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क्या है वसीयत, क्यों है जरूरी

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वसीयत या विल (Will) एक कानूनी दस्तावेज है जो बताता है कि कोई अपनी मौत के बाद अपनी संपत्ति को कैसे और किनमें बांटना चाहता है। वह वसीयत के जरिए किसी एक ही व्यक्ति को संपत्ति का अधिकार दे सकता है या फिर एक से अधिक लोगों को। अगर कोई शख्स चाहता है कि उसकी मौत के बाद उसकी संपत्ति कुछ चुनिंदा लोगों को ही मिले तो इसके लिए वसीयत जरूरी है। बिना वसीयत किए मौत की स्थिति में संपत्ति का बंटवारा उत्तराधिकार कानूनों के तहत होगा। यह उत्तराधिकारियों के बीच तनाव, अदावत, मुकदमेबाजी समेत तमाम जटिलताओं से भरा हो सकता है। ‘हक की बात’ सीरीज में आइए जानते हैं वसीयत क्या है, क्यों जरूरी है, वसीयत के तहत किस तरह की संपत्ति का उत्तराधिकार किसी को सौंपा जा सकता है, क्या परिवार से बाहर के किसी शख्स के नाम वसीयत की जा सकती है, बिना वसीयत किए मौत की स्थिति में संपत्ति पर किसका हक होगा वगैरह। इसके अलावा वसीयत से जुड़े मामलों में कुछ बड़े अदालती फैसलों पर भी नजर डालते हैं।

वसीयत क्या है?
सबसे पहले जानते हैं कि वसीयत क्या है। वसीयत किसी शख्स को मौत के बाद अपनी विरासत सही हाथों में छोड़कर जाने की सहूलियत देता है। वसीयत एक कानूनी दस्तावेज है जो बताता है कि किसी शख्स की मौत के बाद उसकी संपत्ति कैसे और किनमें बांटी जाए और अगर कोई नाबालिग बच्चा है तो उसकी देखभाल कैसे होगा। वैसे जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति मौत से पहले अपनी वसीयत लिखी ही हो। अगर किसी ने अपनी वसीयत लिखी है तो उसकी संपत्ति का बंटवारा उसकी इच्छा के हिसाब से ही होगा। लेकिन अगर उसने वसीयत नहीं की हो तो संपत्ति का बंटवारा उत्तराधिकार कानूनों के तहत होगा। अगर शख्स ईसाई, यहूदी या पारसी है तो भारतीय उत्तराधिकार कानून के तहत संपत्ति का बंटवारा होगा। अगर शख्स हिंदू, सिख, जैन या बौद्ध है तो हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 के तहत संपत्ति का बंटवारा होगा। इसी तरह अगर वह मुस्लिम हो तो मुस्लिम पर्सनल लॉ के हिसाब से उसकी संपत्ति का बंटवारा होगा।

वसीयत कैसे लिखी जाती है?
कोई भी स्वस्थ दिमाग का वयस्क वसीयत लिख सकता है। इसके लिए कानूनी और तकनीकी भाषा की जरूरत नहीं है। वह चाहे तो अपने ही शब्दों में वसीयत लिख सकता है। अगर वसीयतनामा में वसीयतकर्ता की मंशा साफ और स्पष्ट लग रही है तो व्याकरण की अशुद्धता भी मायने नहीं रखती। वसीयत लिखने से पहले व्यक्ति को अपनी संपत्तियों जैसे जमीन, अचल संपत्ति, बैंक जमा, शेयर, जीवन बीमा, सोना या अन्य निवेश वगैरह की लिस्ट बना लेनी चाहिए। उसके बाद उसे लाभार्थियों को तय करना चाहिए कि वह अपनी संपत्ति किसे या किन-किन लोगों को देना चाहता है। इसके बाद दो ऐसे गवाहों को चुनना चाहिए जो वसीयत में लाभार्थी न हों। इसके बाद निष्पादक नियुक्त करें। वसीयत का मसौदा तैयार करने के लिए किसी वकील की सेवाएं भी ले सकते हैं। ए-4 साइज के पेपर पर वसीयत को हाथ से लिखें या टाइप करें। वसीयतनामे पर वसीयतकर्ता का और दो गवाहों के हस्ताक्षर होंगे। दस्तखत के वक्त दोनों गवाहों का शारीरिक रूप से एक साथ उपस्थित होना जरूरी है। जरूरत पड़ने पर गवाहों को अदालत में गवाही के लिए बुलाया जा सकता है। भारत में वसीयत का रजिस्टर्ड कराना जरूरी नहीं है लेकिन इसका रजिस्ट्रेशन बेहतर होगा। वसीयत में लिखे गए हर शब्द को वसीयतकर्ता का ही शब्द माना जाता है। आप चाहे तो दूसरी, तीसरी या चौथी विल भी बना सकते हैं। लेकिन तब आपको पिछली सभी वसीयतों को रद्द कर देना चाहिए। अलग-अलग समय के वसीयत में जो सबसे हालिया हो, वह मान्य होगी।

