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बूचा का बूचर कौन है? रूसी सेना पर नरसंहार के आरोप क्यों लग रहे हैं

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गौतम कश्यप

3 अप्रैल से यूक्रेन के बूचा शहर से जुड़ी खबरें भारतीय और पश्चिमी मीडिया की सुर्खियां बनी हुई हैं। मीडिया के अनुसार यूक्रेनी अधिकारियों ने बूचा क्षेत्र की कुछ तस्वीरें और वीडियो प्रकाशित किए हैं, जो कथित तौर पर यूक्रेनी नागरिकों के खिलाफ रूसी सेना द्वारा किए गए नरसंहारों की गवाही देते हैं। रूसी अधिकारियों ने इस आरोप पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे उकसावे की घटना कहा है एवं इसके पीछे कई विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए इस घटना पर चर्चा करने हेतु संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आकस्मिक बैठक की मांग की है। बूचा नरसंहार की खबरें सामने आने के बाद पूर्व की तरह कीव ने अमेरिका और नाटो सदस्य देशों से पुनः रूस के खिलाफ नए सख्त प्रतिबंध लगाने और भारी हथियारों की आपूर्ति की मांग की है।
रूसी रक्षा मंत्रालय ने ‘बूचा नरसंहार’के आरोपों का खंडन करते हुए बयान दिया है कि जब बूचा पर रूसी सशस्त्र बलों का नियंत्रण था, तब एक भी स्थानीय निवासी ने रूसी सेना की हिंसक कार्रवाई से पीड़ित होने की शिकायत नहीं की है। लोग तब शहर में और शहर से बाहर आराम से घूम-फिर रहे थे। उस दौरान बिजली, मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट की सेवा नागरिकों को उपलब्ध थी। बूचा शहर से बाहर निकलने वालों के लिए मार्ग अवरुद्ध नहीं किया गया था। तब कहीं किसी ने रूसी सेना पर नरसंहार के आरोप नहीं लगाए। जबकि उसी समय, यूक्रेन के सशस्त्र बलों द्वारा शहर पर लगातार बमबारी की जाती रही। 
तुर्की में रूस और यूक्रेन के बीच हालिया शांति वार्ता के बाद रूस ने बूचा पर अपने कब्जे को छोड़ने का फैसला किया। 30 मार्च को रूसी सेना ने बूचा का प्रशासन वहाँ के मेयर को सौंप कर शहर खाली कर दिया। 31 मार्च को मेयर अनातोली फेदरचुक ने घोषणा की कि बूचा आजाद है और अब वहाँ एक भी रूसी सैनिक की उपस्थिति नहीं है। उन्होंने तब इस बात की जरा भी चर्चा नहीं की कि वहाँ सड़कों पर लाशें हैं या रूसी सेना ने वहाँ कहर बरपाया है। इस बीच नाजी समूहों द्वारा सोशल मीडिया पर खबरें वायरल की गई कि उनकी बहादुरी से डरकर रूसी सेना भाग गयी है। 30 मार्च से 2 अप्रैल तक किसी ने भी आरोप नहीं लगाया कि रूसी सेना ने वहाँ नरसंहार किया है। 3 अप्रैल की दोपहर बूचा में यूक्रेनी और पश्चिमी मीडिया पहुँचती है, उसके बाद रूस के खिलाफ़ ‘बूचा नरसंहार’ का आरोप मढ़ा जाता है। 
एक परिचित रूसी अधिकारी से मैनें इस पर सवाल किया तो, उन्होंने कहा, “यूक्रेन ने इससे पहले रूस पर इल्जाम लगाया गया था कि मारियूपोल के थियेटर में शरण लिए हजारों बच्चों और महिलाओं को रूसी सेना ने रॉकेट से हमला करके मार डाला। रूसी सेना ने जब मारियूपोल पर कब्जा करके हमले की जांच की तो वहाँ रॉकेट हमले के कोई अवशेष नहीं मिले। जांच में स्पष्ट हुआ कि यूक्रेनी नाजी सैन्य बटालियन “अजोव” ने थियेटर में लोगों को जबरदस्ती बंद करके विस्फोटक से उड़ा दिया,  जिसके चलते वहाँ बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों की मृत्यु हुई। 16 मार्च को यह घटना हुई और 17 मार्च तक हजारों लोगों की हत्या की खबरें पूरी दुनिया में चलने लगी। उसके बाद प्रतिक्रिया स्वरूप दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रूसी लोगों के साथ मार-पीट की घटनाएं होने लगी। रूसी सेना ने मारियूपोल थियेटर की वीडियोग्राफी कराई और नाजियों की संलिप्तता के खिलाफ़ पर्याप्त साक्ष्य इकट्ठे कर लिए, लेकिन अब यूक्रेनी सरकार और विश्व मीडिया इस पर चर्चा करने से भाग रही है। मारियूपोल थियेटर में नाज़ियों द्वारा किए गए नरसंहार के बावजूद कुछ लोग जीवित बच निकले हैं, जो अब चिंतित हैं कि उनकी हत्या यूक्रेन की सरकार द्वारा करवाई जा सकती है। यूक्रेन को डर है कि आने वाले दिनों में ये लोग सच्चाई को सामने लाएंगे।“ 
