अग्नि आलोक
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इस क़िले ने भी कई सभ्यताओं और शासक वंशों के इतिहास को देखा है, सुना है, जिया है। असीरगढ़ इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसे दक्षिण का प्रवेश द्वार माना जाता था और बिना यह क़िला फ़तह किए दक्षिण का अभियान विफल माना जाता था।

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इस बार के अतीतराग में असीरगढ़ की गाथा।

बारिश का मौसम ख़त्म होने को है और धूप तेज़ होने के पहले हम पहाड़ी के शिखर पर बने असीरगढ़ के क़िले तक पहुंचना चाहते हैं। सड़क के किनारे जहां हम खड़े हैं, उसके बाईं ओर असीरगढ़ का क़िला सिर उठाए खड़ा है और सामने से कुछ चारण स्त्री-पुरुष आ रहे हैं। रंगीन परिधानों वाली स्त्रियां और बड़ी पगड़ी तथा काठियावाड़ी छोटे अंगरखे वाले पुरुष। वे क़िले की तलहटी पर बने ‘आसा’ देवी के मंदिर से आ रहे हैं और शायद आसा के बारे में कुछ गा भी रहे थे। पर उन्हें यह नहीं मालूम कि यह आसा अहीर कौन था, क्या थी उसकी कहानी।

शुरू से शुरू करते हैं…
कहानी उस ज़माने की है, जब मलिक रज़ा फ़ारूक़ी नाम के अधिकारी ने दिल्ली सल्तनत की कमज़ोरी का लाभ उठाकर 1398 ई. में ख़ुद को आज़ाद घोषित कर दिया था। तब असीरगढ़ आसा अहीर के क़ब्ज़े में था। वह बहुत सम्पन्न था और उसके पास अनाज का विशाल भंडार था। मलिक रज़ा फ़ारूक़ी के बढ़ते प्रभाव के कारण असीरगढ़ के स्वामी आसा अहीर ने उसका स्वामित्व स्वीकार कर लिया और कई तरह से उसकी सहायता की। इसके बाद घटनाचक्र तेज़ी से घूमा। मलिक रज़ा का उत्तराधिकारी हुआ उसका बेटा मलिक नासिर फ़ारूक़ी। इसने आसा अहीर से असीरगढ़ छीनने के लिए एक चाल चली। उसने बहाना बनाया कि आसपास के आक्रमणकारियों से उसे ख़तरा है, अतः वह असीरगढ़ के क़िले में अपने परिवार के साथ शरण लेना चाहता है। आसा अहीर ने नासिर ख़ां का निवेदन स्वीकार कर लिया। उसे नासिर ख़ां ने समाचार भेजा कि दो सौ डोलियों में उसका परिवार असीरगढ़ पहुंच रहा है। जब आसा अहीर ने डोलियों के स्वागत के लिए क़िले के दरवाज़े खोले तो पाया कि डोलियों में नासिर फ़ारूक़ी के हथियारबंद सैनिक थे। इन सैनिकों ने थोड़ी ही देर में आसा अहीर और उसके परिवार का काम तमाम कर दिया और क़िले को अपने अधिकार में लेकर उसे अपना मुख्यालय बना लिया। आसा अहीर की इस शहादत को लोक स्मृति ने शायद आसा देवी के रूप में ही जीवित रखा है, जिनका मंदिर असीरगढ़ के क़िले के पास है। इतिहास बताता है कि असीरगढ़ का क़िला युद्ध से नहीं जीता गया, यह विश्वासघात करके ही जीता गया। 1601 में अकबर ने बहादुर ख़ां फ़ारूक़ी के साथ विश्वासघात करके इस पर अधिकार किया और 1722वीं सदी में आसफ़जाह निज़ामुल्मुल्क ने भी ऐसे ही असीरगढ़ पर अधिकार किया। लेकिन यह आगे की कहानी है।

