~ रश्मिप्रभा सिंह
“मुझे कोई नहीं समझता। सबने छला। इस दुनिया मेँ मेरा कोई नहीं. सब के सब खुदगर्ज. मेरे जीने का कोई अर्थ ही नहीं. धरती पर बोझ क्या बनना, दुनिया छोड़ देना ठीक रहेगा.”
अगर आपको ऐसा लगता है तो हम आपको गलत नहीं कहते, लेकिन आखिरी वाक्य गलत है. गलत ऐक्शन नहीं लें. मेल, फीमेल, बीच वाले या सीमेल : जो भी हों आप, हमें मिलें. जितनी बेहतर जिंदगी आप डिजर्व करेंगे, हम आपको प्रोवाइड कराएंगे.
बिना किए मान लें की आत्महत्या कर ली आपने. अब अपना नया जन्म स्वीकारें, इसे हमें सौंप दें और इसका वर्तमान – भविष्य हमें लिखने दें.
जब कभी आप अपने बारे में सोचते हैं तो क्या आपको ऐसा लगता है :
“किसी का बुरा सोचना भी मुझे पसंद नहीं। छल-कपट से दूर हूं। लेकिन मुझे कोई समझ नहीं पाया। सच्चे प्यार का तो एक कतरा भी मुझे नसीब नहीं हुआ. अपनत्व के नाम पर भी मुझे छला गया।”
ऐसा लगना बिल्कुल अस्वाभाविक नहीं है. ऐ़सा इसलिये लगता है क्योंकि :
“खुदगर्जों की महफिल है,
उनकी हसरतों का मेला है।
रिश्तों की भारी भीड में भी
हर नेक इंसा अकेला है।”
ये सच हम हर पल जमाने में देखते हैं। मगर जब तक खुद भुक्तभोगी नहीं बनते तब तक “अपने मामले में” इसे सच नहीं मानते। जिसे इस सच का ‘अनुभव’ होता है, वह यही पाता है :
“खुदगर्ज रिश्तों ने, जमाने ने लूट लिया सब कुछ !
दिया जिन्दा लाश-सी जिन्दगी के सिवा कुछ भी नहीं.”
तब इंसान इतना टूट जाता है कि उसे लगता है कि, ऐसी जिन्दगी में हर पल मरने से बेहतर वह एक बार ही कम्प्लीटली मर जाए। यानी सुसाइड का स्टेज.
साथियों, आपको ऐसा इंसान दिखे तो उसे संभालें। अपने मनुष्य होने का, अपनी मानवता का परिचय दें।
अगर किसी वजह से ऐसा न कर पाएं तो उसे हमसे जोड़ दें। उसे नई और सफल जिन्दगी मुहैया कराई जाएगी।
(चेतना-स्टैमिना विकास मिशन)





