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औजार क्या चाहते हैं-पूंजीवाद या समाजवाद?

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 ( ” क्या बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार की समस्या हमेशा रहेगी या मिट जायेगी? क्या इन समस्याओं को पैदा करने वाला यह पूंजीवाद अजर-अमर है? क्या अमीर-गरीब सदा से रहे है और सदा रहेंगे? क्या ये व्यवस्था नए औजारों के आ जाने के बाद भी कदापि बदलने वाली नहीं है? क्या पूंजीवाद सदा से रहा है या बाद में पैदा हुआ? यह सदा रहेगा या खत्म हो जायेगा? मेहनतकश जनता की गुलामी हमेशा बनी रहेगी या ये गुलामी टूट जायेगी? अगर टूटेगी तो क्यों टूटेगी?” इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर की पड़ताल करने के लिए ऐतिहासिक विकास के वैज्ञानिक नियमों पर सरसरी निगाह डालना जरूरी है।)

रजनीश भारती* _

क्रांतिकारी साथियों, 

   आप एक साधारण फावड़े के हत्थे की लम्बाई दो फुट बढ़ा दीजिए तो इससे यह फर्क पड़ता है कि आप उसे पहले की तरह झुक कर नहीं चला सकते। आप इस फावड़े से खड़े-खड़े ही मिट्टी खोद सकते हैं। अर्थात फावड़े के हत्थे की लम्बाई बढ़ जाने से झुक कर चलाने की बजाय खड़े होकर चलाना पड़ता है। इस तरह आप देख सकते हैं कि औजारों में थोड़ा परिवर्तन कर देने से उस औजार को चलाने वाले की शारीरिक स्थिति भी बदल जाती है।    

 पर क्या आपको यकीन है कि औजारों में बदलाव आ जाने से हमारे पूरे समाज की भी स्थिति बदल जाती है? आप को आसानी से यकीन नहीं होगा, पर यह सच है। ज्यादा नहीं अभी 40 साल पहले हमारे  उ.प्र. के गांवों में धनी किसान लोग सोचते थे कि “हलवाहे का लड़का पढ़-लिख लेगा तो हमारे खेतों मे हल कौन चलाएगा”, और हलवाह भी सोचता था कि “बाबू साहब की हलवाही छूट जाएगी तो हमारे बच्चों का गुजर बशर कैसे होगा।” इस प्रकार दोनों ही नहीं चाहते थे कि हर-बैल हटे, हलवाही खत्म हो। मगर “ट्रैक्टर” आ गया तो हल-बैल-हलवाहे का जमाना लद गया, हलवाह और हल के मालिक का सम्बन्ध बदल गया। 40 साल पहले गाय को अगर बछड़ा पैदा हो जाय तो गाय का मालिक किसान बहुत खुश हो जाता था। लेकिन खेती में ट्रैक्टर का प्रचलन ज्यों-ज्यों बढ़ता गया त्यों-त्यों यह धारणा बदलती गयी। इस तरह औजारों के बदलने से हमारी खुशियों के पैमाने भी बदल जाते हैं। इसी प्रकार हम इतिहास को देखें तो पायेंगे कि जब औजार गुणात्मक रूप से बदल जाते हैं तो पूरा समाज भी गुणात्मक रूप से बदल जाता है। औजार तय कर देते हैं कि किस तरह का समाज बनाने की जरूरत है। रूढ़िवादी या प्रतिक्रियावादी शक्तियां जो उस बदलाव को रोकती हैं जनता उन्हें देर-सवेर इतिहास के कूड़ेदान में फेंक देती है। अब हमें किस तरह का समाज बनाने की जरूरत है इसे समझने के लिए आइये हम उत्पादन औजारों के साथ समाज के ऐतिहासिक बदलाव को इसी नजरिए से सरसरी तौर पर देखें- 

       ‘द्रव्यमान की अविनाशिता’ एवं ‘ऊर्जा के रूपांतरण के नियम’ से वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि द्रव्यमान अविनाशी है, न तो इसे कोई पैदा कर सकता है और ना ही इसका विनाश कर सकता है। हां, इसके स्वरूप को बदल सकते हैं और द्वण्द्ववाद के नियमों के अनुसार दुनिया लगातार बदल भी रही है।  

कोशिका की खोज करके वैज्ञानिकों ने यह भी साबित कर दिया है कि निर्जीव तत्वों से ही सजीव की उत्पत्ति हुई है और जिन तत्वों से सजीव शरीर की उत्पत्ति हुई है उन्हीं तत्वों को खाये बगैर, पचाये बगैर कोई जीव शरीर जिन्दा नहीं रह सकता है।       खाने-पचाने के लिए उसे भूख लगती है, भूख  की समस्या का समाधान सिर्फ और सिर्फ भोजन है और भोजन की समस्या का समाधान जहां पशु लोग भोजन के कलेक्शन से करते हैं वहीं मानव समाज भोजन का उत्पादन करता है।  

   हालांकि पशुओं की तरह मानव समाज भी प्राचीन काल में भोजन का कलेक्शन ही करता था परंतु वह फल खाते-खाते पेड़ लगाना सीख लिया, पशुओं का शिकार करते-करते पशुपालन सीख लिया, पशुओं को चारा खिलाने के चक्कर में खेती सीख लिया, गुफाओं में रहते रहते घर बनाना सीख लिया, नदियों और तालाबों से पानी पीते-पीते कुआं खोदना सीख लिया। तब मनुष्य समाज पशुओं से अलग हो गया और वह कबीले के रूप में कबीलाई समाज में रहने लगा।
*क्रमशः भाग 2 में…..*
*रजनीश भारती**राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा उ. प्र.*

Ramswaroop Mantri

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