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सत्यकथा : वह पिशाचसिद्ध साधक

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 (डॉ. विकास मानवश्री के संवाद पर आधारित दृष्टांत)

             *~ जूली सचदेवा*

      _काशी के नारद घाट मुहल्ले में एक तन्त्र-साधक रहते थे मेरे कॉलेज जीवनकॉल में, 10 वर्ष पहले। नाम था–गोपालचंद्र न्यायरत्न। उन्होंने पिशाच सिद्ध किया था।_

      हर समय शराब के नशे में आकंठ डूबे रहते थे महाशय। क्यों पीते हैं आप इतनी मदिरा ? पूछने पर बोले–क्या करूँ विकास ! इस प्रकार मदिरा-पान न करूं तो वह महातमोगुणी शक्ति लील जाएगी मुझे। अपार शक्ति है उसके पास।

     मैंने पूछा : कौन है वह ?

      महापिशाच! अपने दोनों हाथों को मलते हुए थोड़े आवेश भरे स्वर में बोले न्यायरत्न महाशय.

     उसके आदेश के पालन में जरा-सी त्रुटि हुई कि बस समझो अपना सर्वस्व नाश। यदि मैं उस समय यह जानता कि मेरी इतनी दुर्गति भी होगी तो कभी भी ऎसी साधना स्वीकार न करता मैं।

      अपनी साधना-कथा उन्होंने बताया :

      मेरे गुरुदेव भयंकर तांत्रिक थे। उनके एक ही शिष्य थे गोपालचंद्र न्यायरत्न (मैं)। अध्यापक थे. साधना में भी रुचि थी। गुरु के प्रत्येक आदेश का पालन करते थे–उसी से फंस गए।

       गुरू ने अपनी जान छुड़ा ली और शिष्य के गले में पड़ गया फांसी का फंदा। दो-तीन वर्षों तक साधनाओं की क्रिया-प्रक्रिया चलती रही और फिर एक रात महाश्मशान के शवासन पर बैठ गए गोपालचंद्र न्यायरत्न महाशय।

      बगल में शराब की बोतल और कुछ तामसिक सामग्री ( जैसे कच्चे मांस के टुकड़े आदि ) रखी हुई थी।

      अर्धरात्रि में मुँह खोलकर चीत्कार कर उठा शव। लपक कर साधक महाशय ने बोतल की शराब उड़ेल दी उसके खुले मुँह में। मांस के कुछ टुकड़े भी डाल दिये। ऐसा कई बार हुआ।

     अन्त में आकाश में पीला-लाल-नीला रंग मिश्रित एक प्रकाश-पुंज प्रकट हुआ और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। अन्त में वह शव के सिरहाने आकर खड़ा हो गया।

      समझते देर न लगी–प्रकाश-पुंज रूप में तमोगुणी राज्य की महाशक्ति पिशाच थी। बाद में वह पिशाच धीरे-धीरे शव में प्रवेश कर गया नेत्रों के द्वारा। तभी से सिद्ध है वह मुझे।

      प्रकृति के राज्य में असम्भव से असम्भव कार्य कर सकता है–अच्छा भी और बुरा भी।

       मैं तो बन्धुवर ! ऊब चुका हूँ। उसे मांस और मदिरा चाहिए। कितना कहाँ से लाऊं ? शरीर भी जर्जर हो चुका है। उसकी अदम्य शक्ति को संभालने की हिम्मत नहीं पड़ती।

      लोग समझते नहीं। मेरे माध्यम से वह पीता है शराब। उसका कहना है कि तमोगुणी राज्य के प्राणियों के लिए तो वारुणी ( शराब ) ही एकमात्र आकर्षण है। पीनी ही पड़ेगी। नहीं पीना था तो आवाहन ही क्यों किया।

       इष्ट मित्र समझते हैं कि मैं घोर शराबी हूँ। कैसे समझाऊं उन्हें कि कौन म्लेच्छ लग गया है पीछे।

      इतना कहकर सामने रखी मदिरा की भरी बोतल उठा ली न्यायरत्न महाशय ने, मुंह से लगाई और गट-गट कर पी गए पूरी मदिरा।

     इससे आप क्या काम ले सकते है?

“किसी को, कभी भी उठवाकर अपने कमरे मे मंगा सकता हूँ. वसीकरण, उच्चातन, मारण, प्रेतबाधा निवारण का काम इससे करवा सकता हूँ. यह मुझे मनचाही जगह पहुंचा सकता है. कैसा भी भोगविलास उपलब्ध करा सकता है. लेकिन ये सब मेरी प्रकृति के विपरीत है. सो आजतक इससे कोई काम नहीं लिया.

     आप सात्विक साधना नहीं किये?

     _”अन्य अप-देवताओं का भी आवाहन किया है मैंने। वे मेरे कहने पर संबंधित मनुष्य की सहायता करते हैं लेकिन वे  मुझसे कोई मांग नहीं रखते. उनकी साधना और सिद्धि अति गोपनीय और रहस्यमयी है।_

    मैं अनुरोध किया : प्रेत से तो भगवान बचाए. बाकी के बारे में कृपया स्पष्ट करें, मुझे जानना है और पाना भी.

   _”स्पष्ट करना अभी उचित नहीं है। समय आने पर बताना क्या, वो सब मैं तुमको सौंप दूंगा. एक परम ध्यान साधिका योगिनी भी है मेरे साथ. तुम दुरूपयोग नहीं करोगे – इतना तो विश्वास है तुम पर.”_

    [चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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