-तेजपाल सिंह ‘तेज’
यहाँ मैंने जो पूरा संवाद साझा किया, वह मूल रूप से उर्मिलेश द्वारा लिए गए इंटरव्यू का ट्रांसक्रिप्ट है। इसमें प्रोफ़ेसर रतनलाल और प्रोफ़ेसर रविकांत ने यह समझाने की कोशिश की कि उन्होंने और अन्य दलित बुद्धिजीवियों/एक्टिविस्टों ने कांग्रेस का रुख़ क्यों किया। मैं इसे परिष्कृत करके एक प्रवाहमयी, निबंधात्मक शैली में सिलसिलेवार प्रस्तुत है।
भारतीय राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की रक्षा बनाम हिंदुत्व आधारित राजनीति की जंग ने पूरे देश में वैचारिक विभाजन पैदा कर दिया है। इस परिदृश्य में दलित और वंचित समुदायों के भीतर से एक नई बहस जन्म ले रही है: उनकी असली राजनीतिक दिशा क्या होनी चाहिए?
पिछले कुछ वर्षों में कई प्रमुख दलित बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट – जिनमें दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहासकार प्रोफेसर रतनलाल और लखनऊ विश्वविद्यालय के साहित्यकार प्रोफेसर रविकांत शामिल हैं – ने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण की है। यह केवल व्यक्तिगत राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और वैचारिक प्रक्रिया का हिस्सा है। सवाल उठता है कि जब दलित प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली पार्टियाँ – बसपा, लोजपा, रिपब्लिकन पार्टी या भीम आर्मी – मौजूद हैं, तब इन बुद्धिजीवियों ने कांग्रेस का रुख़ क्यों किया? यही प्रश्न इस पूरे निबंध का केंद्र है।
हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में दलित-वंचित समुदाय के भीतर एक नई हलचल देखी जा रही है। अनेक प्रतिष्ठित दलित बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता, जिनमें दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहासकार प्रो. रतनलाल और लखनऊ विश्वविद्यालय के साहित्यकार प्रो. रविकांत प्रमुख हैं, ने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण की है। यह निर्णय केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक संकेत भी देता है। सवाल उठता है कि दलित प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा), लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) या भीम आर्मी जैसी शक्तियों के रहते ये विचारक कांग्रेस की ओर क्यों मुड़े?
भारतीय राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ संविधान और लोकतंत्र की रक्षा बनाम हिंदुत्व की राजनीति का टकराव साफ दिख रहा है। यही वजह है कि दलित समाज के भीतर भी नई बेचैनी जन्म ले रही है। सवाल यह है कि जब दलितों के लिए बनी या दलितों से जुड़ी पार्टियाँ पहले से मौजूद हैं, तो क्यों अब बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट कांग्रेस का रास्ता चुन रहे हैं?
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहासकार प्रोफेसर रतनलाल और लखनऊ विश्वविद्यालय के साहित्यकार प्रोफेसर रविकांत ने कांग्रेस की सदस्यता ली। यह महज़ व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक और वैचारिक बदलाव का संकेत है। यह लेख इसी सवाल की तह तक जाने की कोशिश है।
दो ही विकल्प: एनडीए बनाम भारत गठबंधन:
प्रो. रतनलाल का मानना है कि मौजूदा समय में राजनीति के मैदान में केवल दो ध्रुव मौजूद हैं :
– एनडीए और इंडिया गठबंधन:
उनका तर्क है कि भाजपा-आरएसएस ने संवैधानिक संस्थाओं, सार्वजनिक शिक्षा और लोकतांत्रिक ढाँचे को कमजोर किया है। ऐसे समय में संविधान और लोकतंत्र पर आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति स्वाभाविक रूप से उस धड़े का साथ देगा, जो इन मूल्यों की रक्षा का दावा करता है। उनके अनुसार कांग्रेस वर्तमान में सत्ता में नहीं है, बल्कि “आंदोलन के मूड” में है; इसलिए उसमें शामिल होना अवसरवाद नहीं, बल्कि विचारधारा का चुनाव है।
