
जयराम शुक्ला
हर साल 20 जून की तारीख मुझे एक महामानव का स्मरण दिलाती है। यह तारीख सरकारी कलेंडरों में नहीं मिलेगी। यह तो लाखों-लाख विंध्यवासियों के ह्रदय के पंचाग में दर्ज है। उस महामानव का नाम है यमुना प्रसाद शास्त्री।
जो प्रशस्ति आईंस्टीन ने महात्मा गाँधी के लिए व्यक्त की थी हूबहू वही शास्त्री जी में चरितार्थ होती है- “आने वाली पीढ़ी शायद ही इस बात पर यकीन करे कि भारत में हाड़-मांस का ऐसा भी कोई सख्स था, जिसकी अहिंसक हुंकार से सत्ताएं हिल जाया करती थी।”
आज जब करोना की विपदा में पढ़े लिखे युवा और श्रमिक रोजगार की तलाश में मारे मारे फिर रहे हैं। शास्त्री जी ऐसे मौके पर जमीन आसमान एक कर चुके होते..और आखिरी व्यक्ति की व्यवस्था होने तक अन्न जल त्याग चुके होते।
गांधी के बाद सत्याग्रह की ताकत को शास्त्री जी ने परिभाषित किया। उन्होंने भले ही आठ बाई आठ की कोठरी में सारी उम्र काटी हो लेकिन उनका विचार वैश्विक था। अपनी झोपड़ी का नाम ही उन्होंने “वसुधैव कुटुम्बकम” रखा था।
चीन की हरकतों पर वे आज किसी भी नेता से ज्यादा मुखर होते। नेपाल के सत्ताधीशों को भारत विरोध पर कड़ी नसीहत दे रहे होते। और बताते कि जिस भारत के साथ उनका रोटी-बेटी का संबंध है चीन के कहने पर उस भारत से रिश्ता तोड़ने पर कुछ हाँसिल होने वाला नहीं।
कम लोगों को पता होगा कि 75 में नेपाल में लगी इमरजेंसी के दरम्यान गिरजा प्रसाद कोयराला परिवार ने शास्त्री जी के गाँव सूरा(रीवा) में आश्रय लिया हुआ था। प्रकाश कोयराला महीनों सूरा में ही भूमगत रहे।
शास्त्रीजी अमेरिका में एक अस्वेतों की हत्या और नस्लीय घटनाओं पर चुप नहीं बैठते, वे इस घटना पर पद्मधर पार्क में अनशनरत होते।
शास्त्री जी के लिए सच्चे अर्थों में ही विश्व एक परिवार की भाँति था। जैसे रीवा जिले का जड़कुड़, सरगुजा का झगराखाँड़, वैसे ही लतीन अमेरिका और अफ्रीका के देश।
सार्वजनिक जीवन में अजीब सी विचार शून्यता छाई है..। आज के नेताओं के बरक्स आने वाली पीढ़ी जब शास्त्रीजी के बारे में सुनेगी तो उसे कोरी गप्पकथा लगेगी। क्योंकि वह देख रही है कि अब मंत्रिमंडल में जगह पाना लाटरी के खुल जाने जैसी भाग्यशाली घटना है।
शास्त्रीजी ऐसे पद ठेंगे पर रखते थे। 67 में मध्यप्रदेश के संविद सरकार में व 89 में चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में उन्हें मंत्री बनने के अवसर मिले थे..। लेकिन शास्त्रीजी कुर्ता झाड़कर पतली गली से किन्हीं शोषितों के उदय की लड़ाई लड़ने निकल लिए।
शास्त्रीजी शोषितोदय नाम का अखबार निकालते थे जिसके वे संपादक, प्रकाशक सभी कुछ थे। सार्वजनिक जीवन को इतनी व्यापक समग्रता के साथ जीने वाले शास्त्रीजी विरले व्यक्ति थे। वे राजनीति की अंंधी कोठरी में ताउम्र रोशनदान बनकर उजाला फैलाते रहे।
शास्त्रीजी के व्यक्तित्व व कृतित्व को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता। कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के तमाम घपलों घोटालों के बावजूद जिन अच्छे कामों के लिए जाना जाएगा, उन सभी को शास्त्रीजी ने पार्लियामेंट में बहुत पहले ही अशासकीय संकल्पों के जरिए प्रस्तुत कर चुके थे।
राइट टु इनफारमेशन, राइड टू फूड, राइट टू वर्क, राइट टु एजुकेशन, इन सबकी मौलिक अवधारणा शास्त्री जी की ही थी। शास्त्रीजी 77 में लोकसभा के लिए चुने गए। यह दुनिया के लिए बड़ी खबर थी। एक रंक ने राजा को हरा दिया।
