– तेजपाल सिंह ‘तेज’
प्रस्तावना : लोकतंत्र का मौन संकट
भारत में लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं है; यह एक विश्वास है — जनता की भागीदारी, असहमति की स्वतंत्रता, और सत्ता के प्रति जवाबदेही का विश्वास। परंतु आज, जब हम 2025 के भारत की ओर देखते हैं, तो यह प्रश्न गूँजता है — क्या यह विश्वास जीवित है, या बस दिखावे में साँस ले रहा है? 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था, तब प्रेस की आज़ादी छिन गई, विपक्ष जेल में ठूँस दिया गया और नागरिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। उस दौर में जनता को कम-से-कम यह पता था कि देश में “आपातकाल” है। किंतु आज का संकट अलग है — यह घोषित नहीं, बल्कि महसूस किया जा रहा है। यह लेख इसी “अघोषित आपातकाल” की पड़ताल है — जहाँ लोकतंत्र के चार स्तंभ धीरे-धीरे भीतर से खोखले होते जा रहे हैं; जहाँ सत्ता की छाया सूचना, कला, संस्थानों, और नागरिकों की स्वतंत्रता तक फैल चुकी है।
1. सूचना पर नियंत्रण: जब मीडिया दर्पण नहीं, मुखपत्र बन जाए
लोकतंत्र की आत्मा है — स्वतंत्र प्रेस । पर आज भारतीय मीडिया का बड़ा हिस्सा सरकार के प्रवक्ता की तरह व्यवहार करता दिखता है। टीवी चैनलों की शाम की बहसें, जो पहले सत्ता से सवाल पूछने का मंच होती थीं, अब “विपक्ष पर प्रहार” और “राष्ट्रभक्ति बनाम देशद्रोह” की रंगमंच बन चुकी हैं। नोटबंदी, जीएसटी, या कोविड-19 जैसे राष्ट्रीय संकटों के समय, अधिकांश मीडिया ने जाँच-पड़ताल की बजाय “सरकार के मास्टरस्ट्रोक” के नारे दोहराए।
जब श्मशान घाटों पर जलती चिताओं की तस्वीरें दैनिक भास्कर ने दिखाई, तब उसके दफ़्तरों
पर छापे पड़े।
जब बीबीसी ने 2002 के दंगों पर डॉक्यूमेंट्री चलाई, उसके दफ़्तरों पर आयकर छापे पड़े। न्यूज़क्लिक के पत्रकारों को गिरफ़्तार किया गया क्योंकि उन्होंने कॉर्पोरेट – सत्ता गठजोड़ पर रिपोर्टिंग की थी। लिखित सेंसरशिप नहीं है, पर माहौल ऐसा है कि पत्रकार स्वयं- सरशिप करने लगे हैं — “क्या यह लाइन छापना सुरक्षित होगा?” यह वही डर है जो 1975 में “प्रेस इनक्वायरी” के नोटिस से आता था, अब “इनकम टैक्स नोटिस” या “आईटी एक्ट” से आता है। आज मीडिया दो हिस्सों में बँटा है — एक, जो सत्ता की बोली बोलता है; दूसरा, जो बोलने की कोशिश करता है और उसके बदले छापा, मुकदमा, या ट्रोल-सेना का शिकार बनता है। इस प्रकार का मीडिया नियंत्रण — अघोषित आपातकाल का पहला संकेत है।
2. कला, सिनेमा और संस्कृति: प्रचार की नई प्रयोगशाला:
कला किसी समाज की आत्मा होती है। पर जब कला को प्रचार का औजार बना दिया जाए, तब आत्मा पर सत्ता की छाया पड़ती है। पिछले कुछ वर्षों में सिनेमा और वेब सीरीज़ का परिदृश्य एकतरफा हुआ है। द कश्मीर फाइल्स, द केरल स्टोरी, आर्टिकल 370, द साबरमती रिपोर्ट, स्वातंत्र्यवीर सावरकर, पीएम नरेंद्र मोदी, मैं अटल हूँ — इन फिल्मों का पैटर्न स्पष्ट है–
एक विचारधारा का महिमामंडन और असहमति का दमन। इनमें से कई फिल्मों को भाजपा शासित राज्यों में टैक्स-फ्री किया गया, नेताओं ने स्वयं ट्वीट कर इन्हें “देखने की अपील” की।
प्रधानमंत्री तक ने इन्हें “सत्य उजागर करने वाली” फ़िल्में कहा।
वहीं, जो फिल्में सवाल उठाती हैं — जैसे पंजाब 95 या एल2एम पूरन — उनके सैकड़ों सीन काट दिए जाते हैं। फिल्मों में अब “2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने” जैसे राजनीतिक संदेश जोड़े जाते हैं — यानी कहानी से पहले प्रचार आता है। यह नया “कलात्मक आपातकाल” है — जहाँ सृजन स्वतंत्र नहीं, नियंत्रित है। 1975 में सरकार ने फिल्मों के प्रिंट जलाए थे, आज डिजिटल सेंसरशिप उसी काम को सलीके से कर रही है।
3. संस्थाओं पर नियंत्रण: जब संविधान के प्रहरी वफादार बन जाएँ
लोकतंत्र की रीढ़ हैं — संवैधानिक संस्थाएँ। पर जब वही संस्थाएँ सत्ता की छत्रछाया में आने लगें, तो संविधान कमजोर हो जाता है। ईडी और सीबीआई आज राजनीतिक औज़ार बन चुकी हैं। संजय मिश्रा जैसे अधिकारियों के कार्यकाल को बार-बार बढ़ाया गया ताकि सत्ता के अनुकूल वातावरण बना रहे। कानून बदलकर इन एजेंसियों के निदेशकों की नियुक्ति और कार्यकाल पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण हो गया।
· चुनाव आयोग, जिसे लोकतंत्र का सबसे पवित्र प्रहरी कहा जाता है, अब सत्ता की पसंद से संचालित होता दिखता है। पहले मुख्य न्यायाधीश भी चयन समिति का हिस्सा होते थे, अब उन्हें हटा दिया गया है। परिणाम यह हुआ कि प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री की बहुमत वाली समिति “ज्ञानेश कुमार” जैसे विवादित नामों को प्रमुख बना देती है — विपक्ष की आपत्ति दर्ज होकर रह जाती है।
· सूचना आयोग का भी यही हाल है। अब सरकार तय करती है कि आयुक्त कितना वेतन पाएँगे, कितने समय तक पद पर रहेंगे। जो जितना झुकेगा, उतना टिकेगा। यह वही स्थिति है जिसे डॉ. आंबेडकर ने लोकतंत्र के लिए “सबसे बड़ा ख़तरा” बताया था — जब संविधान तो रहे, पर उसकी आत्मा मर जाए।
4. राजनीतिक विरोध का दमन: विपक्षी होना अपराध क्यों बन गया?