असीरगढ़ की कथा
असीरगढ़ की कहानी नासिर ख़ां और आसा अहीर से भी पुरानी है। नौवीं से बारहवीं शती तक असीरगढ़ में ‘टाक’ नामक राजपूत राजवंश की सत्ता थी। इस वंश के एक शासक ने 1191 में मुहम्मद ग़ौरी के विरुद्ध पृथ्वीराज चौहान का साथ दिया था। शौर्य की यह परम्परा आगे भी असीरगढ़ की सम्पत्ति रही। आगे रावचंद चौहान ने सुल्तान अलाउद्दीन की सेना से लड़कर वीरगति पाई थी। अलाउद्दीन के समय से असीरगढ़ की प्राचीरों पर दिल्ली के सुल्तानों की पताका फहराती रही। जब दिल्ली के तख़्त पर खिलजी सुल्तान जलालुद्दीन था, तब 1296 में सुल्तान के भतीजे अलाउद्दीन को देवगिरि के यादव राजा रामचंद्र से कर वसूल करने के लिए भेजा गया था।
जब अलाउद्दीन खिलजी देवगिरि से लौटा तो उसने असीरगढ़्र पर आक्रमण और उस पर अधिकार करके चौहानों को वहां से खदेड़ दिया। दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के समय असीरगढ़ दिल्ली सल्तनत का अंग हो गया और फ़ारूक़ी वंश की स्थापना तक वह दिल्ली के अधीन ही रहा। फ़िरोज़शाह के समय मलिक रज़ा फ़ारूक़ी खानदेश का सिपहसालार था।

सतपुड़ा का पहरेदार
सतपुड़ा पर्वत की विरल उपत्यकाओं में बुरहानपुर से लगभग तीस किलोमीटर दूर खण्डवा-बुरहानपुर के रास्ते पर एक ऊंची पहाड़ी पर खड़ा है असीरगढ़ का क़िला। मुम्बई की ओर जाने वाली रेल से दाहिनी ओर दूर से ही इस क़िले की मस्जिद की मीनारें दूर से ही दिखती हैं। वह इतिहास-प्रसिद्ध क़िला, जिसे मध्यकाल में दक्खन जाने के रास्ते का पहरेदार माना जाता था और उस पर क़ब्ज़ा किए बग़ैर दक्खन की ओर अभियान करना असम्भव था। मुग़ल सम्राट अकबर के समय का इतिहासकार फ़ैज़ी सरहिंदी इसे न केवल विश्व के आश्चर्यों में से एक मानता है, बल्कि यह भी कहता है कि जिसने इसे देखा नहीं है उसको इसका अनुमान देना असम्भव है। फ़ैज़ी ने इसे 1600 ई. के वसंत में देखा था, जब वह असीरगढ़ पर हुए मुग़ल आक्रमण के समय मुग़ल सेना के साथ आया था। चार सौ साल पहले जो क़िला विश्व के आश्चर्य के समान था, आज गुमनामी के अंधेरे में खड़ा है।

असीरगढ़ और बुरहानपुर
कहानी यों आगे बढ़ती है कि विश्वासघाती नासिर ने असीरगढ़ पर क़ब्ज़ा किया और अपने गुरु के गुरु बुरहानुद्दीन साहब के नाम पर बुरहानपुर शहर बसाया और उसे ही अपनी राजधानी बनाया। बुरहानपुर के पास होने से असीरगढ़ का क़िला जैसे उस शहर के लिए संकटमोचक का काम करता रहा। जब बुरहानपुर पर संकट आए, और ये बहुत आए, तो बुरहानपुर के राजमहल से सुल्तान और शहर के ख़ास लोग असीरगढ़ में आकर शरण लेते रहे। वैसे ही, जैसे मुग़लों के समय खिरकी के लिए दौलताबाद का क़िला था।
चौड़ी सीढ़ियों से होकर हम क़िले की ओर बढ़ रहे हैं। ये चौड़ी सीढ़ियां इसलिए इतनी चौड़ी बनी थीं ताकि घोड़े या हाथी भी उनसे होकर क़िले तक पहुंच सकें। सीढ़ीदार रास्ते से चलना जैसे उस युग से होकर गुज़रना है। पहले मलयगढ़ की चहारदीवारी पर बना प्रवेश द्वार पार करना पड़ता है। यह मज़बूत चहारदीवारी पंद्रहवीं शती के उत्तरार्द्ध में फ़ारूक़ी सुल्तान आदिल ख़ान द्वितीय ने बनवाई थी। यह क़िले की तीन चहारदीवारियों में से सबसे अंतिम और सबसे नीचे बनी है। असीरगढ़ की ख़ासियत यह है कि इसमें एक नहीं तीन चहारदीवारियां हैं। मलयगढ़ उसकी पहली सुरक्षा दीवार है। मलयगढ़ की चहारदीवारी का प्रवेश द्वार पार करके और ऊंचा चढ़ने के बाद कमरगढ़ की चहारदवारी के द्वार को पार करना पड़ता है। इसके बाद ही असीरगढ़ की चहारदीवारी आती है।

