
डॉ. सुभाष खंडेलवाल
23 मार्च डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्म दिवस है। उन्होंने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया, वो इसे राजा-महाराजाओं की परम्परा मानते रहे। आज के दौर में जब देश में सबसे बड़ा संकट नेताओं की विश्वसनीयता का टूटना हो गया हो। सभी राजनीतिक दल कर्कश्ता के शिकार हो रहे हों। तब उनके जन्मदिन पर लिखना राजा-महाराजाओं की परम्परा की पुनर्रावृत्ति नहीं वरन् आजादी के पहले देश की आजादी के लिए और आजादी के बाद देश के लोकतंत्र के लिए लगातार संघर्ष करने वाले सेनानी को उसके जाने के करीब ५० बरस बाद शिद्दत से याद करना है।
23 मार्च शहीद भगतसिंह का बलिदान दिवस भी है। दो महान इंसानों के जन्म और मृत्यु का ऐसा मिलन दुनिया के इतिहास में मिलना मुश्किल है। एक को जन्मदिन मनाना कबूल नहीं, क्योंकि देश के करोड़ों लोगों को आज भी अपना जन्मदिन मालूम नहीं है। दूसरे को जन्म के बाद मृत्यु का भय नहीं।
महाभारत में यक्ष प्रश्न है कि दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? उत्तर है मृत्यु। आदमी रोज अपने आस-पास मृत्यु देखता है, लेकिन उसे नकारता है। भगतसिंह ने मृत्यु को हंसते-हंसते स्वीकार किया। उसी तरह से डॉ. लोहिया ने ता-उम्र हंसते-हंसते जुल्मो-अन्याय के विरुद्ध लड़ते हुए मरना स्वीकार किया।
एक नौजवान जिसकी उम्र 22 वर्ष है। जर्मनी से अर्थशास्त्र में पीएचडी कर मद्रास बंदरगाह पर जहाज से उतरता है। वह पीएचडी इंग्लैंड से नहीं करता है, क्योंकि अंग्रेजों ने सबको गुलाम बना रखा है। उनसे सीखने जाना उसे अच्छा नहीं लगता है। इसलिए वो जर्मनी जाता है जर्मन भाषा सिखता है। उसके पिता हीरालाल लोहिया एक आम इंसान हैं। जर्मनी से पढ़कर लौटने पर उसकी जेब खाली है। वो बंदरगाह से सीधे हिन्दू अखबार के दफ्तर जाता है, एक लेख लिखता है। आगे जाने के लिए पैसे लेता है और आगे बढ़ जाता है। पैसे से उस इंसान का रिश्ता ताउम्र ऐसा ही रहा।
उन्होंने अपने लिए कभी ना कुछ चाहा, ना मांगा। बस इतना ही मांगा कि हे भारत माता मुझे राम की मर्यादा, कृष्ण का हृदय और शिव सा मस्तिष्क दे। राम ने सदैव त्याग किया, लेकिन मर्यादा नहीं तोड़ी। कृष्ण का विशाल हृदय था, वे सारथी रहे, कभी राजा नहीं बने। शिव के माथे पर गंगा है। शिव जैसा मस्तिष्क अर्थात मस्तिष्क ठंडा रहे। कृष्ण जैसा हृदय जिसमें आग हो लेकिन प्रेम के साथ। लोहिया ने भारत के समाजवादियों से कहा था- मस्तिष्क में ठंडक और दिल में गर्मी लाए। तभी परिवर्तन सम्भव है।
समाजवाद का मतलब है- सुन्दर से सुंदरतम्। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो डॉ. लोहिया की मूर्ति, फोटो लगाने या उनका नाम लेने से नहीं आती है। वरन् कहीं भी जुल्म अन्याय दिखे, लोकतंत्र पर खतरा दिखे, कहीं भी भेदभाव दिखे और उस पर प्रतिकार दिखे, समझ लीजिए यह लोहिया है। यह उनके समाजवादी आंदोलन के संघर्ष का परिणाम है। समाजवाद और समाजवादियों पर सदैव प्रश्न उठते हैं। समाजवादी खत्म हो गए, बड़ा दुख मनाया जाता है। प्रश्न उठना भी चाहिए उनकी गलतीयां भी हो सकती है लेकिन समाजवाद कोई फूड इंडस्ट्री नहीं है, कपड़े की दुकान नहीं है, आईएएस की नौकरी नहीं है। न ही ऐसा संगठन है, जो सिर्फ लाभ देखता है और बढ़ता है, हानि होती है और घुटने टेक देता है। समाजवादियों ने जब रास्ता संघर्ष का, लड़ने का, जेल जाने का चुना, सत्ता को उसका साधन माना साध्य नहीं, तब दुख किस बात का?
