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*आख़िर ‘जय भीम’ में क्या है

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आर डी आनन्द

बहुचर्चित फिल्म “जय भीम” के निर्देशक टी. जे. ज्ञानवेल, एडवोकेट चंद्रू के रूप में सूर्या, सेंगगेनी के पति राजकन्नू के रूप में के. मणिकंदन, सेंगगेनी के रूप में लीजो मोल जोस, इंस्पेक्टर जनरल पेरुमलसामी के रूप में प्रकाश राज, एडवोकेट जनरल एस राममोहन के रूप में रमेश राव, अध्यापिका मिथरा के रूप में रजीशा विजयन और अल्ली (बेटी) के रूप में बेबी जोशिका माया हैं। “जय भीम” फ़िल्म इरुलुर आदिवासी समुदाय के एक जोड़े सेंगगेनी और राजकन्नू की कहानी है। फ़िल्म शुरू होते ही सीधे अपने विषय पर आती है। किसी और (ज़मीन के मालिक) के खेत में चूहा पकड़ते हुए एक दलित जोड़ा रोमैंटिक होता है और जब रात में दोनों रोमांस की मुद्रा में आते हैं तो झूठे ख्वाबों का ताशमहल दिखाती ज़्यादातर भारतीय सिनेमा की तरह कोरस के पार्श्वनृत्य के साथ कोई रोमांटिक गाना नहीं शुरू होता बल्कि बारिश की वजह से उनकी झोपड़ी से पानी रिसने लगता है और मिट्टी की एक दीवार टूटकर गिर जाती है। दूसरे दिन उस दलित चरित्र में मन से यह बात फूटती है – “न जाने मैंने कितनी ईंटें बनाई होगीं लेकिन अपने परिवार को एक पक्का मकान न दे सका।” यही मेहनकश वर्ग की सच्चाई है कि मेहनत उसकी और राज किसी और का। राज में आज भी उसकी हालत बद से बत्तर है। तमाम संसाधनों पर सबका बराबर का हक़ और सबका साथ सबका विकास सदियों से केवल जुमले थे और हैं।
राजकन्नू को चोरी के झूठे इल्ज़ाम में पुलिस गिरफ्तार कर लेती है और इसके बाद वह पुलिस हिरासत से लापता हो जाता है। ऐसे में उसकी पत्नी उसकी तलाश के लिए वकील चंद्रू (सूर्या द्वारा निभाया गया किरदार) का सहारा लेती है। यह फिल्म 90 के दशक में तमिलनाडु में हुई सच्ची घटनाओं पर आधारित है। प्रारम्भ में ही सीन में दिखता है कि कुछ लोग लोकल जेल से बाहर निकले हैं और उनका परिवार बाहर इंतजार कर रहा है। बाहर निकल रहे लोगों को उनकी जाति पूछकर रोका जाता है और जो नीची जाति के होते हैं, उन्हें फिर से किसी पुराने केस में आरोपी बनाकर पुलिस को सौंप दिया जाता है। फिल्म में पुलिस के अत्याचारों को दिखाया गया है, जहाँ उनके चंगुल से कोई भी नहीं बच सकता है। वहीं सिस्टम पर भी तंज कसते हुए दिखाया गया है कि जब कोई बड़ा अधिकारी किसी छोटे को कुछ करने के लिए कहता है तो चाहें वो गलत हो या सही, सवाल नहीं पूछा जाता और वैसे ही किया जाता है। “जय भीम” में जाति आधारित भेदभाव के मुद्दे को भी काफी संजीदगी से दिखाया गया है। फिल्म में सूर्या, वकील के किरदार में उम्दा अभिनय करते दिखाई देते हैं। वहीं न सिर्फ सूर्या बल्कि अन्य सभी किरदारों ने भी बेहतरीन प्रदर्शन किया है। फिल्म के कई सीन ऐसे हैं जिन्हें देखकर आप सोचने पर मजबूर हो जाएँगे। ‘गणतंत्र को देश में बचाने के लिए कभी-कभी तानाशाही की भी जरूरत पड़ती है’ और ‘कानून तो अंधा है ही, अगर आज ये कोर्ट गूंगा भी हो गया तो मुश्किल हो जाएगी’, जैसे कुछ डायलॉग्स और सीन्स फिल्म को और खास बनाते हैं। तमिल सिनेमा में इन दिनों वैचारिक रूप से मजबूत बोल्ड फिल्मों को बनाने का दौर दिख रहा है। हाल के कुछ महीनों में काला, कबाली, कर्णन, असुरा, सरपट्टा परम्बरई जैसी कई फ़िल्में आ चुकी हैं। इस फ़िल्म के सभी किरदारों ने अपनी व्यक्तिगत छवि को किनारे रखकर कहानी के पात्रों के चरित्र को बहुत बेहतरीन तौर पर जिया है। 
