
रामस्वरूप मंत्री
महान समाजवादी चिन्तक व कालजयी विचारक राममनोहर लोहिया और दलित चेतना के परचमपुरुष-ज्ञानपुंज बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर के जीवन-दर्शन और वैचारिकी में कई साम्य-बिन्दु और सादृश्यतायें हैं। दलितों के सर्वतोन्मुखी उत्थान के परिप्रेक्ष्य में दोनों एक दूसरे के साथ खड़े व चलते हुए प्रतीत होते हैं। कभी-कभी तो लगता है कि बाबा साहब और लोहिया को नियति ने एक-दूसरे का पूरक बना कर ही धरती पर भेजा था। जैसे महासागर के दो तट, एक दूसरे के सहयात्री व समानधर्मी होकर भी एक दूसरे से कभी नहीं मिलते, वैसे ही लोहिया व आम्बेडकर एक ही पथ के दो पथिक होकर भी कभी एक दूसरे से नहीं मिले, लेकिन दोनों का लक्ष्य एक था – ‘‘दुनिया में शोषण विहीन समाजवादी समाज की स्थापना’’। दोनों सही अर्थों में वैश्विक मानव थे जो फरिश्तों की तरह भू-लोक पर आए और सदियों से वंचित वर्ग की व्यथा व वंचना को शाश्वत स्वर देकर प्रेरणादृपुंज बन गए जिससे सदियों तक सम्पूर्ण मानवता प्रेरणा की अलौकिक व अद्भुत रोशनी लेती रहेगी।
एक बार लोकसभा के अध्यक्ष रहे लोहिया के अनन्य अनुयायी रवि राय ने संवाद के दौरान मुझसे कहा कि बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर ‘‘स्टेट सोशलिज्म’’ (राज्य समाजवाद) की अवधारणा के प्रबल पैरोकार थे। मुझे सहसा यकीन नहीं हुआ, मस्तिष्क में एक स्वाभाविक सवाल अनायास कौंधा यदि बाबा साहब प्रतिबद्ध समाजवादी थे तो स्वतन्त्रोपरान्त लोहिया और उन्हें एक साथ मंच पर आकर देश की राजनीति में नए अध्याय का सूत्रपात करना चाहिए था। अब तक मानस में एक अवधारणा बन चुकी थी कि बाबा साहब का लोहिया व समाजवाद से दूरस्थ ही सही, कहीं-न-कहीं, कुछ न कुछ नाता जरूर है।
राममनोहर लोहिया को आद्योपांत पढ़ चुका हूँ, उनके साथ के कई विभूतियों के सानिध्य का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त है लेकिन दुर्भाग्यवश बाबा साहब को न कभी गहराई में पढ़ने का अवसर मिला, न ही उनके किसी सहयोगी से संवाद व विचार-विनिमय का योग बन सका।
बाबा साहब व लोहिया एक ही काल-खण्ड का होने के बावजूद बिना एक दूसरे से मिले, एक दूसरे के प्रशंसक रहे हैं। एक भी ऐसा उद्धरण व उदाहरण नहीं मिलता जिसमें लोहिया जी ने डा0 भीमराव आम्बेडकर की और बाबा साहब ने डा0 लोहिया की आलोचना की हो। लेकिन ऐसे कई दृष्टान्त उपलब्ध हैं। जिसमें दोनों ने एक दूसरे की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यह घटना नवम्बर 1951 की है। अनुसूचित जाति फेडरेशन की कार्यकारिणी की बैठक के दौरान बाबा साहब ने कई बार सांसद रहे चुके प्रखर नेता व संगठन बुद्धप्रिय मौर्य से पूछा कि डा0 लोहिया को जानते हो। मौर्य जी चुप रहे, वे लोहिया को पहचानते-जानते तो थे ही लेकिन उन्होंने जानने से अभिप्राय लगाया कि ठीक से अवगत होना। बुद्धप्रिय की खामोशी पर बाबा साहब भड़के और बोले ‘‘तुम खाक पाॅलिटिक्स करोगे, जब तुम राममनोहर लोहिया को नहीं जानते। हिन्दुओं के एक ही नेता हैं जो ईमानदारी से जात-पात तोड़कर जातिहीन समाज की स्थापना करना चाहते हैं। बकौल बुद्धप्रिय मौर्य आमतौर पर डा0 आम्बेडकर किसी की तारीफ करने के