अग्नि आलोक
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*मिथ्या फड़फड़ाहट क्यों?*

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अब टूट गया
अहम का वहम
तुम तो कहते थे
सब कुछ मैं ही हूं।

मेरे इशारे पर ही
सब चलता है
मैं न चाहूं तो
यहां पत्ता भी न हिलता है

क्या ?
अब भी कोई
पूछता मांगता है?
शायद नहीं
क्योंकि जिद्दी व्यक्तित्व
हर किसी को रास नहीं आता है।

बीत गया न वक्त
चली गई न सत्ता
आहत कर रहे है न अपने
क्या अब भी बचा है
अहम का वहम ?डॉ.राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)
(हिंदी अध्यापक)
पता-गांव जनयानकड़
पिन कोड -176038
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
rajivdogra1@gmail.com

Ramswaroop Mantri

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