दलित राजनीति की सीमाएँ:
जब उनसे पूछा गया कि मायावती, चिराग पासवान, अठावले या चंद्रशेखर जैसे नेता क्यों भाजपा के साथ खड़े दिखते हैं, तो रतनलाल ने कहा कि अक्सर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, एजेंसियों का दबाव और घोषणापत्र-विहीन राजनीति उन्हें समझौते की ओर ले जाती है। दलित राजनीति के कई दल बाबा साहेब के नाम पर राजनीति तो करते हैं, परंतु ठोस मांगें और आंदोलन नहीं उठाते। परिणामस्वरूप दलित मध्यम वर्ग, जो सरकारी शिक्षा और नौकरियों के सहारे खड़ा हुआ था, अब तेजी से खत्म हो रहा है।
प्रोफेसर रतनलाल का दृष्टिकोण: संविधान बनाम मनुस्मृति:
प्रोफेसर रतनलाल ने कांग्रेस से जुड़ने के अपने फैसले को स्पष्ट करते हुए कहा कि आज की राजनीति मूलतः संविधान बनाम मनुस्मृति की लड़ाई है। भाजपा-आरएसएस जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह हिंदू राष्ट्र और वर्णव्यवस्था पर आधारित है। यह शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है।
उनके अनुसार:
• भारत में अभी केवल दो विकल्प हैं – एनडीए या भारत गठबंधन।
• भाजपा-आरएसएस की नीतियाँ संविधान-विरोधी हैं।
• कांग्रेस वर्तमान में सत्ता में नहीं है, बल्कि आंदोलनकारी मूड में है।
• बाबा साहेब अंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि आरएसएस और हिंदू महासभा जैसी शक्तियों से समझौता संभव नहीं है।
रतनलाल मानते हैं कि जो भी व्यक्ति संविधान और लोकतंत्र में विश्वास रखता है, उसके लिए भाजपा-आरएसएस का विकल्प केवल कांग्रेस हो सकती है।
प्रोफेसर रविकांत का दृष्टिकोण: कीचड़ में उतरने की मजबूरी:
प्रो. रविकांत ने कांग्रेस में जाने के अपने निर्णय को और स्पष्ट किया। उनके अनुसार जब स्कूल बंद हो रहे हों, नौकरियाँ और फ़ेलोशिप कम हो रही हों, दलित-पिछड़े छात्रों के सपने कुचले जा रहे हों, तब तटस्थ रहना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि राजनीति को “कीचड़” कहकर बाहर रहना अब विकल्प नहीं रहा। अगर कीचड़ साफ़ करना है, तो उसमें उतरना ही पड़ेगा। उनका मानना है कि कांग्रेस, विशेषकर राहुल गांधी, संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए खुलकर लड़ रहे हैं। यह लड़ाई आज के दौर में केवल दलितों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। इसलिए बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों को इस मोर्चे पर उतरना पड़ा।
प्रोफेसर रविकांत ने कांग्रेस से जुड़ने को और भी स्पष्ट शब्दों में रखा। उनके अनुसार जब:
• स्कूल बंद हो रहे हों,
• फ़ेलोशिप और नौकरियाँ कम हो रही हों,
• दलित-पिछड़े छात्रों के सपने छीने जा रहे हों,
• आरक्षण और अधिकारों पर हमला हो रहा हो –
तो बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों का तटस्थ रहना अपराध है। राजनीति को “कीचड़” कहकर बाहर खड़े रहना अब संभव नहीं। अगर कीचड़ साफ़ करना है, तो उसमें उतरना ही होगा। उनका कहना है कि आज केवल राहुल गांधी और कांग्रेस ही खुलकर संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसलिए दलितों का स्वाभाविक कर्तव्य है कि वे इस मोर्चे पर खड़े हों।
दलित राजनीति का सफर: अंबेडकर से मायावती तक:
भारत में दलित राजनीति की नींव डॉ. भीमराव अंबेडकर ने रखी। उन्होंने सिर्फ़ सामाजिक सुधार की नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति की भी ज़रूरत बताई। आज़ादी के बाद शुरुआती दशकों तक दलितों की आवाज़ कांग्रेस में ही दबे-सधे अंदाज़ में सुनी जाती रही। लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेस पर “ऊँची जातियों की पार्टी” होने का ठप्पा लग गया।