क़िले का भीतरी दृश्य
चहारदीवारी के प्रवेशद्वार को पार करके क़िले के सबसे ऊपरी चौरस हिस्से पहंुचा जाता है, जहां हैं कई रिहायशी और प्रशासकीय इमारतों के अवशेष, क़ब्रिस्तान और बहुत कुछ। देखते ही लगता है कि हज़ारों लोगों और विशाल सेनाओं को शरण देने की क़ुव्वत थी इस क़िले में। क़दम आगे बढ़ाते ही नीचे बने तहख़ानों के झरोखे दिखते हैं, शायद संकट के समय शरण लेने के लिए। बाईं और दाईं तरफ़ के खण्डहरों को छोड़ते हुए जब आगे बढ़ते हैं तो असीरगढ़ की सबसे प्रभावशाली इमारत दिखती है, जामा मस्जिद। इस मस्जिद को खानदेश के शासक राजा अली ख़ान ने 1588 में बनवाया था। अरबी और संस्कृत के शिलालेख किसी मस्जिद में होना अजीब-सी बात थी। मस्जिद के एक खम्भे पर अकबर की असीरगढ़ विजय का उल्लेख करने वाला एक फ़ारसी शिलालेख भी है। मस्जिद की मीनारों के भीतर सीढ़ियों पर चढ़कर देखने से क़िले के भीतर का विस्तीर्ण चौरस मैदान और क़िले के नीचे का आसपास का वह इलाक़ा दिखता है, जो सतरा बस्ती कहा जाता था। यहां सत्रह गांव बसे थे, जो क़िले की ज़रूरतें पूरी करते थे।

मुग़लों से राजनैतिक सम्बंध
राजा अली ख़ान ने मुग़ल सम्राट अकबर के साथ मैत्री संबंध मज़बूत करने के लिए अपनी बेटी का विवाह शहज़ादा मुराद के साथ कर दिया और अकबर के अनन्य सहयोगी अबुल फ़ज़ल की बहन से ख़ुद भी विवाह किया। राजा अली ख़ान ने इस मैत्री को निबाहा भी। राजा अली के बेटे बहादुर ख़ान ने मुग़ल बादशाह की अधीनता मंज़ूर नहीं की और फिर असीरगढ़ के क़िले को मुग़ल सेनाओं ने घेर लिया। असीरगढ़ का यह घेरा इतिहास में प्रसिद्ध है। महीनों तक घेरा चलने के बाद भी जब असीरगढ़ अधिकार में नहीं आया तो अकबर ने अबुल फ़ज़ल को असीरगढ़ भेजा और बाद में ख़ुद वहां पहुंचा। असीरगढ़ पर अधिकार मुग़लों के लिए राजनीतिक ज़रूरत थी, क्योंकि असीरगढ़ दक्षिण का प्रवेशद्वार था। आख़िर में बहादुर ख़ान समर्पण कर अकबर की शरण में चला गया।
पर कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। बहादुर ख़ान के समर्पण करने के बावजूद असीरगढ़ के क़िलेदार याकूत ने असीरगढ़ को बचाने की भरसक कोशिश की और राजपरिवार के जो राजकुमार क़िले के भीतर थे, उनसे निवेदन किया कि वे क़िले की रक्षा की ज़िम्मेदारी लें। पर किसी ने साहस नहीं दिखाया। फ़ारूक़ी वंश के राजकुमारों की कायरता से वह निराश होकर उसने ज़हर पीकर जान दे दी। असीरगढ़ में याकूत की बलिदान कथा किसी शिलालेख में अंकित नहीं है, पर उसकी कहानी वहां लगे सभी मुग़ल शिलालेखों से ज़्यादा चमकदार है।
बहादुर ख़ान का क्या हुआ, पता नहीं। पर असीरगढ़ के क़िले के नीचे लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह में एक छोटी तोप रखी है, उस पर बहादुर ख़ान का नाम खुदा है। यह तोप गोवा में बनी थी। उस ज़माने में पुर्तगाली लोग अच्छे तोपची होते थे और फ़ारूक़ी शासकों के तोपख़ाने में गोवा के कई पुर्तगाली अधिकारी नियुक्त थे। इसीलिए जब अकबर ने असीरगढ़ का घेरा डाला तो अपने साथ के एक पुर्तगाली पादरी से आग्रह किया कि वह असीरगढ़ के तोपख़ाने के पुर्तगाली तोपचियों को मुग़लों की ओर करने की कोशिश करे।
मुग़ल काल की कहानी कहने के लिए असीरगढ़ के पास ज़्यादा कुछ है नहीं। अकबर ने असीरगढ़ क़िले के मुख्य प्रवेशद्वार के पास दो शिलालेख और अंकित कराए। एक में उसकी असीरगढ़ विजय का ज़िक्र है और दूसरे में खानदेश का शासन शहज़ादा दानियाल को सौंपने का। फूटा दरवाज़ा में एक शिलालेख फ़ारसी में है, जो कहता है कि जब 1624 ई. में राजकुमार शाहजहां पूर्व की ओर गया तो वह इस क़िले को अपने विश्वस्त राजा गोपाल गौंड को सौंप गया। यह तब की घटना है, जब शाहजहां ने विद्रोह किया था। बाद में शाहजहां ने राजा गोपाल को पांच हज़ारी मनसबदार बना दिया था और मान्धाता के राजा की पदवी दी थी। मान्धाता नर्मदा नदी के किनारे है। गोपाल के बेटे मनोहरदास ने 1653 में क़िलेदारी संभाली थी और दरवाज़ा तामीर कराया था। असीरगढ़ के ऊपरी दरवाज़े में एक शिलालेख शाहजहां के गद्दीनशीन होने के साल का है। उसमें हसन नामक क़िलेदार की तैनाती का ज़िक्र है। इस शिलालेख के पास औरंगज़ेब के समय का एक शिलालेख है, जो कहता है कि औरंगज़ेब बादशाह बना तो अहमद को असीरगढ़ का क़िलेदार नियुक्त किया गया।