कौन लिख सकता है वसीयत, क्यों लिखना ठीक है
अब समझते हैं कि वसीयत कौन लिख सकता है। कोई भी व्यक्ति जो बालिग हो, स्वस्थ दिमाग का हो तो वह अपना वसीयत लिख सकता है। बहरा और गूंगा शख्स भी लिखित में या साइन लैंग्वेज के हाव-भाव के जरिए अपनी सहमति दिखाकर वसीयत लिख सकता है। वसीयत को लेकर भारतीयों में उतनी जागरूकता नहीं है जितनी होनी चाहिए। अगर किसी शख्स ने वसीयत लिखी है तो उसकी संपत्ति उसकी इच्छानुसार ही बंटेंगी लेकिन अगर बिना वसीयत लिखे ही शख्स की मौत हो जाए तो जीवित रिश्तेदारों के सामने विकट समस्या खड़ी हो सकती है। उन्हें गैरजरूरी चिंता और तनाव, कानूनी झमेले, मुकदमेबाजी, कानूनी दांव-पेच वगैरह से जूझना पड़ सकता है। इन सबमें समय भी लगेगा और पैसे भी खर्च होंगे। इसलिए अच्छी तरह लिखी गई वसीयत वारिसों के बीच किसी भी तरह के टकराव की आशंका को खत्म करती है। बैंक जमाओं को लेकर बहुत से लोगों में ये भ्रम भी होता है कि उन्होंने नॉमिनी का नाम तो डाला ही है। जबकि नॉमिनी का मतलब उत्तराधिकारी नहीं होता। नॉमिनी किसी संपत्ति का अंतिम लाभार्थी नहीं होता वह सिर्फ संपत्ति का ट्रस्टी या केयरटेकर होता है। यानी व्यक्ति की मौत के बाद नॉमिनी उसकी बैंक जमाओं या निवेश का मालिक नहीं बल्कि केयरटेकर होता है। इसलिए भी वसीयत लिखना समझदारी की बात है।

किस तरह की संपत्ति के लिए लिख सकते हैं वसीयत
अब सवाल उठता है कि कोई शख्स किस तरह की संपत्ति का वसीयत लिख सकता है। इसका जवाब है- सारी संपत्ति जिस पर उसका मालिकाना हक है। यानी वह सिर्फ अपनी संपत्ति को ही वसीयत के जरिए हस्तांतरित कर सकता है। स्वअर्जित संपत्तियों के लिए वसीयत लिखी जा सकती है। अगर वसीयतकर्ता ने अपनी कमाई से कोई संपत्ति खरीदी है या उसे कोई संपत्ति उपहार में मिली हो या किसी वसीयत के जरिए मिली हो तो वह इन संपत्तियों के लिए वसीयत लिख सकता है। कोई शख्स पैतृक संपत्ति के बंटवारे के बाद मिली अपने हिस्से की संपत्ति के लिए भी वसीयत लिख सकता है। लेकिन अगर किसी संपत्ति पर वसीयतकर्ता का अधिकार नहीं है और उसने वसीयत में उसका भी जिक्र किया है तो ऐसी संपत्ति पर वसीयत अमान्य होगी। इसी तरह अगर किसी शख्स ने वसीयत के जरिए जिस व्यक्ति को अपनी संपत्ति देना चाहता है, उसी की मौत हो जाए तो वसीयत अमान्य हो जाती है। इसलिए वसीयत में कोशिश करनी चाहिए कि संपत्ति के उत्तराधिकारी में एक से ज्यादा का नाम दें। उसे ऐसे लिखा जा सकता है- मेरे गुजर जाने के बाद संपत्ति फलां के नाम की जाय और यदि फलां भी न रहे तो संपत्ति अमुक व्यक्ति को दी जाए।