1980-90 के दशक में कांशीराम और मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने दलित राजनीति को स्वतंत्र पहचान दी। “बहुजन ही सर्वजन” का नारा चल पड़ा। उत्तर प्रदेश में बसपा सत्ता तक पहुँची और दलित समाज ने पहली बार अपनी ताक़त महसूस की। बिहार में रामविलास पासवान और महाराष्ट्र में दलित पैंथर आंदोलन ने इस राजनीति को और धार दी।
मगर 21वीं सदी आते-आते तस्वीर बदलने लगी। परिवारवाद, अवसरवाद और सत्ता की राजनीति में डूबकर दलित पार्टियाँ कमजोर होती गईं। बसपा हाशिए पर पहुँची, लोजपा कई टुकड़ों में बँटी और पैंथर जैसी आंदोलनों की चमक फीकी पड़ गई। इस खाली जगह को भाजपा ने “सबका साथ, सबका विकास” के नारे से भरा, पर उसकी नीतियाँ दलितों के लिए अवसर कम करने वाली साबित हुईं।
दलित राजनीति का मौजूदा संकट:
आज की स्थिति यह है कि दलित मतदाता खुद को विकल्पहीन पा रहा है।
• बसपा उत्तर प्रदेश में लगातार कमजोर हो रही है।
• लोजपा पासवान के निधन के बाद गुटबाज़ी में बँट गई।
• रिपब्लिकन पार्टी सत्ता की राजनीति में खो गई।
• भीम आर्मी/आजाद समाज पार्टी की पहुँच अभी सीमित है।
नतीजा यह हुआ कि दलित समाज की मुख्य चिंताएँ – शिक्षा, रोज़गार, आरक्षण – अब बड़े मंचों पर उठ ही नहीं पा रहीं।
मौजूदा परिदृश्य: विकल्पहीन दलित राजनीति:
आज के समय में दलित राजनीति एक विचित्र संकट से गुजर रही है:
1. बसपा का पतन: मायावती की पार्टी उत्तर प्रदेश तक सिमटकर रह गई है और वहाँ भी उसकी पकड़ लगातार ढीली हो रही है। आंदोलनकारी ऊर्जा और वैचारिक स्पष्टता का अभाव है।
2. लोजपा का विखंडन: रामविलास पासवान के निधन के बाद लोजपा कई गुटों में बँट गई और भाजपा की परछाईं में सिमट गई।
3. अठावले और सहयोगी दल: महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी जैसे दल सत्ता में साझेदारी तो करते हैं, परंतु उनका एजेंडा हाशिए पर है।
4. चंद्रशेखर आज़ाद की चुनौती: भीम आर्मी और आज़ाद समाज पार्टी ने शुरुआती दिनों में जोश दिखाया, परंतु राष्ट्रीय स्तर पर अभी उनकी पकड़ सीमित है।
इस परिदृश्य में दलित समाज और विशेषकर उसका मध्यम वर्ग विकल्पहीनता का सामना कर रहा है।
सामाजिक न्याय का नया विमर्श:
दलित बुद्धिजीवी इस समय कांग्रेस में इसलिए जा रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कांग्रेस ही भाजपा के वर्चस्व को चुनौती दे सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि सामाजिक न्याय की राजनीति अब केवल “दलित पार्टियों” तक सीमित नहीं रह सकती।
· सामाजिक न्याय का नया विमर्श संविधान बचाने के प्रश्न से जुड़ चुका है।
· यह केवल आरक्षण या प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संस्थाओं के अस्तित्व का सवाल है।
इस विमर्श में दलित, पिछड़े, आदिवासी, महिलाएँ और अल्पसंख्यक – सभी स्वाभाविक साझेदार हैं।
दलित नेताओं की चुप्पी और समझौते:
रतनलाल और रविकांत दोनों का मानना है कि मायावती, चिराग पासवान, रामदास अठावले जैसे नेताओं ने या तो समझौता कर लिया है या दबाव में हैं। वे आंदोलनकारी एजेंडा उठाने से कतराते हैं। यही वजह है कि दलित समाज को ठोस दिशा नहीं मिल रही। दलित राजनीति का बड़ा हिस्सा अब केवल सत्ता-साझेदारी और पद पाने की राजनीति तक सिमट गया है। लेकिन जनता के असली मुद्दे – शिक्षा, रोजगार, आरक्षण, सामाजिक न्याय – कहीं पीछे छूट गए हैं।
कांग्रेस का अतीत और दलित प्रश्न:
सवाल यह भी उठता है कि कांग्रेस का दलितों के प्रति रिकॉर्ड कैसा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस ने अतीत में कई भूलें की हैं। दलित नेतृत्व को पर्याप्त जगह नहीं दी गई, आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिली। लेकिन कांग्रेस की एक विशेषता यह रही है कि उसने समय-समय पर अपनी गलतियों से सीखा है। आज़ादी के आंदोलन से लेकर नेहरू के दौर और इंदिरा गांधी के दौर तक यह प्रवृत्ति दिखती है। राहुल गांधी ने भी खुलकर स्वीकार किया है कि पिछली सरकारों ने दलितों और वंचितों के लिए पर्याप्त काम नहीं किया। इस स्वीकारोक्ति से उम्मीद बंधती है कि कांग्रेस में आत्म-सुधार की गुंजाइश है।
दलित राजनीति का नया विमर्श: संविधान की रक्षा:
दलित बुद्धिजीवियों का कांग्रेस की ओर जाना केवल “पार्टी बदलने” का मामला नहीं है। यह संकेत है कि अब दलित राजनीति का केंद्र बदल रहा है। यह केवल आरक्षण या प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं रह गया, बल्कि पूरा विमर्श संविधान और लोकतंत्र की रक्षा पर आ गया है। इस विमर्श में: सामाजिक न्याय की राजनीति अब केवल जातीय पहचान तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक लोकतांत्रिक संघर्ष का हिस्सा है।
अन्य दलित नेताओं से निराशा:
जब उर्मिलेश ने सवाल उठाया कि मायावती, चिराग, अठावले या चंद्रशेखर जैसे नेता क्यों वही खतरे नहीं देख पा रहे, तो रविकांत का उत्तर था – “उन्हें समझ नहीं आया या उन्होंने समझौता कर लिया।” उन्होंने आरोप लगाया कि कई दलित नेता सत्ता या निजी फायदे की राजनीति में उलझ गए हैं और समाज के असली मुद्दे – शिक्षा, रोज़गार, आरक्षण, भूमि सुधार – उठाने से कतराते हैं।
कांग्रेस की पिछली गलतियों पर सवाल:
यह भी पूछा गया कि कांग्रेस का दलितों के प्रति पिछला रिकॉर्ड मिश्रित रहा है। रविकांत ने माना कि कांग्रेस ने कई भूलें की हैं, लेकिन साथ ही उसमें आत्म-सुधार की क्षमता है। नेहरू से लेकर आज तक पार्टी ने समय-समय पर अपनी गलतियों को स्वीकार किया और बदला है। राहुल गांधी भी खुलेआम स्वीकार करते हैं कि पिछली सरकारें दलितों और वंचितों के लिए पर्याप्त नहीं कर सकीं। यही स्वीकारोक्ति और परिवर्तन की गुंजाइश उन्हें प्रगतिशील बनाती है।
निष्कर्षत: स्पष्ट है कि दलित बुद्धिजीवियों का कांग्रेस की ओर झुकाव किसी व्यक्तिगत लाभ या पद की राजनीति से प्रेरित नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक-राजनीतिक चिंताओं से जुड़ा है।
• एक ओर भाजपा-आरएसएस के नेतृत्व में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर संकट और संविधान पर हमला दिखाई देता है।
• दूसरी ओर बसपा, लोजपा या अन्य दलित पार्टियों में आंदोलनकारी ऊर्जा और वैचारिक स्पष्टता का अभाव है।
• इस शून्य के बीच कांग्रेस, खासकर राहुल गांधी, संविधान की रक्षा और सामाजिक न्याय का एजेंडा लेकर सामने आ रहे हैं।
इसलिए प्रो. रतनलाल और प्रो. रविकांत जैसे बुद्धिजीवी मानते हैं कि मौजूदा दौर में दलितों और वंचितों की आवाज़ को कांग्रेस के मंच से ही प्रभावी ढंग से उठाया जा सकता है।
कांग्रेस के लिए अवसर और चुनौतियाँ:
दलित बुद्धिजीवियों का कांग्रेस से जुड़ना पार्टी के लिए अवसर भी है और चुनौती भी।
अवसर:
· दलित मतदाताओं का विश्वास जीतने का मौका।
· प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के माध्यम से वैचारिक मजबूती।
· भाजपा के खिलाफ़ व्यापक गठबंधन का निर्माण।
चुनौतियाँ:
· दलित नेतृत्व को वास्तविक, निर्णयकारी भूमिका देना।
· ठोस नीतिगत एजेंडा बनाना – शिक्षा, रोजगार, आरक्षण, विशेष घटक योजनाएँ।
· पार्टी ढाँचे में अंबेडकरवादी दृष्टि को शामिल करना।
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भविष्य की दिशा:
यदि कांग्रेस इस अवसर को भुना पाती है तो:
पिछली भूलों से सचमुच सीखे और सत्ता में आने पर ठोस कदम उठाए।
· उसे दलित वोट बैंक ही नहीं, बल्कि व्यापक बहुजन-संविधानवादी गठजोड़ भी मिल सकता है।
· यह गठजोड़ भाजपा-आरएसएस की “मनुस्मृति आधारित राजनीति” को सबसे मजबूत चुनौती देगा।