मामले में काफी कंजूस थे। आम्बेडकर जी की प्रशंसा के उपरान्त बुद्धप्रिय डा0 लोहिया से मिलने ओखला निरीक्षण भवन पहुँचे। डा0 लोहिया ने कई उद्बोधनों व लेखों में बाबा साहब की मुक्त हृदय से प्रशंसा की है। अगस्त 1956 में अपने एक भाषण में लोहिया जी ने बाबा साहब की तारीफ करते हुए उन्हें महान नेताओं की श्रेणी में रखा था। जुलाई 01, 1957 को मधु लिमए को संबोधित एक पत्र में बाबा साहब के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए डा0 लोहिया ने लिखा है “मेरे लिए डा0 आम्बेडकर हिन्दुस्तान की राजनीति के महान आदमी थे और गांधी को छोड़कर बड़े से बड़े सवर्ण हिन्दुओं के बराबर। डा0 आम्बेडकर विद्वान थे। उनमें स्थिरता, साहस और स्वतंत्रता थी। वे बाहरी दुनिया को हिन्दुस्तान की मजबूती के प्रतीक के रूप में दिखाए जा सकते थे। उन्होंने इसी पत्र के अंतिम भाग में अपनी सदेच्छा व्यक्त की है कि श्रद्धा और सीख के लिए डा0 आम्बेडकर को प्रतीक माना जाय। बाबा साहब की कटुता को छोड़कर उनकी स्वतंत्रता को लिया जाय और ऐसे आम्बेडकर को देखा जाय जो केवल हरिजनों के नहीं पूरे देश के नेता हों।
लोहिया व आम्बेडकर की संवाद शैली और लेखन विधा भी एक जैसी है। दोनों अपने लेखों व वक्तव्यों के दौरान कब सूत्र-वाक्य बोल देते थे, पता नहीं चलता थ। दोनों चलते-फिरते विश्वज्ञान कोष थे।
बाबा साहब और लोहिया दोनों सही मायने में विश्व-नागरिक थे, दोनों को देश की परिधि में संकुचित करना उनके विराट व्यक्तित्व का अवमूल्यन होगा।
आम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी का नाम ब्रिटेन के लेबर पार्टी के तर्ज पर इंडिपेण्डेंट लेबर पार्टी रखा। आम्बेडकर की पार्टी ने 1937 में महाराष्ट्र धारा सभा के चुनाव में उल्लेखनीय सफलता भी दर्ज की। बाबा साहब आम्बेडकर की लेबर पार्टी की घोषणा-पत्र से उनके समाजवादी विचारों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। वे लिंकन, लास्की, बर्टेड रसैल से प्रभावित दिखे, ये तीनों लोहिया के भी प्रेरणा-पुरुष हैं। 1950 में श्रमिक दल से चुनाव लड़ने और हारने वाले बड रसैल के विचारों को आम्बेडकर ने अक्सर सूक्ति-वाक्यों की तरह उद्धृत किया है और रसेल की पुस्तक ‘‘Distraction of Society’’ की समीक्षा लिखते हुए अपने को रसेल के समाजवाद से कई बुनियादी सवालों पर सहमत बतलाया। लोहिया के भी प्रिय राजनीतिक विचारकों की सूची में रसेल का नाम अग्रगण्य है।
दोनों अर्थशास्त्र के शोधार्थी थे और दोनों के आर्थिक चिन्तन में आर्थिक विषमता पर करारा प्रहार मिलता है। सन् 1915 में बाबा साहब को एम0ए0 की डिग्री कोलम्बिया विश्वविद्यालय (अमरीका) में प्राचीन भारत की वाणिज्य व्यवस्था (Ancient Indian Commerce) पर मिली तो पीएचडी में उनका विषय ‘‘National divident of India & A Historical and analytical study’’ (भारतीय राष्ट्रीय लाभांश-एक ऐतिहासिक व विश्लेषणात्मक अध्ययन) था। इसके अतिरिक्त 1921 में लंदन में उन्हें ब्रिटिश भारत में साम्राज्य पूँजी का प्रादेशिक विकेन्द्रीयकरण (The provincial decentralçation of Imperial Finance in British) शोध-प्रबन्ध पर एमएससी की उपाधि मिली। उनके अक्टूबर 1922 में लिखे गए शोध-प्रबन्ध ‘‘द प्राब्लम आफ रुपी’’ को लंदन के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों से सराहना मिली। गौर तलब है। कि उनके द्वारा यूरोप और अमरीका में अर्जित की गई सभी डिग्रियों का विषय-वस्तु अर्थशास्त्र ही रहा।