मुस्लिम शख्स अपनी कुल संपत्ति के एक तिहाई से ज्यादा का नहीं कर सकता वसीयत
वसीयत को लेकर इस्लामिक कानून में एक बहुत ही सख्त नियम है। इस नियम के हिसाब से कोई मुस्लिम शख्स अपनी कुल संपत्ति का अधिक से अधिक एक तिहाई के लिए ही किसी के पक्ष में वसीयत लिख सकता है। अगर वह अपनी संपत्ति के एक तिहाई से ज्यादा के लिए वसीयत लिखना चाहता है तो उसे अपने सभी कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति लेनी होगी।

क्या किसी के भी नाम वसीयत की जा सकती है या रिश्तेदार होना जरूरी
क्या कोई शख्स अपनी स्वअर्जित संपत्ति का किसी अजनबी के पक्ष में वसीयत कर सकता है? इसका जवाब है- हां। अप्रैल 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने सरोजा अम्माल बनाम दीनदयालन व अन्य के मामले में ये महत्वपूर्ण फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर वसीयत वैध तरीके से की गई है तो यह मायने नहीं रखता कि महिला मृत व्यक्ति की पत्नी है या नहीं। कोर्ट ने ये स्पष्ट किया कि कोई शख्स स्वअर्जित संपत्ति को जिसे चाहे उसे दे सकता है, भले ही वह अजनबी ही क्यों न हो। हिंदू उत्तराधिकार कानून में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है कि कोई शख्स अपनी संपत्ति का किसके पक्ष में वसीयत करे।

बिना वसीयत लिखे शख्स की मौत तो स्वअर्जित संपत्ति पर भतीजे नहीं, बेटी का हक
सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी 2022 को अपने एक ऐतिहासिक फैसले में पिता की संपत्ति पर बेटी के अधिकार की व्यवस्था की। जस्टिस अब्दुल नजीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच ने स्पष्ट किया कि बिना वसीयत के मृत हिंदू पुरुष की बेटियां पिता की स्व-अर्जित और अन्य संपत्ति पाने की हकदार होंगी और उन्हें परिवार के अन्य सदस्यों की अपेक्षा वरीयता होगी। दरअसल, इस मामले में बिना वसीयत लिखे ही शख्स की मौत हुई थी। मृत शख्स का कोई बेटा नहीं था। उसकी इकलौती बेटी थी। उसकी मौत के बाद उसकी संपत्ति पर उसकी बेटी (उत्तराधिकार के आधार पर) के साथ-साथ भतीजों (उत्तरजीविता के आधार पर) ने भी दावा किया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बेटी को संपत्ति का हकदार बताया। कोर्ट का यह फैसला मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर अपील पर आया है जो हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत हिंदू महिलाओं और विधवाओं को संपत्ति अधिकारों से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा कि बिना वसीयत के मृत हिंदू पुरुष की बेटियां पिता की स्व-अर्जित और अन्य संपत्ति पाने की हकदार होंगी और उन्हें परिवार के अन्य सदस्यों की मुकाबले वरीयता होगी।

जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच ने कहा कि हिंदू पुरुष ने वसीयत नहीं बनाई हो और उसकी मृत्यु हो जाए तो उसे विरासत में प्राप्त संपत्ति और खुद की अर्जित संपत्ति, दोनों में उसके बेटों और बेटियों को बराबर का हक होगा। कोर्ट ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मिताक्षरा कानून में सहभागिता और उत्तरजीविता की अवधारणा के तहत हिंदू पुरुष की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति का बंटवारा सिर्फ पुत्रों में होगा और अगर पुत्र नहीं हो तो संयुक्त परिवार के पुरुषों के बीच होगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि उसका यह आदेश उन बेटियों के लिए भी लागू होगा जिनके पिता की मृत्यु 1956 से पहले हो गई है। दरअसल, 1956 में ही हिंदू पर्सनल लॉ के तहत हिंदू उत्तराधिकार कानून बना था जिसके तहत हिंदू परिवारों में संपत्तियों के बंटवारे का कानूनी ढंग-ढांचा तैयार हुआ था। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से 1956 से पहले संपत्ति के बंटवारे को लेकर उन विवादों को हवा मिल सकती है जिनमें पिता की संपत्ति में बेटियों को हिस्सेदारी नहीं दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एक और स्थिति स्पष्ट की है। बेंच ने अपने 51 पन्नों के आदेश में इस सवाल का भी जवाब दिया कि अगर पिता बिना वसीयतनामे के मर जाएं तो संपत्ति की उत्तराधिकारी बेटी अपने आप हो जाएगी या फिर उत्तरजीविता की अवधारणा के तहत उसके चचेरे भाई को यह अधिकार प्राप्त होगा।

ससुराल के घर से लेकर संपत्ति तक…बहुओं के पास कैसे अधिकार

सभ्यता का विकास क्रम अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। नई खोजों, नई तकनीकों, नई परिस्थितियों…यानी बदलते हुए दौर के साथ नियम-कायदे भी अपडेट होते रहते हैं। संहिताएं भी नए दौर की जरूरत के हिसाब में बदली जाती हैं तो कानून भी। मानव इतिहास ने ‘समूह में रहने वाले जानवर’ की अराजकता के दौर से नियम-कायदे, कानूनों के सभ्यता वाले दौर से आधुनिक सभ्यता के दौर तक की यात्रा की है। अधिकार, उनकी मान्यता और उनका संरक्षण सभ्यता के बुनियाद हैं। लिंग के आधार पर अधिकारों में भेदभाव समानता के सिद्धांत के खिलाफ हैं। स्पष्ट नियम-कानूनों के बावजूद महिलाओं के साथ भेदभाव समाज की कड़वी हकीकत है। इसकी एक बड़ी वजह अधिकारों को लेकर जागरुकता का अभाव है। अगर आप अधिकारों को लेकर सजग और जागरुक हैं तो भेदभाव को खत्म कर सकते हैं। अधिकारों की कड़ी में आइए जानते हैं कि एक बहू के ससुराल की संपत्ति में क्या-क्या हक हैं। साथ में जानते हैं अदालतों के ऐतिहासिक फैसले जो बहुओं के हक को परिभाषित करने में मील के पत्थर साबित हुए हैं। यहां हम आपको हक की बात (Haq ki Baat) बताएंगे।

संपत्ति को लेकर बहू के अधिकार
सबसे पहले देखते हैं संपत्ति को लेकर बहू के अधिकार पर कानून क्या कहते हैं।

स्त्रीधन
हिंदू लॉ के हिसाब से स्त्रीधन पर बहू का स्वामित्व होता है। यहां यह जानना जरूरी है कि स्त्रीधन के दायरे में क्या-क्या आता है। दरअसल, विवाह से जुड़े रिवाजों, समारोहों के दौरान महिला को जो कुछ भी मिलता है, चाहे वो चल-अचल संपत्ति हो या कोई और गिफ्ट, उस पर महिला का ही अधिकार होता है। यानी सगाई, गोदभराई, बारात, मुंह दिखाई या बच्चों के जन्म पर मिले नेग (गिफ्ट) स्त्रीधन के तहत आएंगे। स्त्रीधन पर महिला का ही स्वामित्व होता है भले ही वह धन पति या सास-ससुर की कस्टडी में हो। अगर किसी सास के पास अपने बहू का मिला स्त्रीधन है और बिना किसी वसीयत के उसकी मृत्यु हो गई तो उस धन पर बहू का ही कानूनी अधिकार है न कि बेटे या परिवार के किसी अन्य सदस्य का उस पर कोई हक बनता है।

