अग्नि आलोक
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4 कविताएं (मैं मासूम / चल पड़ी हूँ एक सफ़र पर / सुनो कोई आवाज़ / मिलकर बचपन से)

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मैं मासूम

निर्मला टाक
लूणकरणसर, राजस्थान

मैं मासूम सी भली,
जिंदगी में चली,
बढ़ना है आगे,पानी हैं मंज़िलें,
पूरी करनी है ख्वाहिशें,
सूरज की उजली किरणों सी,
बिखर जाऊंगी चारों ओर,
हां बिखर ही तो गई हूं,
न समेट सकी अपनी किरचन,
चुभ रही हूं खुद में ही में,
आग जली है खुद में ही,
हौसला बढ़ा खुद में ही,
लड़ना है मुझे खुद से ही,
आगे बढ़ना है मुझे खुद से

दुनिया को जीतना है मुझे खुद से।।

चल पड़ी हूँ एक सफ़र पर

तमन्ना बानो
लूणकरणसर, राजस्थान

चल पड़ी हूँ एक सफ़र पर,
ना मंजिल का ठिकाना है,
राह में कांटे भी होंगे,
पर हौसला बड़ा सुहाना है,
हर मोड़ कुछ सिखाता है,
हर राह एक कहानी है,
चलते रहो तो पाओगे,
जगह जगह रवानी है,
थकान आएगी राहों में,
पर रुकना माना है यहाँ,
सपनों को सच करने का,
बस एक ही ज़रिया है चलना,
हर यात्रा कुछ दे जाती है,
यादों की गहराई बन जाती है,
मंजिल से प्यारी होती है राह,

ये ज़िन्दगी सीखा जाती है।।

सुनो कोई आवाज़

निधि टाक
लूणकरणसर, राजस्थान

आवाज सुनो कोई,
मैं भी कहना चाहती हूं,
नहीं चुप रहना चाहती हूं,
है बहुत सी ख्वाहिशें मेरी,
उसे पूरा करना चाहती हूं,
समाज ने चुप करवाया है मुझे,
तू क्या करेगी ये बोल कर,
तू क्या करेगी ये सोच कर,
ये सब तेरा काम नहीं,
तू बस घर को संभाल,
और तेरा कोई नाम नहीं,
किसने ये तय किया है?
किसने ये नियम बनाया है?
मैं भी अपने मन की करूंगी,
अब ना मैं चुप रहूंगी,
आवाज सुनो कोई,

मैं भी कुछ कहना चाहती हूं।।

मिलकर बचपन से

कविता शर्मा
बीकानेर, राजस्थान

दिन की शुरुआत में मानो,
सूरज ने मन चंचल बना दिया हो,
बिस्तर से उठते ही किसी ने,
कोई कड़वी सजा दिया हो,
दादी के चश्मे के नीचे से,
दादा की लाठी से गिर के,
बुआ की चोटी से लटके,
पापा के कंधों पर जा बैठे,
भागे भागे इस दुनिया के,
इस छोर से आखरी छोर तक,
ना कोई बंधन पकड़ के बांध सके,
न किसी के जाल में फंस सके,
दुनिया से कोसो कहीं दूर,
हवाओं के भाव में लहराते,
माँ के आँचल में छिप जाते,
लोरी की गुनगुन में बस गुम हो जाते,
लेकिन समय के फेर ने जगा दिया,
नन्हे हाथों पर जिम्मेदारी का बोझ थमा दिया,
दुनिया बनाने वाले तुझे दर्द मैं क्या सुनाऊं?
दिल करता है दूर कहीं निकल जाऊं,
या फिर वापस अपने बचपन में लौट जाउं।।

Ramswaroop Mantri

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