सब अपने साथी लोग थे
जिन्हें झपट्टा मारकर
अचानक उठा लिया गया
हमारे बीच से
यह सिलसिला अभी थमा नहीं है
कल ही ले गये वो रूपेश को
तीन साल के भीतर दुबारा
हत्यारी परछाईं नाच रही है
हर एक के सिर पर
कोई यह न समझे
कि उसकी बारी नहीं आएगी
ले जाएंगे वो
किसी को कविता
लिखने के ज़ुर्म में तो किसी को
सवाल पूछने के ज़ुर्म में
कोई शिक्षक होगा इसलिए
तो किसी को इसलिए कि वह
सिर झुकाता नहीं ज़ुल्म के सामने
बचेंगे वे भी नहीं
जो खुश हैं
अपने चुप रहने पर
यह रोज हमारे अकेले होते जाने का समय है
यह रोज उनके और भी
नृशंस होते जाने का समय है
यह खुद को बचाने की लड़ाई नहीं है
फासिस्ट से सीधा मुठभेड़ है यह
हर बार गुरिल्ला युद्ध
काम नहीं आता
क्या है हमारे पास फिर
सिवाय शब्दों के
और शब्द भी क्या है आखिर
जबतक कि हम उसे जीयें नहीं जी भर
फासिस्ट सबसे ज़्यादा
इन्हीं शब्दों से डरता है
जिन्हें जीया जाता है
वह जानता है
एक दिन इन्हीं शब्दों के नीचे
दबकर मरेगा वह.
– रंजीत वर्मा,
संकलन -निर्मल कुमार शर्मा गाजियाबाद उप्र संपर्क -9910629632