स्त्रीधन पर महिला के स्वामित्व का अधिकार ऐसा है कि उसे कोई भी नहीं छीन सकता। यहां तक कि अगर वह पति से अलग भी हो जाए तो स्त्रीधन पर उसी का अधिकार होगा। अगर किसी विवाहित महिला को उसके स्त्रीधन से वंचित किया जाता है तो ये घरेलू हिंसा के बराबर होगा जिसके लिए पति और ससुराल वालों को आपराधिक मामले का सामना करना पड़ेगा।

गरिमा और आत्मसम्मान के साथ जीने का अधिकार
एक विवाहित महिला को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। वह अपने पति जैसे ही लाइफ स्टाइल की हकदार है। गरिमा के साथ जीने के अधिकार का मतलब है कि वह मानसिक या शारीरिक यातनाओं से मुक्त हो। अगर ऐसा नहीं हो रहा तो वो घरेलू हिंसा के दायरे में आएगा।

ससुराल के घर पर अधिकार
महिला जिस घर को अपने पति के साथ साझा करती है, वह ससुराल का घर कहा जाता है। ये घर चाहे रेंट पर लिया गया हो, आधिकारिक तौर पर उपलब्ध कराया गया हो या पति के स्वामित्व वाला हो या फिर रिश्तेदारों के स्वामित्व वाला, महिला के लिए वह ससुराल वाला घर यानी मैट्रिमोनियल होम है।

हिंदू अडॉप्शंस ऐंड मैंटिनेंस ऐक्ट, 1956 (हिंदू दत्तक और भरण-पोषण कानून) के तहत हिंदू पत्नी को अपने मैट्रिमोनियल घर में रहने का अधिकार है भले उसके पास उसका स्वामित्व न हो। भले ही वह एक पैतृक घर हो, जॉइंट फैमिली वाला हो, स्वअर्जित हो या फिर किराए का ही घर क्यों न हो। हालांकि, अगर ससुराल वालों की स्व-अर्जित संपत्ति है तो उनकी सहमति के बिना विवाहित महिला उसमें नहीं रह सकती क्योंकि इस संपत्ति को शेयर्ड प्रॉपर्टी यानी साझा संपत्ति के तौर पर नहीं लिया जा सकता है।

साफ है कि महिला को अपने मैट्रिमोनियल होम में रहने का अधिकार है लेकिन ये हक तभी तक है जबतक उसके पति के साथ वैवाहिक संबंध बने रहते हैं। हालांकि, पति से अलग होने के बाद भी पत्नी उसके लाइफस्टाइल के हिसाब से जीने के लिए भरण-पोषण की अधिकारी है। पति से पैदा हुई संतानों पर भी ये लागू होता है। वैवाहिक रिश्तों में खटास के बावजूद पति अपनी पत्नी और बच्चों के रहने, खाने, कपड़े, पढ़ाई-लिखाई, इलाज वगैरह की जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकता। उसे इसके लिए भरण-पोषण देना होता है।

साझे के घर पर महिला के अधिकार पर ऐतिहासिक फैसले

अक्टूबर 2020, सुप्रीम कोर्ट : बहू को साझे के घर में रहने का अधिकार

साझे के घर में बहू को रहने का अधिकार है या नहीं, इसे लेकर दिसंबर 2006 में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने फैसला दिया था। तरुणा बत्रा केस में जस्टिस एस. बी. सिन्हा और मार्कंडेय काटजू की बेंच ने कहा था कि एक पत्नी के पास केवल अपने पति की संपत्ति पर अधिकार होता है, वह साझे के घर में रहने के अधिकार का दावा नहीं कर सकती। हालांकि, अक्टूबर 2020 में जस्टिस अशोक भूषण की अगुआई वाली तीन जजों की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 2006 के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा की शिकार महिला को ससुराल के साझे घर में रहने का कानूनी अधिकार है।