लोहिया को भी जर्मनी में पीएचडी की डिग्री अर्थशास्त्र में मिली। दोनों का आर्थिक चिन्तन एक दूसरे से मिलता-जुलता है। दोनों आर्थिक विषमता को दूर करने वाली आर्थिक नीतियों के पक्षधर हैं। एक जगह बाबा साहब ने औद्योगिक नीति पर टिप्पणी करते हुए स्पष्ट शब्दों में लिखा है भारत के औद्योगीकरण के लिए राजकीय समाजवाद (state Socialism) आवश्यक है। निजी अर्थव्यवस्था ऐसा नहीं कर सकती तथा यदि प्रयत्न किया जाय तो आर्थिक विषमता को ही जन्म देगी। यह भारत के लिए खतरे की घण्टी है।” उनकी ऐतिहासिक रिपोर्ट (प्रतिवेदन) ‘‘स्टेट्स एण्ड माइनोरिटीज’’ का आर्थिक अध्याय राज्य समाजवाद लाने का आह्वान करता है। उनका आर्थिक दर्शन लोहिया की भांति किसानों, मजदूरों और वंचित वर्ग की खुली पैरोकारी करते हुए उन्हें संरक्षण देते हुए नजर आता है। आम्बेडकर का समाजवाद लचीला समाजवाद है। उन्होंने संविधान को समाजवाद लाने के वाहन के रूप में स्वीकार किया और ऐसे प्रावधान उपबन्धित किए कि व्यक्तिवाद व पूँजीवाद के नग्न-नर्तन व निरंकुयाता पर अंकुश लगे। राममनोहर लोहिया के विषय में कोई संशय नहीं है कि उन्होंने समाजवाद के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। आजादी के पहले और आजादी के बाद भी गणतांत्रिक समाजवाद के मूल्यों को ताकत देने के लिए वे सतत संघर्ष करते रहे। लोहिया प्रथम पंक्ति के एक मात्र ऐसे नेता हैं जो आजादी की लड़ाई के दौरान जितनी बार जेल गए, उससे अधिक सामूहिक प्रतिकार को स्वर देते हुए आजादी के बाद भी कारावास की यातना भोगी। किन्तु समाजवाद की लौ को ज्योर्तिमय करते रहे। वर्ण-भेद अथवा नस्ल भेद के विरुद्ध लोहिया ने अमरीका में सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तारी दी थी और अमरीकी बुद्धिजीवियों को अपने अकाट्य तर्को तथा अद्भुत मेधा के आगे झुकने के लिए बाध्य कर दिया था।
अमरीकी विद्वान व रिपब्लिकन पार्टी के नेता हैरिस वोफोर्ड ने बाकायादा ‘‘लोहिया एण्ड अमरीका मीट’’ पुस्तक में लोहिया के नस्लभेदी सत्याग्रह को चित्रित करते हुए पुस्तक लिखी है। बाबा साहब ने भी अमरीका यात्रा के दौरान वहां के नीग्रो युवाओं व युवतियों से संवाद किया और नस्लभेद को मानवता के लिए नासूर बतलाया, वहाँ उन्हें जॉन राबर्ट ने ष्अश्वेतों के गौरवश् की संज्ञा दी थी। दोनों ने भारतीय मेधा की कीर्ति-पताका को यूरोप व अमरीका में फहराया। जब 1955 के उपरान्त बाबा साहब व लोहिया के मध्य एक मंच पर आने की भूमिका बनने लगी थी, लोहिया व बाबा साहब के मध्य बनी सैद्धान्तिक सहमति इसके पहले मूर्त-रूप ले पाती, बाबा साहब 6 दिसम्बर 1956 को महाप्रयाण कर गए।
बाबा साहब के जाने के बाद लोहिया ने उनके ‘‘जाति तोड़ो अभियान’’ ‘‘अछूतोद्वार’’, ‘‘अस्पृश्यता विरोधी गतिविधियाँ’’, दलितों का मंदिर प्रवेश जैसी कार्ययोजनाओं और सोच को पूरी प्रतिबद्धता और ताकत से आगे बढ़ाया। इसमें दो राय नहीं कि भारतीय जनमानस को गांधी के बाद सबसे अधिक लोहिया व आम्बेडकर ने ही प्रभावित किया है और नए मन के नए समाज की पूर्वपीठिका तैयार की।