अश्वत्थामा का मंदिर
जामा मस्जिद से आगे एक शिव मंदिर है। जनश्रुति है कि यहां अश्वत्थामा शिवजी की पूजा करता था। इसीलिए इसे शिव मंदिर न कहकर अश्वत्थामा का मंदिर कहा जाता है। मौजूदा मंदिर शायद मराठों के समय बना होगा। अश्वत्थामा का यह मंदिर मुझे सदियों पहले ले चलता है और हमें जैसे कुरुक्षेत्र से जोड़ देता है। महापराक्रमी द्रोणाचार्य द्वारा पाण्डवों की सेना का विनाश, उनके अंत के लिए युधिष्ठिर का कथन ‘अश्वत्थामा हतः,’ और उसके बाद धीरे से ‘नरो वा कुंजरो वा’, द्रोणाचार्य का शस्त्र रख देना और फिर धृष्टद्युम्न द्वारा द्रोणाचार्य का सिर काट लिया जाना, तदनंतर द्रोणाचार्य के क्रुद्ध बेटे अश्वत्थामा का संकल्प पाण्डव वंश को समूल नष्ट करने का और ब्रह्मास्त्र का प्रयोग उत्तरा के गर्भ पर। फिर उत्तरा का उसे शाप-विगलित शरीर के साथ अनंत काल तक भटकने का। किंवदंती कहती है कि अश्वत्थामा ने असीरगढ़ में शरण ले ली और आज भी वह यहां-वहां भटकता रहता है।

असीरगढ़ के शासक
शाहजहां के बाद काफ़ी अरसे तक असीरगढ़ की अहमियत कुछ कम रही और फिर यह तब चर्चा में आया, जब मुग़ल बादशाह फ़र्रुख़सियर की हत्या के बाद आसफ़जाह निज़ामुल्मुल्क ने 1720 में विद्रोह किया और दिल्ली से चलकर नर्मदा नदी को पार करके असीरगढ़ के क़िले पर अधिकार कर लिया। जब मराठे ताक़तवर हुए तो 1760 में असीर की कमान पेशवा के हाथ में चली गई। अठारह साल बाद पेशवा ने असीरगढ़ का क़िला सिंधिया को दे दिया। सिंधिया ने इस क़िले का उपयोग पेशवा के प्रभाव को रोकने और होल्करों पर अंकुश रखने में किया। जब भारत पर अंग्रेज़ी सत्ता का प्रसार होने लगा तो वेलेजली की सेना के सामने सिंधिया को झुकना पड़ा और असीरगढ़ पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो गया लेकिन बाद में अंग्रेजों ने असीरगढ़ फिर से सिंधिया को दे दिया। असीरगढ़ में अंग्रेज़ों की छावनी 1904 तक यानी क़रीब अस्सी साल रही थी।