मई 2022 : सुप्रीम कोर्ट ने ‘साझे के घर’ का दायरा बढ़ाया
इसी साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने साझे वाले घर यानी शेयर्ड हाउसहोल्ड की व्याख्या करते हुए महिला के उसमें रहने के अधिकार पर ऐतिहासिक फैसला दिया।

फैसले में शीर्ष अदालत ने ‘साझे के घर में रहने के अधिकार’ की व्यापक व्याख्या की जो इससे जुड़े मामलों में नजीर साबित होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में डोमेस्टिक ऐक्ट के तहत ‘शेयर्ड हाउसहोल्ड’ यानी ‘साझे वाले घर’ में क्या-क्या आएंगे, इसकी व्याख्या की। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिला के पास साझे वाले घर में रहने का अधिकार है। वह महिला चाहे जिस भी धर्म से ताल्लुक रखती हो, वह चाहे मां हो, बेटी हो, बहन हो, पत्नी हो, सास हो, बहू हो या फिर घरेलू रिश्ते के तहत आने वाली किसी भी श्रेणी से ताल्लुक रखती हो, उसे साझे वाले घर में रहने का अधिकार है। उसे उस घर से नहीं निकाला जा सकता।

जस्टिस एम. आर. शाह और जस्टिस बी. वी. नागरत्ना की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अगर कोई महिला शादी के बाद पढ़ाई, रोजगार, नौकरी या अन्य किसी वाजिब वजह से पति के साथ किसी दूसरी जगह पर रहने का फैसला करती है तब भी साझे वाले घर में उसके रहने का अधिकार बना रहेगा। इस तरह अगर महिला अपने पति के साथ किसी दूसरे शहर में रह रही है तो उसे अपने पति के घर में रहने का पूरा अधिकार तो है ही, दूसरे शहर या जगह के साझे वाले घर में भी रहने का अधिकार है। डोमेस्टिक वॉयलेंस ऐक्ट का सेक्शन 17 (1) उसे ये अधिकार देता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में उदाहरण देते हुए कहा, ‘कोई महिला शादी के बाद नौकरी या रोजगार के सिलसिले में अपने पति के साथ विदेश भी जाना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में शादी के बाद महिला के पास साझे वाले घर में रहने का मौका नहीं मिलेगा। अगर किसी वजह से उसे विदेश से लौटना पड़ा तो उसके पास अपने पति के साझे वाले घर में रहने का अधिकार होगा। भले ही उस घर पर उसके पति या उसके पति का स्वामित्व न हो। ऐसी स्थिति में सास-ससुर महिला को साझे घर से बाहर नहीं निकाल सकते।’

पति की मौत हो गई तो…
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस महीने हिंदू विधवा के भरण-पोषण मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि हिंदू विधवा अपनी आय या अन्य संपत्ति से जीवन जीने में असमर्थ है तो वह अपने ससुर से भरण-पोषण का दावा कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि पति की मौत के बाद ससुर अपनी बहू को घर से निकाल देता है या महिला अलग रहती है तो वह कानूनी रूप से भरण-पोषण का हकदार होगी। यहां तक कि अगर हिंदू विधवा अगर दूसरी शादी की कर लेती है तो उसे अपने पहले पति की संपत्ति पर पूरा अधिकार होगा। इस बारे में कर्नाटक हाई कोर्ट ने फैसला दिया था कि विधवा के दोबारा शादी करने से उसके मृत पति की संपत्ति पर अधिकार खत्म नहीं जाता। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के तहत जब बिना वसीयत किए किसी विधवा की मृत्यु हो जाती है तो ऐसी स्थिति में बेटे और बेटी समेत उसके वारिस या अवैध संबंधों से जन्मी संतान भी उसकी पैतृक संपत्ति में हिस्सेदार होती है। यह फैसला गुजरात हाईकोर्ट ने इस साल जून में सुनाया था। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के तहत, एक हिंदू विधवा को अपने दूसरे पति से जमीन विरासत में मिल सकती है। साथ ही पहली शादी से पैदा हुए उसके बच्चे भी दूसरे पति की जमीन के वारिस हो सकते हैं।

