शशिकांत गुप्ते इंदौर
आज सीतारामजी गांधीजी और आचार्य विनोबाजी का स्मरण कर रहे हैं। आज मुझसे मिलते ही सीतारामजी ने मुझे आचार्य विनोबाजी ने स्त्री स्वतंत्रता के लिए कहा,सुविचार सुनाया। विनोबजी ने कहा है,स्त्री आरक्षित नहीं स्वरक्षित होनी चाहिए, जंगल में किसी भी मादा पशु की रक्षा कोई नर पशु नहीं करता है।
गांधीजी ने कहा यदि मै स्त्री होता तो चंडिका ही होता।
गांधीजी ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी अर्धार्गिनी कस्तूरबा को अपने साथ रखा था। कारण गांधीजी की कथनी करनी में अंतर नहीं था।
आज बहुत शोर हो रहा है। महिला आरक्षण का? महिला आरक्षण बिल सर्व सम्मति से पारित तो हो गया,लेकिन इस बिल का व्यवहारिक क्रियान्वय कब होगा यह सुनिश्चित नहीं है।
यह बिल ऐसा लड्डू है,जो शुद्ध घी में निर्मित किया है। इस लड्डू में देश के सभी प्रांतों के विभिन्न सूखे मेवे (Dry food) भी मिलाए हैं। साथ ही स्वाद के लिए इलाइची का बूरा भी मैं मिक्स किया है। शक्कर की मिठास तो बहुत ही उम्दा हैं। लड्डू के ऊपर लुभावने आश्वासनों से युक्त चांदी का वर्क चढ़ाया है।
लड्डू की जितनी भी स्तुति की जाए उतनी कम है। लेकिन यह लड्डू कोई खा नहीं सकता है।
कारण इस लड्डू का स्वाद देश के सभी वर्गो के लोगों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में चखना हैं। अब जातिगत जन गणना होगी,तब इस लड्डू का स्वाद चखा जाएगा।
इंतजार करों कब नो मन तेल होगा,कब राधा नाचेगी?
सीतारामजी का वक्तव्य सुनकर मैंने कहा फिलहाल तो राधा की स्थिति नाच न जाने आंगन टेढ़ा जैसी हैं।
सीतारामजी ने कहा आप सच कह रहे हैं।
महिला आरक्षण की चिंता जताने के पूर्व स्त्री सुरक्षा के लिए पहल होनी चाहिए। नहीं तो कुश्ती के खेल में अपने प्रतिस्पर्धी को चित करने वाली अपने देश की स्त्री पहलवान अपने ही शोषण का शिकार होती है।
उत्तर पूर्व के प्रांत में स्त्री को वस्त्रहीन कर उसके साथ क्रूरता पूर्वक अश्लील व्यवहार किया जाता है।
हाल ही में एक खबर सार्वजनिक हुई है। एक नगर की चुनी हुई पार्षद स्त्रियां सभा में अनुपस्थित होती है,और उनकी जगह उनके जीवनसाथी सभा में उनका प्रतिनिधित्व करते हैं।
यह खबर पढ़ने के बाद एक व्यंग्य का स्मरण हुआ।
साक्षरता अभियान का प्रसार होने के बाद बुद्धूसिंग अपने हस्ताक्षर करना तो सीख गया। उसे यह नही सिखाया गया की हस्ताक्षर कब,कहां,किस दस्तावेज पर करना चाहिए। आज भी बुद्धूसिंग हस्ताक्षर उन्ही दस्तावेजों पर करता है,जिन दस्तावेजों पर वह पूर्व में अंगूठा लगता था।
देश की जनता को देशी फिल्मों की कल्पनातीत कहानी में भावनामत्क गीत ही तो गाना है।
हम इंतज़ार करेंगे,क़यामत तक
खुदा करे कि क़यामत हो
क़यामत किसी होगी यह समय पर निर्भर है।