कथ्य के साथ इसकी कास्टिंग बहुत अच्छी है। आर्ट विभाग ने अच्छा काम किया है। दलित बस्ती को देखकर कतई ऐसा नहीं लगता है कि यह सिनेमाई संसार है बल्कि वास्तविकता के ज़्यादा अनुरूप प्रतीत होता है। यहाँ और लगभग पूरी फ़िल्म में अधिकांश भारतीय सिनेमा की तरह सजावटी जैसा कुछ भी प्रतीत नहीं होता है। वो चाहे दलित बस्ती हो, ज़मींदार का मकान हो, पुलिस स्टेशन हो या फिर अदालत। कुछ अन्य आउटडोर लोकेशन भी बढ़िया और कथ्य के अनुरूप एकदम उचित हैं। फ़िल्म में किसी गाने का न होना और फालतू के हीरोबाजी और भाषणबाजी में न फंसना उसकी उपलब्धि है। जहाँ तक सवाल अभिनेताओं के अभिनय का है तो साउथ के सिनेमा का फिल्मांकन बिट्स बाई बिट्स में विभाजित होता है, क्षण-क्षण में उसके कैमरे का एंगल बदलता है इसलिए वहाँ अभिनेता एक बिम्ब बनकर उभरता है न कि चरित्र, फिर एक खास स्टाइल भी है इसलिए अभिनय की बात न करना ही बेहतर है। किसी भी फ़िल्म में अभिनय को स्थापित करने के लिए एक शॉर्ट के भीतर एक खास वक्फा चाहिए होता है, वो यहाँ पूरी तरह से नदारत है। पता नहीं मैं अपनी बात समझा पा रहा हूँ या नहीं किन्तु इतना तो सत्य है कि यदि सिनेमा को बेसिरपैर के बक़वास मनोरंजन से बचाना है तो ऐसी या इससे भी बेहतर और ज़मीनी सच्चाई से रूबरू कराती, सच्चाई युक्त कला का निर्माण करना आज के समय ही नहीं बल्कि हमेशा ही एक महत्वपूर्ण कार्य रहा है। इससे पलायन कला को सार्थकता के बजाय बाज़ारू और बेआबरू बनाती है। मनोरंजन, मनोरंजन और केवल मनोरंजन मात्र को केंद्र में रखकर किसी भी कला की उत्पत्ति कभी नहीं हुई बल्कि उसके भीतर सार्थकता का होना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि जीवन के लिए ऑक्सीजन। कोई मामलों में तकनीकी रूप से बेहद कमज़ोर होते हुए भी ‘जय भीम’ एक सार्थक मनोरंजन फ़िल्म है और बेहद आवश्यक भी।
फ़िल्म एक दृश्य साहित्य है। साहित्य में कला-सौंदर्य बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस फ़िल्म में कला-सौंदर्य और सौंदर्य-कला कलाकारों के अनुभूतियों, अभिव्यक्तियों, जीवन शैली के प्रकटन, भेषभूषा, चालढाल, व्यवहार और भाषा-शैली में चरम कोटि का है। सेंगगेनी के रूप में लीजो मोल जोस और राजकन्नू के रूप में मणिकंदन ने पर्दे पर जो जीवन जिया है वह दृश्य घटना के रूप में वास्तविक घटना के समतुल्य है। यह दृश्य साहित्य के प्रस्तुतिकरण की उत्कृष्ट कला-सौंदर्य में आता है। फ़िल्म को एक दृश्य साहित्य के रूप में जितनी भी प्रसंशा की जाय, कम है। फ़िल्म के सभी कलाकारों ने सजीव चित्रण किया है। सभी कलाकार उत्कृष्ट अवार्ड के योग्य हैं। इस फ़िल्म के निर्देशक का निर्देशन कौशल अन्यतम है। यह फ़िल्म दलितों और आदिवासियों के जीवन के यथार्थ की व्याख्या करता है। इस तरह यह एक उत्कृष्ट फ़िल्म है। इसके किरदारों ने व्यक्तिगत छवि को किनारे करते हुए घटना के पात्रों की वास्तविक जीवन को प्रस्तुत किया है। दृश्य साहित्य का सौंदर्य उसकी अभिव्यक्ति और प्रतुतिकरण में निहित होता है जो इस फ़िल्म में निर्देशकके निर्देशनमें सभी कलाकारों ने जिया है। इस तरह यह फ़िल्म बहुत ही जोरदार बन पड़ी है। 