सन् 1955 के बाद देश का सियासी वातावरण तेजी से बदलने लगा। पंडित नेहरू के समानान्तर लोहिया व आम्बेडकर दो बड़े नाम थे। दोनों के समर्थक महसूस करने लगे थे कि दोनों को एक साथ एक मंच पर आकर देश को नया और सक्षम विकल्प देना चाहिए। केरल में थानुपिल्लै की सरकार लोहिया गिरा चुके थे, अवाड़ी सम्मेलन (1955) में पंडित जवाहर लाल नेहरू समाजवादी संघात के समाज का प्रस्ताव पारित कर एक वैचारिक विपर्यय अथवा भ्रम फैलाने में सफल हो चुके थे। अशोक मेहता ने कांग्रेस के प्रस्ताव का समर्थन व स्वागत किया जिनके विरुद्ध मधु लिमए ने निर्णायक प्रतिकार की घोषणा कर दी। फलस्वरूप मधु लिमए को बम्बई सोशलिस्ट पार्टी ने निष्कासित कर दिया। लोहिया ने देश भर के समाजवादियों से मधु लिमए का स्वागत और व्याख्यान कराने की अपील की। पुरी में 29 से 31 मई 1955 के दौरान लिमए की अध्यक्षता में समाजवादियों का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ जिसमें लोहिया ने देश में सैद्धान्तिक बहस चलाने का आह्वान किया। इसी दौरान मणिपुर में लोहिया को सभा को सम्बोधित करते हुए गिरफ्तार कर लिया गया। लोहिया की गिरफ्तारी के पश्चात देश में हलचल मचना स्वाभाविक था। ‘‘जेल के फाटक टूटेंगे-डा0 लोहिया छूटेंगे’’ के नारों से पूरा देश गूंज उठा। भारी जन-दबाव के कारण लोहिया छूटे। छूटते ही उन्होंने नया दल बनाने की घोषणा की। लोहिया जानते थे कि ऐसे वातावरण उन्हें बाबा साहब का साथ मिलेगा। क्योंकि दोनों का मकसद एक था। उन्होंने हैदराबाद से 10 दिसम्बर 1955 को डा0 आम्बेडकर को पत्र लिखकर समाजवादी दल के विशेष अधिवेशन को सम्बोधित करने का आग्रह किया। डा0 लोहिया को डा0 आम्बेडकर का 24 सितम्बर 1956 को लिखा गया पत्र मिला कि 30 सितम्बर को दिल्ली में होने वाली अखिल भारतीय परिगणित जाति संघ की बैठक में बाबा साहब लोहिया के प्रस्ताव को रखेंगे और वे चाहते हैं कि पार्टी के प्रमुख लोगों से बातचीत होकर साथ और गठबंधन की दशा को अंतिम रूप शीघ्रातिशीघ्र दे दिया जाय। बाबा साहब ने इसी पत्र में डा0 लोहिया से 2 अक्टूबर 1956 को मिलने की बात कही। लोहिया ने ‘‘मैनकाइण्ड’’ के तीन अंक भेजवाते हुए बाबा साहब को पत्र लिख कर 19 या 20 अक्टूबर को मिलने का आग्रह किया। इस पत्र में उन्होंने बाबा साहब से सार्वजनिक सवालों पर बिना किसी रोक के बोलने व टिप्पणी करने का निवेदन किया। खराब स्वास्थ्य को कुप्रभाव बाबा साहब की सक्रियता पर भी पड़ा। नवम्बर में वे बीमार पड़े और 6 दिसम्बर 1956 को अपने सपनों और लोहिया नीत समाजवादी पार्टी के साथ एका के समस्त सद्प्रयासों को भी अधूरा छोड़कर चले गए।
इस प्रकार 1955 और 1956 के मध्य लोहिया व आम्बेडकर के मध्य हुए पत्र-व्यवहार और वैचारिक विनिमय से स्वतः स्पष्ट है कि दोनों में काफी हद तक वैचारिक समानतायें थीं जिन पर व्यापक विचार-विमर्श, विश्लेषण और लेखन आदि शेष हैं।
(लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार और समाजवादी पार्टी मध्य प्रदेश के महासचिव है)





