अग्नि आलोक
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“आखिर मैं जिंदा क्यों हूँ — एक बेचैनी का गद्य”

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          कभी-कभी लगता है जैसे यह प्रश्न— आख़िर मैं जिंदा क्यों हूँ?”— किसी एक दिन की उपज नहीं, बल्कि अनेक दिनों, महीनों और वर्षों से जमा होते उस मौन का विस्फोट है जो भीतर ही भीतर सुलगता रहता है। ऐसा मौन जो शब्द नहीं बन पाता, मगर मनुष्य की पूरी आत्मा का भार अपने कंधों पर ढोता रहता है।

          यह प्रश्न तब जन्म लेता है,  जब सुबह की पहली चाय के साथ अख़बार खुलता है और सुर्ख़ियां इंसान की मौत से कम और समाज के हृदय की मौत से ज़्यादा भरी मिलती हैं। जब क़तारों में खड़े लोग सिर्फ़ राशन या नौकरी के लिए नहीं, बल्कि उम्मीद के किसी टूटे हुए टुकड़े के लिए खड़े दिखाई देते हैं। जब कोई सड़क, कोई मोहल्ला, कोई संवाद— सब अचानक “हम” और “वे” के खाँचों में बँट जाने लगते हैं।

          इन सबके बीच, एक साधारण मनुष्य के भीतर यह सवाल आकार लेता है— क्या मेरी ज़िंदगी का मतलब अब सिर्फ़ भय और अनिश्चितता को ढोना है?  समाज की वर्तमान स्थिति किसी जर्जर खिड़की से आती हुई उस हवा के जैसी है जो कमरे को ठंडा नहीं करती, बल्कि देह और मन को कंपाने लगती है। राजनीति की चालें, धर्म की आड़ में उगाई गई दूरियाँ, और सामुदायिक विद्वेष की फसल इतनी तेजी से फैलती हैं कि लगता है जैसे हम सभी किसी अदृश्य हाथ के इशारे पर कठपुतलियों की तरह थिरक रहे हों।

          लेकिन इतना ही नहीं—सबसे भयावह बात यह है कि इस सबके बीच “सामान्य” दहलाने वाली ज़िंदगी जीने का ढोंग भी हम रोज़ करते हैं।  हम बाजारों में जाते हैं, बच्चों को स्कूल भेजते हैं, त्यौहार मनाते हैं, मुस्कुराते हैं, बातचीत करते हैं— मगर भीतर एक निरंतर खटखटाहट चलती रहती है कि यह सामान्यता किसी पल ध्वस्त हो सकती है। इसी खटखटाहट से जन्म लेता है वह गद्य— जो हम सबकी सामूहिक बेचैनी है। मैं सोचता हूँ— मैं आज भी जिंदा क्यों हूँ? शायद इसलिए कि ज़िंदगी का अर्थ केवल वह नहीं जो बाहर घट रहा है, बल्कि वह भी है जो भीतर अभी भी टूटने से इंकार कर रहा है। भीतर अब भी कोई कोमल सा कोना है जो चाहता है कि इंसानियत को इतने सस्ते में न बेच दिया जाए।
          अब भी कोई उम्मीद है जो मानती है कि समाज का असली चेहरा वह नहीं जो मंचों और भाषणों पर दिखाई देता है, बल्कि वह है जो दुर्घटना में घायल अजनबी को कंधा देने वाले हाथों में बसता है। मैं कभी-कभी देखता हूँ— सड़क के किनारे चाय बेचने वाला बूढ़ा, जो अपनी थोड़ी-सी कमाई में से रोज़ किसी विद्यार्थी को मुफ्त चाय दे देता है; फल बेचने वाली औरत जो अपने दो फलों के साथ एक मुस्कान भी देती है; और वह रिक्शावाला जो थपकी देकर कहता है, “भइया! पैसे नहीं हैं तो कोई बात नहीं, कल दे देना।” ये लोग किसी भी संविधान, किसी भी सत्ता, किसी भी मत की बहस से कहीं ज़्यादा “लोकतंत्र” और “इंसानियत” को जीवित रखे हुए हैं। और शायद इसी वजह से मैं ज़िंदा हूँ— क्योंकि समाज की धुंध के पीछे अब भी कुछ ऐसे चेहरे हैं जो स्पष्ट दिखाई देते हैं। क्योंकि हर अँधेरे के साथ, एक बहुत मद्धिम-सी रोशनी भी पलती है, भले वह डरपोक हो, छोटी हो, भरी-पूरी न हो— लेकिन वह होती है।

          मैं ज़िंदा हूँ क्योंकि दुनिया अभी पूरी तरह निराश नहीं हुई। क्योंकि मेरी सांसें भले ही कांपती हों, मगर पूरी तरह हार मानने से इंकार करती हैं। क्योंकि सवाल पूछना अब भी मना नहीं हुआ है, और शायद सवाल पूछने वाले लोग ही किसी देश, किसी समाज और किसी समय को अंततः बचाते हैं।

           हाँ— आज के माहौल में जीना आसान नहीं। हम एक ऐसे दौर में हैं जहाँ असहमति को दुश्मनी समझा जाता है, और डर को सामान्य। जहाँ व्यक्ति का मूल्य उसकी मानवता से नहीं, उसकी पहचान से मापा जाने लगा है। फिर भी, मैं चाहता हूँ कि मेरी ज़िंदगी का अर्थ इस विभाजित हवा का हिस्सा बनना न हो—बल्कि उस हवा का बनना हो जो कहीं से आकर धूल को थोड़ी देर के लिए ही सही, शांति में बदल दे।

          मैं ज़िंदा हूँ—शायद इसलिए कि मैं अभी भी चाहता हूँ कि दुनिया बदल सकती है। कि सचाई और संवेदनशीलता की धीमी चाल भी किसी दिन तेज़ दौड़ में बदल सकती है। और इसलिए भी कि मैं जानता हूँ—अगर सवाल मर गया, तो इंसानियत का आखिरी सहारा भी टूट जाएगा। इसलिए मैं ज़िंदा हूँ।

·        ताकि यह प्रश्न, जो मेरे भीतर उठता है, किसी दूसरे व्यक्ति में उत्तर बनने की संभावना बचाए रखे;

·        ताकि मेरा होना, किसी और के टूटते हुए मन को यह भरोसा दे सके कि वह अकेला नहीं है।

          शायद इसी में जीवन का अर्थ छिपा है—बहुत बड़ा नहीं, बहुत चमकदार नहीं, बस इतना कि हम एक-दूसरे का अंधेरा थोड़ी देर के लिए कम कर सकें।

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Ramswaroop Mantri

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