~ पुष्पा गुप्ता
इस वक्त मल्टीनेशनल कंपनियों में लाखों रुपए के पैकेज पर काम करते युवाओं, कविनुमा जीव और हिंदी की अधिकांश स्त्री लेखक यह कहते हुए पाए जाते हैं कि राजनीति पर हम नहीं लिखते हैं। राजनीति गंदी गली है, इसमें से क्यों गुजरना! मैं चौंकती हूँ, जो चीज आपको इतने गहरे प्रभावित करती है, आप उससे इतने उदासीन कैसे रह सकते हैं?
धीरे-धीरे इन सबके परिवेश को ऑब्जर्व करना शुरू किया तो पाया कि इनमें से अधिकांश भारतीय सामाजिक व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे वर्ग के लोग हैं। ये लोग स्वाभाविक तौर पर सामाजिक प्रतिष्ठा औऱ आर्थिक समृद्धि पाए लोग हैं। इनके जीवन में व्यवस्था जनित असुविधा नहीं हैं।
जाहिर है ये लोग समाज और राजनीति से उदासीन होकर प्रेम, प्रकृति, कथित आधुनिकता, फैशन, पेज थ्री पार्टियाँ, सेलिब्रिटी के जीवन, धर्म, अध्यात्म इन सब पर लिखते हैं। इसी तरह प्रोफेशनल्स के पास जीवन की सारी सुविधाएँ हैं तो उन्हें न देश से काम है, न समाज से औऱ न ही देश के लोगों से। पैकेज से शुरू होकर बड़े पैकेज पर इनकी चिंता खत्म होती है।
नब्बे के दशक की शुरुआत में जब यह जाना कि भारत के आम चुनावों की खबर अमेरिका के अखबारों में पिछले पन्ने के किसी कोने में सिंगल कॉलम में छपती है, तब बहुत दुख हुआ था। प्रश्न उठा कि इतने प्राचीन और महान देश के बारे में अमेरिका में कोई कुछ भी जानता नहीं और जानना चाहता नहीं है।
लगभग उन्हीं दिनों एक औऱ सैडिस्ट ने यह भी बताया कि आम अमेरिकी तो यह भी नहीं जानता है कि इंडिया क्या है? कहाँ है? उस वक्त फिर से ‘गर्व-ग्रंथि’ को ठेस लगी थी। मतलब हम तो अमेरिका के बारे में इतना कुछ जानते हैं, जितना शायद खुद अमरीकी नहीं जानते होंगे। लेकिन एक अमरिकी लोग हैं, हमारे वजूद तक से उदासीन हैं।
समझने के क्रम के शुरूआत में जब कोल्ड वॉर और नॉन-अलायन्मेंट के बारे में जाना तो बचकाना विचार यह था कि जब भारत और भारत जैसे देशों को कम्यूनिज्म-कैपिटलिज्म का खेल नहीं खेलना है तो न्यूट्रल क्यों नहीं रहते हैं? लड़े रूस अमेरिका, हमें क्या करना है?.
बाद में समझ आया कि हम न्यूट्रल नहीं रह सकते हैं, क्योंकि हम भी तो इसमें पार्टी हैं। हमारे और हमारे जैसे देशों के हित दोनों देशों से जुड़े हुए हैं।
एक-दो बार ऐसा हो गया है कि मैसेंजर में कुछ जरूरी मैसेज फिल्टर में पड़े रहे और कई महीनों बाद देखे गए। उसके बाद से मैं हर दो-चार दिन में फिल्टर मैसेज भी देख लिया करती हूँ। ताकि कोई जरूरी मैसेज छूट न जाए। पिछले दिनों एक लंबा मैसेज फिल्टर मैसेज में मिला।
भाई ने मेरी तमाम पोस्ट से असहमति जताते हुए पूछा कि ‘आप खुद को कैसे प्रेजेंट करती हैं, न्यूट्रल या बायस? मैंने आपकी वॉल देखी हैं और आप कतई न्यूट्रल नहीं है।’ यह सवाल अलग-अलग तरह से, अलग-अलग माध्यमों से अलग-अलग लोगों द्वारा अक्सर मुझसे पूछा जाता है। तब जबकि मैं इसका जवाब दे चुकी हूँ।
योगेश ने आठवीं तक पढ़ाई की है। वह बौद्ध है। वह अखबार भी नहीं पढ़ता, टीवी भी नहीं देखता है, लेकिन वह यह जानता है कि चंद्रेशेखर रावण क्या कर रहे हैं औऱ कहाँ कर रहे हैं। उसके डेढ़ साल के बेटे का नाम चंद्रशेखर रावण के नाम पर उसके दोस्तों ने चंद्रशेखर रखा है। मैं सोचती हूँ कि उसे क्यों यह सब जानने की जरूरत है?
उसे इसलिए हर चीज पर नजर रखने की जरूरत है क्योंकि वह पार्टी है। क्योंकि वह बौद्ध है और भारतीय समाज व्यवस्था में दलित है, पीड़ित है औऱ दुनिया में जो भी पीड़ित हैं वे निष्पक्ष या तटस्थ नहीं रह सकते हैं। तटस्थता, निष्पक्षता औऱ उदासिनता एक किस्म का प्रिविलेज है जो हरेक को हासिल नहीं होता है।
इस देश में यदि आप बहुसंख्यक हैं, सवर्ण हैं, आर्थिक रूप से संपन्न हैं, सत्ता के साथ हैं तो आप निष्पक्ष भी रह सकते हैं। तभी आप निष्पक्षता की माँग भी कर सकते हैं, लेकिन यदि आप किसी भी तरह से एक पक्ष हैं तो आप निष्पक्ष होने की लग्जरी नहीं कर सकते हैं। जब आपको सब सहज उपलब्ध हो तो आप तटस्थ रह सकते हैं।
मैं पहले यह देखकर चौंकती थी कि जिस कदर मुस्लिम महिलाएँ सोशल सर्कल में मुखर हैं और बहुत दमखम और साहस के साथ अपना पक्ष रख रही हैं, उतनी तीखी मुखरता अमूमन हिंदू स्त्रियों में दिखाई नहीं देती। बावजूद इसके कि मुस्लिम महिलाएँ लगातार ट्रोल हो रही हैं, किसी न किसी तरह से टारगेट पर रहती हैं, वे कहना नहीं छोड़ रही हैं।
अब लगता है कि जो पीड़ित होगा, वह ज्यादा जोर से बोलेगा, ज्यादा बोलेगा, ज्यादा साहस से बोलेगा। क्योंकि वह पीड़ित है। वह अपनी पीड़ा को कहेगा, उसके कारणों पर बात करेगा, उसके निदान की माँग करेगा। इसलिए इस देश में मुसलमान, दलित, स्त्रियाँ, आदिवासी तटस्थ होने का खतरा नहीं ले सकते हैं।
इसमें भी वही खतरा उठाएँगे, जो सत्ता में हिस्सेदारी कर रहे हैं या फिर सत्ता से लाभ पा रहे हैं।
कुल मिलाकर जो हर तरह की सामाजिक, आर्थिक औऱ राजनीतिक लग्जरी का लुत्फ उठा रहा है वह तटस्थता या निष्पक्षता साध सकता है। जो विरोध में हैं वे डिप्राइव्ड हैं। डिप्राइव्ड तटस्थ होने की लग्जरी नहीं निभा पाएगा। तटस्थता या निष्पक्षता भी एक किस्म का प्रिविलेज ही है।