लोकतंत्र विपक्ष से ही जीवित रहता है। पर आज विपक्षी दल और उनके नेता निरंतर अभियोजन, गिरफ्तारी या राजनीतिक तोड़फोड़ के निशाने पर हैं। राहुल गांधी को “मोदी उपनाम” टिप्पणी के लिए संसद से निष्कासित कर दिया गया। अरविंद केजरीवाल को शराब नीति मामले में जेल भेजा गया, महीनों बाद विशेष ज़मानत मिली। हेमंत सोरेन को ज़मीन घोटाले के नाम पर गिरफ्तार किया गया। विपक्ष-शासित राज्यों में विधायकों को तोड़कर सरकारें गिरा दी गईं — ऑपरेशन लोटस लोकतंत्र का नया शब्द बन गया। वहीं, भाजपा में शामिल होते ही नेताओं के सारे केस गायब हो जाते हैं — जैसे अजित पवार या सुवेंदु अधिकारी। यह दोहरी व्यवस्था दिखाती है कि क़ानून नहीं, वफादारी ही न्याय का पैमाना बन चुकी है। 1975 में विपक्ष को जेलों में डालकर चुप कराया गया था, आज उन्हें केसों, एजेंसियों और मीडिया ट्रायल से चुप कराया जा रहा है।
5. नागरिक अधिकारों का हनन: जनता की आवाज़ पर पहरा:
अघोषित आपातकाल का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि जनता धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्रता खो देती है, और उसे इसका एहसास भी नहीं होता। आज सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करना जोखिम भरा काम है। आईटी एक्ट, यूएपीए, और राजद्रोह कानून के तहत दर्जनों कार्यकर्ता जेल में हैं। उमर खालिद पाँच वर्षों से बिना मुकदमे के बंद हैं। फेसबुक, यूट्यूब और एक्स (ट्विटर) से सरकार द्वारा “आपत्तिजनक” कंटेंट हटाने के आदेश रोज़ जारी होते हैं।
इंटरनेट बंद करना अब एक सामान्य प्रशासनिक उपाय बन चुका है — कश्मीर, मणिपुर और यहाँ तक कि किसान आंदोलनों के दौरान भी। धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत जीवन पर भी राज्य का नियंत्रण बढ़ रहा है — कभी हिजाब पर पाबंदी, कभी बीफ बैन, कभी धार्मिक जुलूसों पर हिंसा।इन सबके बीच संविधान का अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) अब बस कानूनी पन्नों में बचे हैं।
6. जनता की भूमिका: जब डर सामान्य हो जाए:
लोकतंत्र केवल सरकार की नहीं, जनता की भी ज़िम्मेदारी है। पर जब डर इतना गहरा बैठ जाए कि लोग बोलने से डरें, ट्वीट हटाएँ, या चुपचाप सहें — तब सत्ता जीत जाती है।
1975 में जनता ने इंदिरा गांधी को 1977 में हटा दिया था। पर आज का नियंत्रण कहीं अधिक सूक्ष्म है — मीडिया, सोशल मीडिया, सिनेमा, विज्ञापन, और राष्ट्रवाद के नारों के ज़रिए।
सत्ता ने विरोध को अपराध और मौन को देशभक्ति बना दिया
लोकतंत्र का अगला अध्याय:
भारत का लोकतंत्र अभी मरा नहीं है — पर बीमार ज़रूर है। यह बीमारी बाहरी नहीं, आंतरिक है — सत्ता का अहंकार, जनता की उदासीनता, और संस्थाओं का पतन। सवाल यह नहीं है कि सरकार ने आपातकाल घोषित किया या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसी स्थिति में हैं जहाँ इसकी घोषणा की ज़रूरत ही नहीं रह गई — क्योंकि हम पहले ही उसकी स्थिति में जी रहे हैं? अगर सूचना नियंत्रित हो, कला प्रचार का औजार बन जाए, संस्थाएँ वफादार हों, विपक्ष जेल में हो, और जनता डरी हुई — तो यह किसी कानून से कम नहीं, एक अघोषित आपातकाल ही है। लोकतंत्र को बचाने के लिए ज़रूरी है कि हम उसे सिर्फ़ वोट देने का अधिकार न समझें, बल्कि विचार करने की जिम्मेदारी मानें। क्योंकि लोकतंत्र का अंत तब नहीं होता जब कोई तानाशाह सत्ता में आता है — बल्कि तब होता है, जब नागरिकों को यह लगने लगे कि कुछ बदल नहीं सकता।(https://youtu.be/X1IJ24AkKFE?si=iIyFHbKforFXAU5T)
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