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75 बरस बाद भी दलित समाज की प्रतिभाएं अलग-थलग ही क्‍यों पड़ी हुई

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मोहनदास नैमिशराय

दलित इतिहास, संस्कृति, साहित्य और अस्मिता के संदर्भ में आज भी बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर शिद्दत के साथ क्यों याद किए जाते हैं? क्यों वे दलित साहित्य और आंदोलन के इतिहास के ग्रंथों के पृष्ठों पर विशेष रूप से पढ़े-लिखे जाते हैं? क्यों दलित साहित्यकारों के लिए प्रेरक हैं? इन सबका मुख्य कारण है, आंबेडकर ने पढ़ने-लिखने, अध्ययन करने पर जितना ध्यान दिया, उतना दुनिया के कम ही महापुरुषों ने दिया होगा। उन्होंने समाज को पहले गहराई से जाना और महसूस किया, फिर समाज बदलने पर विचार किया। मैं अगर कहूं कि आंबेडकर ने जितना पढ़ा और लिखा, उतना उनके बाद के सभी दलित राजनीतिज्ञों ने मिलकर भी नहीं पढ़ा-लिखा होगा तो गलत नहीं होगा।

आखिर आजाद भारत में पैदा हुए दलित नेताओं के भीतर वैसी भूख और बेचैनी क्यों नहीं पैदा हुई? साहित्य और संस्कृति के प्रति उन्हें लगाव क्यों नहीं हुआ? यहां तक कि दलित लेखकों से वे दूरी क्यों बनाए रखे? क्यों नहीं उन्होंने उनके बीच जाकर शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता के महत्वपूर्ण सवालों पर विचार किया? सवाल यह भी है आखिर कितने दलित नेताओं ने मंत्री और मुख्यमंत्री बनने के बाद पीछे मुड़कर देखा। इतिहास और राजनीति के हर मोड़ पर ऐसे तथाकथित आंबेडकरवादी जरूर मिलेंगे, जो आंबेडकर जैसा बनने की चाह में आंबेडकर के खिलाफ ही अपनी-अपनी राजनीतिक यात्रा पूरी करते नजर आते हैं। हालांकि कुछ ने समाज के हित में प्रयास भी किए। कुछ ने साहित्य और साहित्यकारों से रिश्ते भी बनाए, पुस्तकें भी लिखीं और पत्र-पत्रिकाओं का संपादन/प्रकाशन तक किया। लेकिन हजारों की संख्या में शेष दलित नेताओं ने क्या किया?

सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक न सिर्फ इतिहास को संग्रहालयों में जाकर जांच-पड़ताल करने, बल्कि सनातनी राजनीति और राजनीतिज्ञों के खिलाफ विद्रोह करने का भी रहा है। उस दौर में जयप्रकाश नारायण, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडिस, सुरेंद्र मोहन, शरद यादव, स्वामी अग्निवेश, शरद पवार और बाबा अढ़ाव जैसे सवर्ण समुदायों से आने वाले नेता भी दलित सवालों पर कह, सुन और लिख रहे थे। दूसरी तरफ उनके साथ या उनसे इतर दलित नेताओं में बाबू जगजीवनराम, बी.पी. मौर्य, कांशीराम, रामविलास पासवान, कर्पूरी ठाकुर, भोला पासवान शास्त्री, जगदेव प्रसाद, प्रो. योगेंद्र कवाड़े, आर.डी. भंडारे, आर.एस. गवई, माता प्रसाद, चांद राम आदि भी संसद और विधानसभाओं में दलित समस्याओं पर जोरदार तरीके से अपनी बात रख रहे थे।

उस दौर में रामविलास पासवान तो मुखर दलित नेता थे। वह ‘न्यायचक्र’ हिंदी मासिक के संपादक भी थे। साथियों से मिलने में उन्हें कोई गुरेज नहीं थी। पढ़ते-लिखते भी थे। उनसे भी कहीं आगे कांशीराम थे, जिन्होंने ‘चमचा’ नाम से किताब भी लिखी। वह पहली ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने लगभग दस भाषाओं में पत्र-पत्रिकाओं का संपादन और प्रकाशन किया था। यही नहीं उन्होंने दलित कवियों, लेखकों, नाट्यकारों की मदद से जन-जागरण जत्था भी बनाया था। बी.पी. मौर्य इस क्षेत्र में कुछ नहीं कर सके, सिवाय सत्ता के साथ अपने संबंध बनाने के। माता प्रसाद साहित्य संबंधी मामले में अपवाद रहे। शाहगंज (उ.प्र.) विधानसभा क्षेत्र से 1957 से 1974 तक पांच बार विधायक और 1980 से 1992 तक दो बार विधानपरिषद के सदस्य रहे। 1993 से 1999 तक वह अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे। दलित साहित्यकारों से उन्होंने गहरे संबंध रखे। ‘झोपड़ी से राजभवन’ आत्मकथा के साथ तीस से अधिक किताबें उनकी प्रकाशित हुईं। कुछ वर्ष पूर्व से दिल्ली सरकार में समाज कल्याण मंत्री होने के नाते राजेंद्रपाल गौतम ने भी दलित साहित्यकारों और पत्रकारों से रिश्ते बनाने के प्रयास किए हैं। उन्होंने बहुजन महापुरुषों पर पुस्तकें भी प्रकाशित कराई हैं, जो निश्चित ही महत्वपूर्ण कार्य है।

जहां तक बाबू जगजीवनराम की पढ़ने-लिखने में रुचि रखने और दलित साहित्यकारों से मिलने-जुलने की बात है, वह इस बारे में सजग थे। समाज के लोगों से मिलते-जुलते भी थे और दलित ही नहीं सवर्ण लेखकों तथा पत्रकारों को भी घर पर (कृष्ण मेनन मार्ग) बुलाते थे। विशेष रूप से दलित साहित्य अकादमी के साथियों को भोजन पर आमंत्रित करते थे। वह स्वयं भोजन परोसते थे। विशेष रूप से संत रविदास से प्रभावित थे। काशी में रविदास स्मारक, राजघाट के अंतर्गत रविदास अकैडमी की स्थापना उन्होंने कराई थी। इसके अलावा अपने पिता के नाम पर शोभीराम संत साहित्य शोध संस्थान का गठन भी उन्होंने किया था। बाबूजी ने अंग्रेजी और हिंदी में किताब लिखी- Caste Challenge in India तथा भारत में जातिवाद और हरिजन समस्या।

उनका एक और अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य था लिंक रोड (करोल बाग) पर बाबू जगजीवन विद्या भवन बनाना। एक शानदार इमारत, जिसमें लगभग पचास कमरों के साथ सभागृह और लायब्रेरी थी। उद्देश्य था दलित समाज के विद्यार्थियों को आईएएस की परीक्षा हेतु तैयारी कराना। लेकिन बाद के दौर में मीरा कुमार की उदासीनता और कुछ राजनीतिक हुड़दंगियों के कारण उनका यह सपना अधूरा ही रह गया।

कांशीराम की विरासत के साथ भी ऐसा ही हुआ। हिंदी के साथ अन्य भाषाओं में जो दस पत्र-पत्रिकाएं शुरू हुई थीं, एक-एक कर बंद हो गईं। प्रेस लगाकर बहुजन मीडिया की स्थापना करने का जो कांशीराम का सपना था, वह भी पूरा नहीं हुआ। सत्ता के सिंहासन पर पहुंचने के बाद मायावती ने न साहित्यकारों की ओर ध्यान दिया और न बहुजन मीडिया बनाने के लिए कुछ किया। वैसे तो मीरा कुमार भी बहुत कुछ कर सकती थीं, जब वह केंद्र में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थीं। क्या किया उन्होंने? न किसी दलित साहित्यकार को पुरस्कार दिलाया और न किसी को फेलोशिप, जबकि इन सबका प्रावधान उनके मंत्रालय में था।

कहना न होगा कि आजादी के 75 बरस बाद भी दलित समाज की प्रतिभाएं अलग-थलग ही पड़ी हुई हैं। क्या दोष सिर्फ सवर्ण साहित्य मठाधीशों को दें? क्या दलित मंत्रियों की कोई जिम्मेदारी नहीं थी? क्या उनका उद्देश्य सिर्फ सत्ता तक पहुंचना था? आखिर क्यों उन्होंने अपने ही समाज की प्रतिभाओं की अनदेखी की? क्या वे अपनी अंतिम यात्रा पर जाने से पहले इसके लिए पश्चाताप करने की हिम्मत जुटा पाएंगे?

Ramswaroop Mantri

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