सन् 1957 में केरल में देश की पहली कम्युनिस्ट सोशलिस्ट सरकार बनी थी। एक आंदोलन में मजदूर गोली से मार दिए गए। डॉ. लोहिया जेल में थे उन्होंने वहीं से मुख्यमंत्री थानुपिल्ले से इस्तीफा मांगा, जिससे पार्टी टूट गई और सरकार गिर गई। सोशलिस्ट पार्टी दो हिस्सों में बंट गई संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी।
डॉ. लोहिया की सप्तक्रांति ने इस सोये देश को हिलाया, जगाया। आजकल तो टी.वी. है, मीडिया और सोशल मीडिया ने तेज रफ्तार पकड़ ली है। कन्हैयाकुमार एक दिन में हीरो बन जाते हैं। डॉ. लोहिया के दौर में हजारों कन्हैयाकुमार ना मालूम कितनी बार पीटते रहे, सिर फुटवाते रहे, खून बहाते रहे, जेल जाते रहे और किन्तु अखबारों ने कोने में भी जगह नहीं दी। माओ ने कहा था कि जिसका विचार ठहर गया उसकी रक्षा ऐसी करो, जैसे पलक आंखों की पुतली की करती है। दुर्भाग्य देश सदैव इसका उलटा करता रहा।
आजादी के पहले डॉ. लोहिया अंग्रेजों से लड़कर अनेकों बार जेल गए। आजाद होने पर नेहरू की मंत्री परिषद् को त्यागकर प्रतिपक्ष का रास्ता चुनकर नए भारत के लिए संघर्ष शुरू किया। सत्ता उसे हासिल करने का औजार मात्र था। उनके साथ जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, आचार्य कृपलानी, एसएम जोशी, मुधलिमये, एन.जी. गोरे,अशोक मेहता जैसे सैकड़ों-हजारों लोग थे।
भारत दो हजार वर्षों तक, उसमें भी २०० वर्ष अंग्रेजों का गुलाम रहा। जिसने देश के तन-मन को बीमार बना दिया। इंसान सीधे खड़े होने में भी डरता रहा। राजा-महाराजा को पीठ दिखाना अपराध था। जाति का कटघरा था। ठाकुर, ब्राह्मण के कुएं पर छोटी जात वाले का पानी पीना अपराध था। उसके घर के सामने से सीधे निकलना गुनाह था। देश कृष्ण का था और कृष्ण काले थे और प्यार गोरे रंग से करने लगे थे। धर्म सनातन था और ना मालूम कितने अनगिनत हिस्सों में बंटकर मानव धर्म भूल चुका था।
जहां पर बड़े को चाटना और छोटे को काटना एक जड़ परम्परा बनकर जिन्दगी के हर हिस्से में काबिज हो चुकी थी। वहां पर सोए देश को जगाना मरने का काम था। डॉ. लोहिया ने यह कठिन रास्ता चुना जिसकी पीड़ा देश में ही नहीं विदेशों में भी सही। अमेरिका में जब वे एक होटल में गए तो वहां पर काले रंग वाले का वह भी भारतीय वेषभूषा वाले का प्रवेश निषेध था। उन्होंने वहीं पर सत्याग्रह कर पूरी दुनिया को जगाने का काम किया।