1857 का ग़दर
चार बजते-बजते सितम्बर की वह तीखी धूप एकाएक कम हो गई और देखते-देखते आकाश में काले मेघ घिर आए। जल्द ही वे असीरगढ़ की इमारतों पर उतरते हुए हमारे चेहरों को छूकर उड़ने लगे। उड़ते काले मेघ, रुककर चलती हवा और फिर बारिश की हलकी फुहार। हम पास के खण्डहरों में जा छुपे। ये लाल ईंटों से बने थे। असीरगढ़ में लाल ईंटों की इमारतों के कई खण्डहर हैं, जो अंग्रेज़ों के समय के ही हैं। कुछ बैरक हैं, अस्पताल के खण्डहर हैं और कुछ दूसरी इमारतांे के भी। कारागारों के जो-जो खण्डहर हैं, उनमें से किसी में 1857 में उड़ीसा के क्रांतिवीर सुरेंद्रसाय को बंदी बनाकर रखा गया था। अंग्रेज़ों की यह नीति रही कि विद्रोहियों और पराजित शासकों को उनके इलाक़े से दूर गुमनाम जगह में क़ैद रखा जाए, जिससे उनके ख़ुद के इलाक़े के लोग उन्हें भूल जाएं और उनका जनाधार ख़त्म हो जाए। कितने ही उदाहरण हैं भारत के इतिहास में। पराजित पेशवा बाजीराव द्वितीय को पूना से दूर बिठूर में रखा गया तो बर्मा के राजा को रत्नागिरि में, नेपाल के राणा के परिवार को सागर में। 1842 में बुंदेला विद्रोह के सूरमा हीरापुर के हिरदेशाह को चुनार के क़िले में रखा गया और 1857 के विद्रोहियों में बहादुरशाह ज़फ़र को रंगून में तो सागर ज़िले के शाहगढ़ के महानायक बखतबली को लाहौर में। सुरेंद्रसाय भी इसी नीति के शिकार हुए।
सूरज डूबने को है। मोतीमहल के उस पार पहाड़ी पर बने असीरगढ़ के क़िले पर डूबते सूरज की रक्तिम किरणें जैसे असीरगढ़ के रक्तरंजित इतिहास को आसमान के कैनवास पर उतार देना चाहती हैं। असीरगढ़ के इतिहास की प्रतिध्वनि रह-रहकर गूंजती है और एकबारगी लगता है कि जामा मस्जिद में उकेरी गई संस्कृत की इबारत के साथ असीरगढ़ हमें शाह नोमान का सूफ़ियाना कलाम भी सुनाना चाहता है। असीरगढ़ को यदि आसा अहीर के साथ हुआ विश्वासघात याद है, तो वह क़िलेदार याकूत का बलिदान और गोपालदास की वफ़ादारी भी नहीं भूला है। बादशाह अकबर, शहज़ादा मुराद और अबुल फ़ज़ल की बहन के निकाह की शहनाई के सुरों के साथ ही अकबर की तोपोें की गर्जना भी उसके कानों मेें गूंज रही है। इन सबके साथ असीरगढ़ की समय यात्रा जारी है। ज़माने से कटकर उसकी बेज़ार आंखें आसमान की ओर लगी हैं, क्योंकि अब सिर्फ़ वही उसका चिर-परिचित मित्र है।

असीरगढ़ की तलहटी में
क़िले की तलहटी में सड़क के पास ही मराठों के ज़माने का पत्थरों से बना एक मंदिर है जिसमें दीवट बने हैं। यहां से दो-तीन किलोमीटर दूर है मोतीमहल। गुजराती चारणों के झोपड़ों से होकर मोतीमहल को जाना पड़ता है। दाहिनी ओर पहाड़ी पर असीरगढ़ का क़िला पश्चिम की ओर उतरते सूरज की रोशनी में दमक रहा है। क़िले की तीनों चहारदीवारियां साफ़ नज़र आ रही हैं और जामा मस्जिद की दोनों मीनारें भी। थोड़ा आगे जाने पर सामने मोतीमहल के कुछ ग़ुम्बद दिखते हैं।

Ramswaroop Mantri

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