सच में, दुनिया के विद्वान दुनिया के दुखों की सिर्फ अनेक तरह से व्याख्या कर रहे हैं, जबकि जरूरत है इन दुखों के कारणों को खत्म किए जाने की जिससे दुनिया में समता, स्वतंत्रता और भाईचारे का समाज स्थापित किया जा सके। क्या कभी ऐसी फिल्में भी बनेंगी जो दलितों के यथार्थ जीवन के चित्रण के अतिरिक्त उस यथार्थ के कारणों पर प्रकाश डालती हो और सत्ता, सरकार और जनता को उन कारणों को खत्म किए जाने के लिए भी प्रेरित करती हो। इस फ़िल्म में ज़मीदारों, पुलिस प्रशासन, ब्यूरोक्रेसी, सरकार, न्यायपालिका इत्यादि पर तंज के अतिरिक्त कहीं भी किसी को जिम्मेदार ठहराकर उनकी व्यवस्था और वर्चस्व के विरुद्ध कोई भी कदम उठाने की कोई अपील नहीं है। यह फ़िल्म ऐसा महसूस कराती है कि देश की व्यवस्था गलत नहीं है, पुलिस गलत नहीं है, ब्यारोक्रेसी गलत नहीं है, कानून गलत नहीं है बल्कि समाज, पुलिस और न्यायपालिका के कुछ व्यक्ति गलत हैं।
इस फ़िल्म का नाम “जय भीम” न होता, तो क्या यह फिल्म इतनी प्रसिद्धि प्राप्त कर पाती अथवा दलित इस फ़िल्म को देखने और इसके प्रचार के लिए इतने उद्दत होते? दलित जीवन व जातीय विसंगतियों पर अनेक फिल्में बनीं और ख्यातिलब्ध भी रही हैं लेकिन उनमें ‘आम्बेडकर’ व ‘जय भीम’ शब्द न जुड़ने से, वे इतनी पापुलर न हो सकीं। यहाँ ‘जय भीम’ शब्द को फ़िल्म उद्योग ने मार्केटिंग के रूप में प्रयोग किया है। फ़िल्म की पटकथा आदिवासियों के जीवन के यथार्थ घटनाओं पर आधारित है तथा कलाकारों का अभिनय और अभिव्यक्ति यथार्थ की बिल्कुल छायाप्रति प्रतीत होती है लेकिन पटकथा लेखक और निर्देशक ने बहुत ही बारीक हुशियारी के साथ एक बार से अधिक न डॉ. आम्बेडकर का नाम लिया और न कभी कहीं ‘जय भीम’ का उच्चारण व अभिवादन करवाया है और न ही डॉ. आम्बेडकर के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व प्रशासनिक विचार व विचारधारा पर ही कोई राय रखा है। निर्माता व निर्देशक इस बात को बखूबी समझते थे कि इस फ़िल्म को वर्चस्ववादी-जातिवादी सवर्ण, जमीदार, भूमिधर, सामंत, ब्यूरोक्रेट्स, पुलिस, वकील, भ्रष्ट और घूसखोर कर्मचारी पसंद नहीं करेगा। इस तरह इस फ़िल्म को देखने के लिए एक दर्शक वर्ग पैदा किया जाना भी लाज़िमी हो गया था। इस फ़िल्म का नाम, यदि ‘जय भीम’ न रखा गया होता, तो इतना उत्सुक और क्रेजी होकर दलित इस फ़िल्म को कभी न देखता; इसलिए, ‘हाउ टू मार्केटिंग’ को ध्यान में रखकर जरूर इस फ़िल्म का नाम ‘जय भीम’ रखा गया होगा। एक तरह से इस फ़िल्म का नाम दलितों के भावनात्मक शोषण का एक नया प्रयोग है।
मैं आप को फ़िल्म के एक अन्य पहलू की तरफ ले चलूँगा। इस फ़िल्म में सामाजिक व्यवस्था, पुलिस प्रशासन, न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के विरुद्ध कोई आवाज नहीं है। इस फ़िल्म ने संसदीय लोकतंत्र पर कोई सवाल नहीं उठाया है। इस फ़िल्म ने इस देश की व्यवस्था पर कोई सवाल नहीं उठाया है। यह फ़िल्म भी सभी विभागों में कार्यरत कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों पर सवालिया है। एक दो बार अभिनेता से यह जरूर कहलवाया गया है कि सरकार आदिवासियों को कुचलना चाहती है लेकिन अभिनेता के वैचारिक मत में यह