उनकी नेत्रहीनता को लेकर भी तमाम चर्चाएं होती रहीं। अच्छी भी और बुरी भी। लेकिन मेरे जैसे बहुत से लोग कल भी मानते थे और आज भी याद करते हैं कि शास्त्री जी जैसी दिव्य दृष्टि सभी राजनेताओं को मिले।
शास्त्री जी लोकतांत्रिक समाजवाद के पक्षधर रहे। आचार्य नरेन्द्र देव के वे सच्चे अनुयायी या यों कहें सच्चे उत्तराधिकारी थे। उन्हें सत्ता सुख के दो मौके आए। 77 में और फिर 89 में।
77 में तो वे प्रदेश की सत्ता की राजनीति के नियंता ही थे। जैसे चाहा वैसे प्रदेश की सरकार चली। पहली बार विधायक बने उनके कई साथी अनुयायी केबिनेट में पहुंचे, पर शास्त्रीजी स्वयं सत्ता से निर्लिप्त रहे। यहां तक कि उन्होंने विधायक व सांसद को मिलने वाली पेंशन भी त्याग दी थी।
विधायक व सांसदों की तनख्वाह,सुविधाएं बढ़ाने का उन्होंने हर बार विरोध किया..। वे कहते थे- लोकतांत्रिक देश में गरीब जनता के चुने हुए प्रतिनिधि को राजे-रजवाड़े जैसा नहीं रहना चाहिए। जैसे देश का आखिरी व्यक्ति अभावों में जीता है वैसे ही निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी जीने की आदत डालनी चाहिए।
चंद्रशेखर, मधु लिमए, दण्डवते, रामकृष्ण हेगड़े और सुरेन्द्र मोहन उन नेताओं में थे जिनके प्रति शास्त्री के हृदय में अपार सम्मान था। वे लोग भी शास्त्री से असीम स्नेह रखते थे।
दलितों-पीड़ितों और आदिवासियों के लिए आन्दोलन का कोई न कोई मुद्दा वे ढूंढ ही लेते थे। आन्दोलन का समापन शास्त्री जी के अनशन के साथ होता था।
एक बार सुरेन्द्र मोहन जी ने कहा-शास्त्रीजी, बायपास हो चुकी है, एसीटोन जाने लगता है, अब तो अपनी देह का ख्याल रखते हुए ये ‘वार्षिक कार्यक्रम’ न किया करिए।
शास्त्री जी उस वक्त तो चुप रहे और संतरे का जूस पीकर अनशन त्याग दिया। बाद में मैने सुरेन्द्र मोहन जी की नसीहत का ध्यान दिलाया तो लगभग डाटते हुए बोले -मेरे अनशन से अगर पांच भूखे परिवारों तक इमदाद पहुंच जाती है और उनका चूल्हा जलता है तो ऐसा अनशन साल में एक बार नहीं, कई-कई बार करूंगा। मैने कब चिन्ता की कि कोई मेरा अनशन तुड़वाने आए।
दरअसल शासन-प्रशासन शास्त्री जी के अनशन की घोषणा के साथ ही सक्रिय हो जाता था और हर पंचायतों तक राशन और मजूरों के लिए काम के इस्टीमेट बनने शुरु हो जाते थे।
शास्त्री जी बेबसों, निर्धनों और मुसीबत जदा लोगों के लिए स्वमेव एक राहत थे। राजनीति में गांधी के बाद शास्त्री ही ऐसे दुर्लभ हठयोगी थे कि उन्होंने जो ठान लिया सो ठान लिया। इस बात की कतई चिंता नहीं कि साथ में कितने लोग चल रहे हैं।
झगराखाड़ कोयलरी के मजदूरों के लिए उन्होंने ‘दिल्ली’ मार्च किया। पैदल ही सरगुजा से दिल्ली की ओर चल पड़े। रास्ते में केन्द्र सरकार का दूत पत्र के साथ पहुंचा कि मांगे मान ली गईं।
अस्वस्थता के बावजूद आखिरी दिनों में सिंगरौली से भोपाल के लिए कूंच कर दिया। मुद्दा था सिंगरौली के एक गरीब परिवार के साथ दबंगों का अत्याचार।
आज नेताओं के साथ वक्त गुजारने वाले टहलुए देखते ही अरबपति बन जाते हैं, इसके उलट शास्त्री जी का कबीराना अन्दाजा था ‘जो घर फूके आपना, चले हमारे साथ’ घर फूंककर शास्त्री जी का हाथ पकड़ने वालों की कभी कमी नहीं रही।
शास्त्रीजी जनता जनार्दन के कुशलक्षेम की खातिर हमेशा खुद के लिए कष्ट का अआह्वान करते थे। सच्चे अर्थों में वे हुतात्मा थे। न वे कभी मौत से डरे और न देंह से मोह पाला। उनका सर्वस्व मातृभूमि और मानवता के लिए अर्पित था। शास्त्री जी की स्मृतियों को नमन।





