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*आज ऐसे अनेक लोग ,जो बुराईयों के संदर्भ में रावण से भी बड़े रावण,इन‍ रावण को कब जलाएंगे?*

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राज वाल्मीकि 

रावण को बुराई का प्रतीक जरूर मान‍ लिया गया है लेकिन आज ऐसे अनेक लोग हैं जो बुराईयों के संदर्भ में रावण से भी बड़े रावण हैं। आज संत महंत तक ऐसे काम कर रहे हैं जो मानवता को शर्मसार करते हैं। ताजा उदाहरण बाबा चैतन्‍यानंद का है जिन पर उनके ही इंस्‍टीट्यूट की लड़कियों के यौन शोषण का आरोप है।

लड़किेयों और महिलाओं से बलात्‍कार करने वाले लोग मानवता पर कलंक हैं।

भ्रष्‍टाचार के रावण का तो कहना ही क्‍या! यह तो देशव्‍यापी है। देश में हुए बडे-बड़े घोटाले इसका प्रमाण हैं।

स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में अस्‍पतालों में कुछ डॉक्‍टरों के रूप में रावण होते हैं जिनके बल पर किडनी रैकेट और नकली दवाईयों का कारोबार चलता है। अपने स्‍वार्थ के लिए मरीजों की जान से खिलवाड़ करते हैं।

जल्‍दी पैसा कमाने की हवस में कुछ मिलावटखोर रावण होते हैं जो दूध, घी, पनीर एवं अन्‍य अनेक खाद्य पदार्थों में मिलावट करते हैं। उपभोक्ताओं की जान जोखिम में डालते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में भी रावणों की कमी नहीं है। ये रावण कंपटेटिव परीक्षाओं के पेपर लीक कर लाखों छात्रों के भविष्‍य से खिलवाड़ करते हैं।

युद्ध करने वाले देश के नेताओं के रूप में रावण हैं जो बेगुनाह लोगों की जान लेते हैंं। उदाहरण के लिए इजराइल द्वारा गाजा में लगभग साठ हजार मासूम बच्‍चों, महिलाओं और पुरुषों की जान ले ली गई। ऐसा नरसंहार करने वालों को रावण की उपाधि भी कम है।

जातिवादी मानसिकता वाले कथित उच्‍च जाति के वे दबंग भी रावण हैं जो दलितों पर अत्‍याचार करते हैं। उनके साथ क्रूरता से पेश आते हॅें। दलित महिलाओं का याैन उत्‍पीड़न करते हैं।

धर्म के नाम पर नफरत फैलाने वाले भी रावण हैं जो धर्मों के नाम पर दंगा करवाते हैं। हिंसा भड़काते हैं। इसमें बेगुनाह लोग मारे जाते हैं।

साइबर ठगी करने वाले ठग रावण हैं जो लोगों का बैंक खाता खाली कर उनके जीवन भर की कमाई लूट लेते हैं। वे नये-नये तरीकों से धोखाधड़ी करते हैं जिससे आम इंसान उनके झांसे में आ जाते हैं। लोगों को डिजिटल अरेस्‍ट कर भी ये लोगों से लाखों-करोड़ों ठग लेते हैं।

धार्मिक अंधविश्‍वासी दुखी लोगों को पंडे पुजारी तांत्रिक भी धार्मिक अनुष्‍ठानों, कर्मकांडों के नाम पर हजारों-लाखों ठगने वाले भी रावण हैं। ये भोले-भाले अंधभक्‍त लोगों के साथ धोखाधड़ी है। धर्म के ये ठेकेेदार लोगों को गुमराह कर अपना उल्‍लू सीधा करते हैं। ऐसे लोगों ने धर्म को धंधा बना लिया है।

प्रश्‍न यह है कि मानवता को शर्मसार करने वाली ये दुष्‍प्रवृतियां आखिर हमारे अंदर पनपती क्‍यों हैं?

भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह सभी को होती है। सभी लक्‍जरियस लाईफ जीना चाहते हैं। इसके लिए चाहिए पर्याप्‍त धन। इसकी अधिकांश लोगों के पास कमी होती है। ईमानदारी और मेहनत से धन कमाने में लंबा समय लगता है। लोगों में इतना धैर्य नहीं होता। इसलिए वे अपनाते हैं – शाॅर्टकट। ये शॉर्टकट ही सब बुराईयों की जड़ है।

आज जमाना इतना फास्‍ट है कि मनुष्‍य में धैर्य का अभाव हो गया है। उनसे इंतजार नहीं होता। उदाहरण के लिए लोगों सरकारी अस्‍पताल में पर्ची बनवाने, किसी डॉक्‍टर को दिखाने के लिए लाइन में खड़े होने का भी धैर्य नहीं होता। वे चाहते हैं उन्‍हें लाइन न लगानी पड़े और उनको पहले पर्ची मिल जाए। डॉक्‍टर उनको पहले देख लें। इसी प्रवृति के कारण भ्रष्‍टाचार पैदा होता है।

हर ऐशो-आराम की एक कीमत होती है। वह कीमत पैसे से चुकाई जाती है। पैसा हर किसी के पास होता नहीं। इसलिए वह पैसा कमाने के लिए गैर-कानूनी तरीके अपनाता है।

मनुष्‍य स्‍वार्थ में इतना अंधा हो जाता है कि उसे अपने सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। उसकी वजह से दूसरों को होने वाले कष्‍ट और नुकसान को भूल जाता है। ऐसे में वह सब कर बैठता है जो उसे नहीं करना चाहिए। उसकी संवेदनशीलता खत्‍म होने लगती है और उसकी जगह संवेदनहीनता ले लेती है।

अच्‍छे संस्‍कार और सद्गुणों की यहां परम आवश्‍यकता होती है।

अच्‍छे संस्‍कारों वाला व्‍यक्ति दुष्‍कर्मों से दूर रहता है। वह दूसरों का नुकसान नहीं चाहता। वह अपने साथ-साथ दूसरों के कल्‍याण की सोचता है। उसके सद्गुण उसे अच्‍छे कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। वह परोपकारी होता है।

मुनष्‍य को अपनी क्षमता के अनुसार अपनी आर्थिक स्थिति सुधारनी चाहिए। जितनी सुधर सकती है उसी में संतुष्‍ट हो जाना चाहिए। उसी के अनुसार अपना रहन-सहन कर लेना चाहिए। अपनी बुनियादी जरूरतों और इच्‍छाओं को सीमित कर लेना चाहिए। इच्‍छाओं का तो वैसे भी कोई अंत नहीं होता। कबीर की उस बात का पालन करना चाहिए कि साईं इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय, मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाय।

यदि हम अनुशासन प्रिय हो जाएं, कर्तव्‍यनिष्‍ठा से अपना जीवन बिताने की ठान लें, दृढ़ संकल्‍पी और दृढ़ इच्‍छाशक्ति के मालिक हो जाएं तो हमारे अंदर की दुष्‍प्रवृतियां खुद दम तोड़ने लगेंगी।

हम अपने सद्गुणों से दुर्गुणों पर विजय पा लेंगे। हम अपने सत्‍कर्मों, पुण्‍यकर्मों से पापी प्रवृतियों को जीत लेंगे। तब हमारा चरित्र निश्‍छल और निष्‍कपट हो जाएगा। लोभ-लालच, ईर्ष्‍या-द्वेष आदि दुर्गुणों से मुक्‍त हो जाऐंगे।

तब इन बुराईयों का रावण हमारी अच्‍छाइयों की आग में जलकर भस्‍म हो जाएगा। पर क्‍या हम ऐसा कर पाएंगे?

Ramswaroop Mantri

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