बहू को ‘साझे के घर में रहने का अधिकार’ कब नहीं होगा लागू
अदालतों ने समय-समय पर ‘साझे के घर में रहने के अधिकार’ को लेकर अपवाद भी स्पष्ट किए हैं कि किस तरह के मामलों में ये लागू नहीं होगा।

बहू प्रताड़ित करे तो अपने घर से निकाल सकते हैं सास-ससुर
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2022 में घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में आदेश दिया कि अगर बुजुर्ग सास-ससुर को बहू प्रताड़ित करती है तो वे घर खाली करा सकते हैं। दरअसल, बुजुर्ग माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों को भरण-पोषण और संरक्षण के लिए बने द मैंटिनेंस ऐंड वेल्फेयर ऑफ पैरेंट्स ऐंड सीनियर सिटिजंस ऐक्ट, 2007 के तहत एक बुजुर्ग ने अपनी बहू के खिलाफ सताने और प्रताड़ित करने की शिकायत की थी। बुजुर्ग ने बहू को अपने घर से बाहर निकालने की मांग की थी। इस मामले में एसडीएम ने बुजुर्ग के पक्ष में फैसला देते हुए बहू को 30 दिन के भीतर घर खाली करने का आदेश दिया। इस आदेश के खिलाफ बहू हाई कोर्ट गई। हाई कोर्ट से भी उसे राहत नहीं मिली तो सुप्रीम कोर्ट पहुंची लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ किया कि बहू को ससुर का घर खाली करना पड़ेगा। जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस अभय एस. ओका की बेंच ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल बहू की याचिका पर 24 जनवरी को फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ससुर ने ये प्रस्ताव दिया कि चाहे तो उसकी बहू दूसरे फ्लैट में रह सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रस्ताव को बेहतर बताते हुए आदेश दिया कि बहू अपनी बेटी के साथ दूसरे फ्लैट में रहेगी और सास-ससुर की जिंदगी में दखल नहीं देगी। इतना ही नहीं, जिस फ्लैट में बहू रहेगी, उस पर किसी तीसरे पक्ष के लिए कोई कानूनी अधिकार भी सृजित नहीं करेगी।

सास-ससुर के साथ दुर्व्यवहार करने वाली महिला को उनके घर में रहने का हक नहीं : दिल्ली हाई कोर्ट
मार्च 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बुजुर्ग सास-ससुर के साथ दुर्व्यवहार करने वाली महिला को उनके घर में रहने का अधिकार नहीं है। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में सास-ससुर बहू को घर खाली करने के लिए कह सकते हैं क्योंकि उन्हें सुकून से जीने का अधिकार है। दरअसल, घरेलू हिंसा के मामले में ट्रायल कोर्ट ने आदेश दिया था कि महिला अपने मैट्रिमोनिय हाउस में नहीं रह सकती। महिला ने उसे हाई कोर्ट में चुनौती दी। दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि इस मामले में महिला के सास-ससुर बुजुर्ग हैं और उन्हें सुकून के साथ रहने का अधिकार है। उनके बेटे और बहू के बीच वैवाहिक विवाद की वजह से उनका सुकून नहीं छीना जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने महिला को राहत देते हुए ससुर से ये हलफनामा भी भरवाया कि जबतक उसके बेटे के साथ महिला की शादी मान्य है तबतक उसके रहने के लिए उन्हें कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी।

Ramswaroop Mantri

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