लोहिया ने कहा था कि मैं आजादी के पहले के नेहरू को सलाम करता हूँ। लेकिन आजादी के पहले के नेहरू को वो अपना हीरो मानते थे। लेकिन आजादी के बाद वो उन्हें खलनायक मानते थे। देश नेहरू के आभा मंडल में वैâद था। डॉ. लोहिया की पार्टी १९५२, ५७, ६२ में लगातार हारती रही। जयप्रकाश नारायण सहित कई लोग सोशलिस्ट पार्टी छोड़ सर्वोदय में चले गए। डॉ. लोहिया का मजाक उड़ाया जाता था। लेकिन देशभर में उनके चाहने वालों की फौज तैयार होने लगी थी। उन्होंने भाषण दिए, पुस्तकें लिखी, उनमें से एक थी सरकारी मठी और कुजात गांधीवादी। सरकारी का मतलब नेहरू और कांग्रेस था, मठी का मतलब जयप्रकाश नारायण और सर्वोदय था और कुजात गांधीवादी का मतलब लोहिया और उनके साथी थे।
राजीव गांधी नगर निगमों, नगर पालिकाओं और पंचायतों में जो विधेयक लाए थे, वो डॉ. लोहिया के पंचायती राज की परिकल्पना का साकार होना है। डॉ. लोहिया के सहयोगी मधुलिमये, कर्पुरी ठाकुर, राजनारायण और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे लोग थे। मधुलिमये ने गोवा मुक्ति संग्राम में डॉ. लोहिया का साथ देकर जेल यात्रा भी की। लोकसभा में डॉ. लोहिया के बाद उन्होंने उनकी परम्पराओं को गति दी। राजीव गांधी के पास में यह विचार उनके माध्यम से ही पहुंचा था। जिससे देश भर में महिला, दलितों, पिछड़ों को आरक्षण मिला। ग्वालियर और उज्जैन की मेयर मेहतरानी बनी। जो सामान्य तरीके से अगले सैकड़ों साल संभव नहीं था। डॉ. लोहिया ने १९५७ में ग्वालियर में विजयराजे सिंधिया के विरुद्ध मेहतरानी सुखो रानी को चुनाव लड़वाकर महारानी विरुद्ध मेहतरानी का नारा देकर देश के मरे मन को जिंदा करने का प्रयास किया था।
डॉ. लोहिया ने चुनाव जीतने के लिए कभी समझौता नहीं किया। एक आम-सभा में जो मुस्लिम बाहुल्य इलाके में थी उनसे जानबुझकर प्रश्न पूछा गया कि क्या आप मुस्लिमों के चार विवाह के पक्ष में हैं, उनका उत्तर था नहीं। लोहिया ने मुसलमानों को कहा कि राम कृष्ण हमारे पुरखे हैं, वहीं हिन्दुओं से कहा कि रहीम, रसखान भी सबके पुरखे हैं। यह सबको समझना होगा। उन्होंने कहा था जिंदा दिल कौम पांच साल इंतजार नहीं करती। सन् १९६२ में वे प्रधानमंत्री नेहरू के सामने फुलपुर से लोकसभा का चुनाव लड़े थे। नेहरु ने कहा था मैं चुनाव प्रचार में नहीं आउंगा लेकिन डॉ लोहिया की तेजस्विता से घबराकर वे फुलपुर आए और चुनाव प्रचार किया। नेहरू जीते तब लोहिया ने कहा चट्टान तोड़ तो नहीं सका, लेकिन दरार जरूर डाल दी।
