सुसंस्कृति परिहार
पर्देदारी से मेरा आशय घूंघट या बुर्खा से कतई नहीं है। वह तो काफी हद तक घट चुका है। मेरा आशय उस वीभत्स और डरावनी पर्देदारी से है जिसका साया तकरीबन हर महिला को ढके हुए है। जिसने उसकी अपनी तमन्नाएं और जज़्बात पर पितृ सत्ता का आवरण डाल रखा है। इसके साथ ही उसकी जुबान पर ताला लगा रखा है। बेटियों और महिलाओं के साथ जो घरु हिंसा होती है वह सामने नहीं आ पाती।जब वह घर से बाहर पढ़ने या नौकरी करने जाती है तब भी उसके साथ होने वाली यौन हिंसा का ज़िक्र भी इस डर से नहीं कर पाती क्योंकि उसे डर है यदि वह उसे घर में बताएगी तो उसका घर से निकलना तो बंद होगा ही साथ ही साथ उस पर ही ग़लत आचरण का आरोप लगाया जाएगा। इससे बेहतर वे चुप्पी में ही अपने भले को पाती हैं।

वे नहीं जानतीं उनकी यह चुप्पी बदमाशों के लिए चाहे वे घर के हों या बाहरी, वरदान बन जाती है। वे इस चुप्पी को कथित तौर पर सहमति मान लेते हैं और धीरे धीरे उसे अपने दबाव में ले लेते हैं। एक बार वह इस दविश का शिकार हुई तो उसका जीना मुश्किल हो जाता है। आजकल तो एक बार साथ का वीडियो बनाकर भरपूर शोषण करने की राह खुल जाती है।उसका पढ़ना या नौकरी पर जाना खतरनाक होता जा रहा है। ऐसी स्थितियों वह आत्महंता बन जाती है।
ऐसी अवस्था ना आने पाए इसके लिए बरसों की दादी-नानी की सीख के विरुद्ध चुप्पी तोड़नी होगी। फिर चाहे वह घरु यौन हिंसा हो ,सड़क या कामकाजी क्षेत्र में की गई यौन हिंसा होगी।
अब स्त्री घरेलू महिला नहीं है वह पुरुषों से बराबरी की टक्कर में हैं। वैसे पर्देदारी में रखकर पुरुष उसका दोहन गृहस्थ महिला कहकर करते रहे हैं । जिसका काम खेती में सहयोगी होने के साथ भोजन-पानी की व्यवस्था, परिवार की सेवा और बच्चों का पालन-पोषण रहा है। जबकि मर्द सिर्फ खेती या मज़दूरी करता है। बाकी सभी काम स्त्री के जिम्मे है।इतने काम के बावजूद वह दोयम दर्जे की है। चुपचाप सहती है तो ठीक वरना उसकी पिटाई होते-होते छोर छुट्टी तक आ जाती है। मर्द की कोई समस्या नहीं दूसरी औरत आ जाती है। पहली औरत में यदि तब भी चुप्पी बनी रहती है तो वह समाज में एक खराब औरत में तब्दील हो जाती है। ऐसी अनेकों महिलाएं यह दंश झेल रही हैं।
यही चलन शहरी कामगार स्त्री के साथ भी होता है।वह बराबरी से पैसा कमाकर भी लाती है और चकरघिन्नी की तरह दिन रात काम में मशगूल रहती है।ये कैसा पितृसत्तात्मक समाज है जो नारीजात के साथ दुश्मन से भी ज़्यादा अपमान जनक व्यवहार करता है।
स्त्रियों को समझना होगा कि जब तक वे चुप रहेंगी उनके साथ और आगत पीढ़ियों का इसी तरह दमन होता रहेगा।परसाई जी ने तो साफ़ साफ़ दिख दिया था कि स्त्री घर से बाहर मंहगाई की वजह से निकली है क्योंकि एक से अब परिवार का पोषण नहीं होता। वाकई स्त्री की हालत स्वावलंबन के बाद और बुरी हो गई क्योंकि उसका संपूर्ण समय दफ्तरों और घरु तनावों में ही गुज़र जाता है।उसकी अपनी इच्छाएं दबी ही रह जाती हैं।
यह स्थितियां सिर्फ मध्यम वर्ग की महिलाओं की नहीं है।बराबरी के पदों पर बैठे पति-पत्नी का भी कमोवेश यही हाल है।एक लेखिका ने बहुत पहले लिखा था कि उसे सबके सो जाने के बाद ही अपनी नींद को खोकर ही अपनी अभिव्यक्ति के लिए समय मिल पाता है।
यह स्थितियां चिंताजनक हैं। अफसोसनाक है वह फिर भी ख़ामोश है।वह किसी लड़की के साथ हुए दुष्कर्म पर भी नहीं बोलती। आज़ाद भारत की तकरीबन 90फीसदी महिलाओं की ख़ामोशी निरंतर उसे रसातल में लिए जा रही है।एक महिला के राष्ट्रपति,वित्त मंत्री, मुख्य मंत्री,जज, बड़ा अधिकारी और जिला पंचायतों , पालिकाओं में पहुंचने से कुछ भी हासिल नहीं हुआ क्योंकि वह अपनी जगह सीखें हुए पाठ पढ़ती हैं।यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अभिशाप ही कहा जाएगा।
आज महिलाओं पर बढ़ते अपराधों की वजह उनकी सहनशीलता और चुप्पी ही जिम्मेदार है। क्योंकि संविधान ने उन्हें जो हक दिए हैं उसे प्राप्त करने में उसकी दिलचस्पी नहीं है। महिलाओं का दूसरी महिला के प्रति नकारात्मक रुख बड़ी खामी है। तीसरे समाज से उपेक्षित महिला जब अपनी कोशिश और साहस से आगे आती है उसके प्रति भी सम्मान भाव नहीं रहता। न्याय व्यवस्था की हीला सवाली और बलात्कार जैसे घृणास्पद कार्य करने वालों को जब सम्मान मिल जाता है तब तो महिलाओं की एकजुटता से ही काम बन सकता है।अब तक पर्दे दारी बहुत हुई,खूब सहा अब नहीं सहेंगे।इस कारा को तोड़ेंगे के भाव महिलाओं के दिल में आने चाहिए और खुलकर अपनी बात सार्वजनिक मंच पर साहसपूर्ण तरीके से रखने का सलीका भी आ जाए ,तभी संभावना बनती है एक सशक्त नारी की।वरना मनुवाद की पुनरावृत्ति दूर नहीं।जब वह फिर दमन की चक्की में पिसते हुए गृहस्थ ही बना दी जाएगी। तब पितृसत्तात्मकता और बुलंद होगी। आइए पर्देदारी का पर्दाफाश करें।मुखर हों।जागो !जब जागोगी तभी सबेरा होगा।