“यूक्रेनी मीडिया में एक वीडियो दिखाई गयी है, जो आजकल चर्चा का विषय है । इसमेंं सड़कों पर चारों तरफ लाशें बिछी हुई हैं लेकिन उसमें नकली लाशें बने कुछ लोग अपने हाथ -पैर हिला कर शरीर के कपड़े ठीक कर स्वयं को ढंकने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में इस घटना की सत्यता पर सवालिया निशान लग गया है। युद्ध काल में सर्वाधिक झूठ बोले जाते हैं। ऐसे में लग रहा हैै कि पश्चिमी देशों द्वारा रूस विरोधी माहौल बनाने के लिए घटना को काफी बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने की कोशिश की जा रही है।”
उन्होंने आगे कहा, “यूक्रेनी सरकार में मनोरंजन उद्योग से संबंधित लोगों की भरमार है। ये लोग पटकथा लिखने में माहिर हैं। चटक-पटक कहानियाँ बनाना और फ़िल्माना जानते हैं, और साथ ही उन्हें पश्चिमी मीडिया का भी पूरा साथ मिलता है, ऐसे में उनके लिए दुनिया भर में रूस विरोधी भ्रामक खबरें फैलाना काफी आसान है। शांति वार्ता के मुताबिक रूसी सेना ने इरपिन, खारकीव और करीब दसियों शहरों से वापसी की है लेकिन रूसी सेना पर सिर्फ “बूचा में नरसंहार” का आरोप लगाया गया है। आखिर क्यों? – इसलिए, क्योंकि बूचा और बूचर शब्द सुनने में एक जैसे लगते हैं और इसके जरिए उन्हें रूस की छवि को बूचर (कसाई) जैसा दिखाने में आसानी होगी।“ यही वजह है कि 4 अप्रैल को तमाम अमेरिकी और यूरोपीय समाचारपत्रों ने खबरों को आकर्षक बनाने के लिए रूसियों के खिलाफ़ “The Butchers of Bucha” आलंकारिक वाक्यांश का इस्तेमाल किया। 
रूसी रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि बूचा में संभवतः 2-3 अप्रैल के बीच नाज़ियों ने आम लोगों की हत्या की है। कई लोगों की लाशें सड़कों और गलियों में मिली है। एक लड़के की लाश की फोटो वायरल हुई है जिसमें बगल में एक कुत्ता बैठा है और उसकी साइकिल गिरी हुई है। अगर ऐसी घटना 30 मार्च या उससे पहले होती तो रूसी सेना के जाते ही खबरें सामने आती लेकिन चार दिनों के बाद ये लाशें सामने आ रही हैं और वे बुरी स्थिति में भी नहीं हैं। रूसी रक्षा मंत्रालय ने वायरल फोटो का अध्ययन किया और बताया है कि कई मृतकों के हाथों पर सफेद पट्टियाँ बंधी थी। दरअसल जब रूस का उस क्षेत्र पर कब्जा था तो सेना ने क्षेत्रीय लोगों को निर्देश दिए थे कि वे हाथों में सफेद पट्टियाँ लगाकर ही बाजार या कामों पर जाएँ। रूसी सेना के जवान भी हाथों पर सफेद पट्टी बांधते थे ताकि इससे उन्हें अपने और क्षेत्रीय लोगों का पता चल जाए और धोखे से वे रूसी सेना के हमलों का निशाना न बन जाएँ। रूसी सेना के जाने के बाद भी संभवतः आम लोग अपनी सुरक्षा के लिए सफेद पट्टी बांध कर बाहर निकलते होंगे, ऐसे में आशंका व्यक्त की जा रही है कि नाज़ियों ने उन्हें “रूस समर्थक” समझ कर उनकी हत्या कर दी गयी होगी। कुछ क्षेत्रीय लोगों ने टेलीग्राम पर लिखा है कि रूसी सेना से जुड़ी जानकारी पाने के लिए नाज़ियों ने अपनी ही जनता को प्रताड़ित किया और उनकी हत्या कर दी। पश्चिमी मीडिया की खबरों के मुताबिक बूचा में करीब 400 लोगों की हत्या हुई है और उन्हें सामूहिक कब्र में दफनाया गया है।     
खबरें आने के बाद फ्रांस, जर्मनी, पोलैंड और ब्रिटेन के राष्ट्राध्यक्षों के रूस के खिलाफ़ बयान आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन ने भी रूस पर शब्दों से हमले किए हैं। यूक्रेनी नाजी सेना को अब उम्मीद है कि बूचा की पटकथा लिखने के बाद यूरोप यूक्रेन को भारी हथियारों की आपूर्ति करना शुरू कर देगा, जिसकी उन्हें सख्त जरूरत है। इस पटकथा का एक उद्देश्य है: दुनिया के आम लोगों के बीच रूस की छवि एक आतंकवादी राष्ट्र के रूप में प्रचारित करना। ऐसे में आशा यही है कि शांति काल में जब यूक्रेन की आम जनता यूक्रेनी नाज़ियों की पटकथा के विरोध में अपनी सच्ची कथा लिखेगी तब सच्चाई दुनिया के सामने जरूर आएगी। 
*गौतम कश्यप

Ramswaroop Mantri

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