बात संप्रेषित नहीं करवाया गया कि यह सरकार आखिर इन आदिवासियों के विरुद्ध क्यों है। देश में जातिप्रथा हाबी है लेकिन जातिप्रथा को खत्म किए बिना दलीतों और आदिवासियों की जिंदगी नहीं बदलेगी। देश की व्यवस्था देश के जमीदारों के नियंत्रण में है और देश की जमीनें इन्हीं जमीदारों के हाथों में केन्द्रित हैं। बिना जमीनों के राष्ट्रीकरण किए बिना भूमिहीन दलीतों और आदिवासियों का जीवन सुधारा नहीं जा सकता है। जब तक सब के लिए शिक्षा एक समान और अनिवार्य न कर दिया जाय, तब तक आदिवासियों का जीवन नहीं बदला जा सकता है। जब तक व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन नहीं किया जाता है तब तक इस देश के जमीदारों और सवर्णों के पुलिसिया और न्यायपालिका के गठजोड़ को कामजोर नहीं किया जा सकता है। 
मेरा मानना है कि यह फ़िल्म यथार्थ घटनाओं की यथार्थ अभिव्यक्ति मात्र है, न कि यथार्थ घटनाओं के यथार्थ कारणों की अभिव्यक्ति है। इस फ़िल्म में भी अपने तरह की कमजोरियाँ हैं। यह फ़िल्म हमें व्यक्तिवाद से आगे नही बढ़ने देती है। इसमें एक अच्छे आर्ट के स्टारडम है। यह स्टारडम व्यक्तिवाद की परम अभिव्यक्ति है। इसे व्यवस्था आत्मसात करती है क्योंकि अच्छी मेधाओं को आत्मसात करने की उसमें आदत होती है। प्रोफ़ेसनल (मुंबइया) फिल्मों में हीरोइज़्म दिखाया जाता है और हीरो सभी तरह के विलन पर भारी होता है। उस हीरोइज़्म की नक़ल में करोड़ों युवक वास्तविक उद्योग को समझने से इनकार कर देते हैं और व्यक्तिवाद में फँसकर हीरोइज़्म के शिकार होते रहते हैं। दूसरी तरह, ‘जय भीम’ जैसी फिल्में हीरोइज़्म को परदे पर न उकेर कर दूसरे तरह से व्यक्तिवाद में ही उलझाए रहती हैं। युवा सोचता है कि यदि हम वकील बनेंगे तो किसी केस को इतनी ही तन्मयता इतनी ही शिद्दत इतनी ही ईमानदारी से लड़ेंगे। हमारा युवा, जब उस लायक होता है, तो वह सचमुच उतनी ही ईमानदारी से कोई केस लड़ता है। इस दौरान वह अपने स्किल को वहाँ फँसा देता है जहाँ इस व्यवस्था के असंख्यों हिस्से के मात्र एक बाल सीधा कर पाता है लेकिन उसे क्या पता कि उतने ही समय में न जाने और भी कितने बाल उग आए होंगे जो उसे ज्ञात ही नहीं है। उतने समय में न जाने कितने सेंगगेनियों के पतियों का लॉकअप में हत्या हो चुकी होगी और लाशें कहीं ठिकाने लगा दी गई होंगी। सेंगगेनी के साथ तो न्याय हो गया लेकिन अनेक सेंगगेनियाँ न्यायालय तक पहुँच ही न सकी होंगी। हमारी अज्ञानता पर हमारी अज्ञानता की मार्केटिंग होती है, उसे हमें बहुत बारीकी से समझना होगा। इतना ही नहीं, मैं सभी न्याय प्रिय, सामाजिक बदलाब चाहने वालों, आम्बेडकर प्रेमियों और क्रांतिकारियों से यह भी कहना चाहूँगा कि निर्माता और निर्देशक से जो कुछ किसी भी कारण वश छूट गया है अथवा छोड़ दिया गया है, उसको उनकी मार्केटिंग की नीति या सरकार का दबाव मानकर वहीं छोड़ दिया जाना चाहिए तथा उनके कमजोरी के आगे अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए क्रांतिकारी सिद्धांतों पर आधारित संगठिनक ढाँचों की परिधि में अपनी क्रांतिकारी भूमिका का निर्वहन करते हुए क्रांति की धारदार गति को तीव्र गति से आगे जरूर बढ़ाना चाहिए।
*आर डी आनन्द*

Ramswaroop Mantri

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