स्नानागार के पास तेल, साबुन, शैंपू यहां तक की बनियान, जुराब, इनर, तोलिया, चप्पल, जूता आदि का लंगर लगा हुआ था। इन लंगरों में सब कुछ फ्री है, यह फ्री सर्विस तीस किलोमीटर तक फैले धरने में उपस्थित सबके लिए है तो है ही साथ ही साथ तीस किलोमीटर तक सड़क के किनारे रहने वाले सारे गरीबों के लिए उपलब्ध है। हम टिकरी बार्डर और गाजीपुर बार्डर भी गये, कमोवेश ऐसी ही सुविधा में टिकरी और गाजीपुर बार्डर पर हम लोगों ने जाकर देखा।    सिंघू बार्डर पर हमारे सभी साथियों के जुलूस को रोक कर के कुछ किसान कार्यकर्ताओं ने एक-एक कंबल और एक-एक साल हम सबको दिया। हमने जब पूछा कि इन कम्बलों को कहां जमा करना होगा।

तो उन्होंने बताया कि इसे जमा नहीं करना है यह सब आपका हो गया। जब तक यहां रहियेगा इसका इस्तेमाल करिएगा बाद में इसे अपने घर लेकर चले जाइएगा।   यह सब देख कर कोई भी सोच सकता है इतनी सुविधा फ्री में कैसे मिलती हैं कहीं विदेशी फंडिंग तो नहीं, कहीं पूंजीवादी मीडिया का प्रचार सही तो नहीं, मगर सच्चाई तब पता चली जब हमने देखा क्रांतिकारी किसान नेताओं को सहयोग देने के लिए मंच के पास लोगों का तांता लगा रहता। 100 200 1000 2000 4000 4000 10000 न जाने कितने कितने पैसे लोग अपनी इच्छा से लाकर के दे रहे थे। लंगरों के बारे में हमने पता किया तो जाना कि ये अधिकांश लंगर तो गांव की किसान कमेटियों ने लगा रखे थे। संगरूर जिले के एक गांव के जांबाज कार्यकर्ता करनदीप सिंह ने बताया कि उनके गांव में जिसकी आबादी 7000 के आसपास होगी, उन्होंने आधे गांव में ही चंदा इकट्ठा किया था जो 5 लाख रुपए के लगभग था। इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पंजाब हरियाणा, पश्चिमी उ.प्र. के तमाम गांव से किसानों ने लगभग इसी तरह सहयोग करके इतने बड़े आंदोलन को खड़ा किया है जिससे भारत सरकार ही नहीं पूरे दुनिया का पूंजीपति वर्ग कांप रहा है। आज जरूरत है सभी मजदूर पूरी शक्ति के साथ किसानो के आंदोलन में अपना सहयोग करें। सारे छात्रों को अपने हक और अधिकार के लिए किसानो के आंदोलन में अपनी पूरी ताकत झोंक देना चाहिए। संविदा कर्मियों को अपनी मांगों को लेकर के किसान आंदोलन के साथ सुर में सुर मिलाना चाहिए। समाज के जितने भी उत्पीड़ित तबके के लोग हैं सभी लोगों को किसानों के आन्दोलन में शामिल होकर मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ एक आर-पार की जंग छेड़ देनी चाहिए।    आज देश का किसान लड़ रहा है तो मौजूदा शोषक वर्ग की सरकार इस आन्दोलन को खालिस्तानियों, नक्सलवादियों, आतंकवादियों, उग्रवादियो का आंदोलन कह कर बदनाम कर रही है। बदनाम करके बर्बरतापूर्वक दमन करना चाहती है। इसलिए पूरे देश के किसानों को चाहिए शोषक वर्ग की सरकार का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए हर गांव मुख्यालयों, हर जिला मुख्यालयों, तहसील मुख्यालयों, ब्लॉक मुख्यालयों को घेरकर इस जंग को और धारदार बनाएं जिससे यह  जाहिर हो कि यह आन्दोलन पूरे देश के किसानों का है।  ऐसा करने के लिए कम से कम अपने आसपास की सड़कों को, दस-बीस मिनट के लिए ही सही, जाम करके उसे सोशल मीडिया में साझा करें।  आइए अपनी जमीन बचाने के लिए शोषकवर्ग के खिलाफ एक ऐसे जंग का आगाज करके यह दिखा भी दें कि किसान आन्दोलन की जड़ें बहुत गहरी हैं इसे कोई भी फासीवादी सरकार उखाड़ नहीं सकती। 
*रजनीश भारती*                *जनवादी किसान सभा उ. प्र.*

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें