प्रखर अरोड़ा
_गाँवों- देहातों के विषय में लिखे जाने वाले मेरे लेख से अधिकांश लोग असहमत रहते हैं। इन अधिकांश ने किताबी कपोल-कल्पना में मसगूल होकर पाश्चात्य की उड़ान में बहकर गांव देहातों को जाना है। वावज़ूद इसके की ये अधिकांश लोग ऐसे गांवों में पले बढ़े, जहां परस्पर सहयोगी होना तो दूर, एक दूसरे के खून के प्यासे रहते थे।_
मेरे बचपन का सच यह है की गांव का हर परिवार अपने पड़ोसी को पाकिस्तानी या चाइनीज मानकर हथियार ताने बैठा रहता था। जिसे अवसर मिलता, वही पड़ोसी को टपका देता था। चमारों की दुर्गति तो अलग थी ही ; यादवों – राजपूतों की दुश्मनी भी अनंत थी.
मेरे जैसे लोग ऐसे गांवों में पले बढ़े, जहां गांव के लोग पड़ोसी के साथ कोर्ट कचहरी में उलझे रहते थे। इसीलिए पढ़ लिखकर शहर भाग गए सुकून की जिंदगी जीने के लिए। और अब गांव तब तक नहीं लौटना चाहते, जब गांव भी शहर ना बन जाए और शहरियों की तरह प्रेम और भाईचारे से ना रहने लगें।
लड़ाकू, खूंखार, द्वेष व घृणा से भरे अपराधी प्रवृति के ग्रामीणों वाला गांव ही सर्वत्र मुझे देखने मिला है बचपन में. मेरा गांव तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं था, जैसा कि ये कथित पढ़े लिखे लोग बता रहे हैं.
जैसे गाँव की बात साहित्य में की जाति है, वैसा गाँव कभी था ही नहीं। ऐसे गाँव केवल कल्पनाओं और परिकथाओं में ही मिलते हैं।
प्रश्न उठता है कि पढ़ने लिखने का लाभ क्या हुआ?
आज अधिकांश गांवों में अधिकांश लोग पढे-लिखे हैं और कई गाँव तो ऐसे भी हैं, जहां से आईएएस, आईपीएस लेवल के अधिकारी निकलते हैं। फिर भी वह गाँव सभ्य, परस्पर सहयोगी क्यों नहीं हो पाया आज तक?
क्यों आज तक गाँव के लोग पशुओं से भी गए गुजरे प्राणियों की तरह जी रहे हैं?
शहरों के आने के बाद ही लोगों ने सभ्य तरीके से जीना सीखा, प्रेम और सद्भाव से परिचित हुए, उससे पहले सभी लोग परपर लड़ते मरते रहते थे।
जब आज तक गाँव के लोग आपस में लड़-मर रहे हैं, तो राम राज्य, कृष्ण राज्य में भी यही कर रहे होंगे?
यानि भारतीय इतिहास में ऐसे गाँव कहीं था ही नहीं जहां परस्पर प्रेम और सौहार्द था। जहां के लोग आपस में मिलजुल कर रहते थे, एक दूसरे के सुख-दुख में काम आते थे.
इधर सरकारें गाँव की भूमि हथिया रही है, आदिवासियों को जंगलों से खदेड़ कर जंगलों को अदानी, अंबानी को बेच रही है, ताकि वहाँ नए कारखाने और शहर बसाये जाएँ. तो क्या ये गलत नहीं कर रही ?
कहीं यही तो कारण नहीं है कि ये ग्रामीण लोग गांवों, आदिवासियों, खेतों और वनों के उजड़ने से दु:खी नहीं हैं?