लोकसभा में लोहिया फुर्रुखाबाद से १९६३ में उपचुनाव जीतकर पहुंचे थे। प्रधानमंत्री नेहरू ने उन्हें रोकने के लिए इंदिरा गांधी को प्रचार के लिए भेजा था। लोकसभा में उनके भाषण और विचार इतिहास की धरोहर हैं, जो पुस्तकों में दर्ज हैं। संसद में जब उन्होंने देश की प्रति व्यक्ति आमदनी पूछी और सरकार ने १३ आना बताई, तब उन्होंने ३ आना बताकर पूरी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया था। तीन दिन बहस चलने के बाद सरकार को हार मानना पड़ी थी। लोकसभा में एक बार देश के स्वास्थ्य मंत्री से उन्होंने प्रश्न किया। दुनिया के सबसे आधिक अंधरोगी भारत में क्यों हैं? स्वास्थ्य मंत्री को सूझ नहीं पड़ी थी, तब उन्होंने बताया कि तेज चिलचिलाती धूप में सड़कों पर इस देश का किसान, मजदूर, गरीब इंसान नंगे पांव पैदल चलता है। पांव के तलवों में लगातार आग आंखों को भी खराब करती है। जिस देश के नेताओं को सिर्फ कुर्सी दिखती है, वहां इतना नीचे तक देखने वाले डॉ. लोहिया जैसे विश्व मानव इंसान ही विश्व दृष्टि रख विश्व सरकार का सपना देख सकते थे।
डॉ. लोहिया चित्र शिल्प कला के मर्मज्ञ विद्वान थे। चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन उनसे जुड़े थे। वे इतिहास पर गहरी पकड़ रखते थे, इतिहासकार भगवत शरण उपाध्याय उनके लिए समर्पित थे। इनके अलावा कई कवि और साहित्यकार जिनमें रामधारी सिंह दिनकर, फणीश्वर नाथ रेणु, रामवृक्ष बेनीपुरी, विजय देव नारायण साही भी डॉ. लोहिया से प्रभावित थे। हैदराबाद के नगर सेठ बद्री विशाल पित्ती उनके तो ऐसे आशिक थे, जो जिन्दगी भर उनका साहित्य छापते रहे। डॉ. लोहिया देश के नदी-पहाड़ जोड़ो, हिमालय बचाओ के लिए सम्मेलन करते थे। वे सीता-सावित्री, द्रोपदी कौन बड़ी, वैâसे छोटी पर बहस करवाते थे। अर्थशास्त्र के गहरे ज्ञाता थे, इन सबसे बढ़कर उनकी दृष्टि समतावादी थी। जिसमें सबसे पहले विश्व मानवता थी।
सन् १९६७ का दौर था। उन्होंने कांग्रेस के समक्ष देश का एक सबल प्रतिपक्ष बनाया था। उन्होंने यह नारा दिया था कि बड़े शत्रु मतलब कांग्रेस से लड़ने के लिए छोटे शत्रु मतलब कांग्रेस विरोधी दलों को भिन्न विचार होने पर भी साथ में लेकर चलना होगा। उनकी परिकल्पना के अनुरूप दस प्रांतों में कांग्रेस विरोधी सरकार बन चुकी थी। ऐसे में अचानक १२ अक्टूबर १९६८ को डॉ. लोहिया ५८ वर्ष की उम्र में मूत्र नली की सामान्य बीमारी में इस दुनिया को अलविदा कह गए। उनके अनुयाइयों ने हवाई जहाज का इन्तजाम किया। बड़े से बड़े डॉक्टर बुलाये, डॉ. लोहिया ने उन्हें नकार दिया। फिर भी डॉक्टरों की आई फौज को देखकर उन्होंने कहा कि मुझ अकेले के लिए इतने डॉक्टर और इस देश के करोड़ों के लिए कोई डॉक्टर नहीं। यही उनकी जिन्दगी का फलसफा था।
(लेखक रविवार मासिक पत्रिका के प्रधान सम्पादक हैं)






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