अग्नि आलोक
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अपराजित

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मुझे दीवाना न समझना
मुझे इश्क का
परवाना न समझना ,
मैं रहता हूं
अक्सर ह्रदय में तुम्हारे
मुझे आवारगी का
किनारा न समझना।

मुझे बेगाना मत समझना
मुझे अपना भी
मत समझना
मैं रहता हूं
अक्सर ख़ुदा की आवारगी में
मुझे यूँ ही
बेचारा मत समझना।

मुझे हारा हुआ मत समझना
मुझे पराजय का
सितारा मत समझना
मैं रहता हूं
अक्सर बड़ी जीत की तलाश में
मुझे यूँ दुनिया से हारा
मानव न समझना।

डॉ.राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)
(हिंदी अध्यापक)
पता-गांव जनयानकड़
पिन कोड -176038
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
rajivdogra1@gmail.com

Ramswaroop Mantri

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